शनिवार, 9 जनवरी 2016

विधाता

कोन से साँचो में तूं है बनाता , बनाता है ऐसा तराश-तराश के ,
कोई न बना सके तूं ऐसा बनाता , बनाता है उनमें जान डाल के!

सितारों से भरा बरह्माण्ड रचाया , ना जाने उसमे क्या -क्या है समाया ,
ग्रहों को आकाश में सजाया , ना जाने कैसा अटल है घुमाया ,
जो नित नियम गति से अपनी दिशा में चलते हैं ,
अटूट प्रेम में घूम -घूम के, पल -पल आगे बढ़ते हैं !

सूर्य को है ऐसा बनाया, जिसने पूरी सुृष्टि को चमकाया ,
जो कभी नहीं बुझ पाया ,ना जाने किस ईंधन से जगता है ,
कभी एक शोर , कभी दूसरे शोर से ,
धरती को अभिनदंन करता है !

तारों की फौज ले के , चाँद धरा पे आया ,
कभी आधा , कभी पूरा है चमकाया ,
कभी -कभी सुबह शाम को दिखाया ,
कभी छिप -छिप के निगरानी करता है !

धरती पे माटी को बिखराया ,कई रंगो से इसे सजाया ,
हवा पानी को धरा पे बहाया, सुरमई संगीत बजाया ,
सूर्य ने लालिमा को फैलाया ,दिन -रात का चकर चलाया ,
बदल -बदल के मौसम आया ,कभी सुखा कभी हरियाली लाया !

आयु के मुताबिक सब जीवो को बनाया,
कोई धरा पे , कोई आसमान में उड़ाया ,
किसी को ज़मीन के अंदर है शिपाया ,
सबके ह्रदय में तूं है बसता ,
सबका पोषण तूं ही करता !

अलग़ -अलग़ रुप का आकार बनाया ,
फिर भी सब कुश सामूहिक रचाया ,
सबको है काम पे लगाया ,
नीति नियम से सब कुश है चलाया ,
हर रचना में रहस्य है शिपाया ,
दूृश्य कल्पनाओं में जग बसाया ,
सब कुश धरा पे है उगाया ,
समय की ढ़ाल पे इसमें ही समाया !

जब -जब जग जीवन संकट में आया ,
किसी ने धरा पे उत्पात मचाया ,
बन-बन के मसीहा तूं ही आया ,
दुनिया को सही मार्ग दिखाया ,
तेरे आने का प्रमाण धरा पे ही पाया ,
तेरे चिन्हों पे जग ने शीश झुकाया !

इस जग का तूं ही कर्ता ,
जब चाहे करिश्में करता ,
सब कुश जग में तूं ही घटता ,
पल पल में परिवर्तन करता !

बन बन के फ़रिश्ता धरा पे उतरना ,
इस जग पे उपकार तूँ करना ,
मानव मन में सोच खरी भरना ,
जो पल पल प्रकृति से खिलवाड़ है करता !

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शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

विधाता

कोन से साँचो में तूं है बनाता , बनाता है ऐसा तराश-तराश के ,
कोई न बना सके तूं ऐसा बनाता , बनाता है उनमें जान डाल के!

सितारों से भरा बरह्माण्ड रचाया , ना जाने उसमे क्या -क्या है समाया ,
ग्रहों को आकाश में सजाया , ना जाने कैसा अटल है घुमाया ,
जो नित नियम गति से अपनी दिशा में चलते हैं ,
अटूट प्रेम में घूम -घूम के, पल -पल आगे बढ़ते हैं !

सूर्य को है ऐसा बनाया, जिसने पूरी सुृष्टि को चमकाया ,
जो कभी नहीं बुझ पाया ,ना जाने किस ईंधन से जगता है ,
कभी एक शोर , कभी दूसरे शोर से ,
धरती को अभिनदंन करता है !

तारों की फौज ले के , चाँद धरा पे आया ,
कभी आधा , कभी पूरा है चमकाया ,
कभी -कभी सुबह शाम को दिखाया ,
कभी छिप -छिप के निगरानी करता है !

धरती पे माटी को बिखराया ,कई रंगो से इसे सजाया ,
हवा पानी को धरा पे बहाया, सुरमई संगीत बजाया ,
सूर्य ने लालिमा को फैलाया ,दिन -रात का चकर चलाया ,
बदल -बदल के मौसम आया ,कभी सुखा कभी हरियाली लाया !

आयु के मुताबिक सब जीवो को बनाया,
कोई धरा पे , कोई आसमान में उड़ाया ,
किसी को ज़मीन के अंदर है शिपाया ,
सबके ह्रदय में तूं है बसता ,
सबका पोषण तूं ही करता !

अलग़ -अलग़ रुप का आकार बनाया ,
फिर भी सब कुश सामूहिक रचाया ,
सबको है काम पे लगाया ,
नीति नियम से सब कुश है चलाया ,
हर रचना में रहस्य है शिपाया ,
दूृश्य कल्पनाओं में जग बसाया ,
सब कुश धरा पे है उगाया ,
समय की ढ़ाल पे इसमें ही समाया !

जब -जब जग जीवन संकट में आया ,
किसी ने धरा पे उत्पात मचाया ,
बन-बन के मसीहा तूं ही आया ,
दुनिया को सही मार्ग दिखाया ,
तेरे आने का प्रमाण धरा पे ही पाया ,
तेरे चिन्हों पे जग ने शीश झुकाया !

इस जग का तूं ही कर्ता ,
जब चाहे करिश्में करता ,
सब कुश जग में तूं ही घटता ,
पल पल में परिवर्तन करता !

बन बन के फ़रिश्ता धरा पे उतरना ,
इस जग पे उपकार तूँ करना ,
मानव मन में सोच खरी भरना ,
जो पल पल प्रकृति से खिलवाड़ है करता !

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* नारी *

नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,

मेरा जन्मना अभिशाप नहीं
मैं ही तो गृहिणी हूँ ,

मैं हूँ दुर्गा मैं हूँ काली
मैं हूँ लक्ष्मी मैं हूँ सरस्वती ,

मैं महामाया सब मेरी माया
सम्पूर्ण जगत में मैं हूँ छाया ,

नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,

मैं हु इष्ट मैं हूँ नूर
मुझ से कोई नहीं रह सकता दूर ,

मैं हु शून्य मेरे बिना सब सुन
दाएँ बैठू मान बढ़ाऊ बाएँ बैठू मान घटाऊ ,

अच्छे-अच्छों को धुल चटाया
मेरी निति कोई समझ न पाया ,

नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,

हर कामयाबी में मेरा हाथ
मेरे बैगर न पुरुष का पुरुषार्थ ,

मैं अमीना मैं हूँ मरियम
मैं हूँ सीता गीता और सबित ,

अपने से मैं क्या बखान
पढ़ लो आप मेरी इतिहास ,

नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ ,

सभी पुरुष को मैंने जन्म दिया
इस सृष्टि को सभ्यता संस्कृति और कर्म दिया ,

गम्भीरता सहनशीलता मेरा गुण
इसी लिए लोग करते हैं मेरे साथ भूल ,

प्रेम करुणा का सागर हूँ
सभी गुणों में आगर हूँ ,

नारी हूँ तो क्या हुआ
मैं जगत की जननी हूँ।

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सूर्य रश्मि

सांझ ढले –
सूर्य जब खो जाता है अस्ताचल की ओर,
ना जाने क्यूं –
पूर्व दिशा में निरन्तर उठती मेरी आंखे,
सूर्य को ढूंढती हैं ।
तभी पत्तों के झुरमुट से आती आवाज़ –
खींच लेती है,
उत्सुक हो मैं –
पत्तों के झुरमुट में बन्धे अन्धेरे की
काली परतों में ढूंढने लगता हूं –
सूर्य रश्मियों को,
जो उस झुरमुट से छन-छन कर आती
मेरे मन आंगन के अन्धेरे में
सुबह की लालिमा भर जाती हैं ।
—– बिमल
( बिमला ढिल्लन )

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मुक्तक-संवर जाओगे- शकुंतला तरार

”संवर जाओगे”
हमारी ज़ुल्फ़ के साये में संवर जाओगे ,
हमारी आँख के काजल में ठहर जाओगे ,
जो फूल बनके घर-घर में महकना चाहो ,
हमारे प्यार की खुशबू से निखर जाओगे ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

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दे ताली.....

दे ताली….. ( कृपया रचना को पूरी पढ़े )

वो क्या जाने मोल दाल भात का,
जिनके घर रोज़ बनती मेवे की तरकारी
नाश्ता होता जूस और फल से
खाने में बनती हो हर रोज़ बिरयानी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

जिसने ने जानी किसान की मेहनत
कैसे चलती है गरीबो की जिंदगानी
वो क्या जाने सुगंध मिटटी का,
जिसने खुले आकाश में न जींद गुजारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

क्या लेना दुनियादारी से
जिनके आगे पीछे लगी चमचो को लारी
नेताजी का ताज पहनकर
शान से निकलती है उनकी तो सवारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

जिनको जनता ने समझा काबिल
बैठकर संसद में वो बकते है गन्दी गाली
उस घर की हिफाज़त हो कैसे
जब रक्षक ही बन बैठे गुंडे और मवाली !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

वो क्या जाने दर्द किसी का
पीढ़ी दर पीढ़ी जिसने ऐश में गुजारी
मरे किसी का लाल भले ही,
उन तक तो पंछी ने कभी पर न मारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

एक साथ बैठकर दावत उड़ाते
मज़े से मनाते रोज़ ईद और दिवाली
झूठ की थाली के है वो चट्टे बट्टे
दूजे को चोर बताकर, खूब बटोरेते है ताली !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

वो क्या जाने दुःख टूटी मड़ैया के,
महलो में हो जिसने अपनी राते गुजारी,
मखमल और फूलो में बीते जिंदगी
चिता में भी लगती घी चन्दन की चिंगारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

कोई श्वेत कोई भगवा धारण कर
समाज में फैलाते नफरत की चिंगारी
फिर घर में बैठ वो देखे तमाशा
जब आपस में लड़ती है ये जनता बेचारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

बात न पूछो संत फकीरो की,
जो बन बैठे है आज मुखोटा धारी
झूठ मूठ के फैलाये तंत्र मन्त्र
डरकर सेवा में तत्पर रहते कोटि नर और नारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

कोई भूखा तरसता दो टूक को
कही पकवानो से होती है रोज़ा इफ्तारी
कही सड़को पे घूमे बच्चे नंगे
किसी की पोशाकों से भरी अलमारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

देश की रक्षा लगी दांव पर
आतंक को भेंट चढ़ते बच्चे, बूढ़े नर – नारी
घर का भेदी जब लंका ढहाये
फिर औरो को हम क्यों बकते है गाली !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

नारी सम्मान पर देते जो भाषण
कहलाने को जग में सबसे बड़े संस्कारी
पीड़ित होती उनके हाथो अबला,
अस्मित लूटते निशदिन बनकर व्यभिचारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

वाह रे दाता, वाह रे मौला,
बहुत देखी दुनिया में तेरी कलाकारी
किसी को फूलो का ताज बख्शा
किसी की सारी उम्र फुटपाथ पे गुजारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!
दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!
दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

!

[__@__[[ डी. के. निवातिया ]]__@__]
******************************************

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हक़ बातें तू हरगिज़ ना कह पाएगा - GAZAL SALIM RAZA REWA

हक़ बातें तू हरगिज़ ना कह पाएगा
अहसानों के तले अगर दब जाएगा !

मात- पिता का दिल जो कभी दुखाएगा
चैन  सुकूं  वो जीवन  भर  ना पाएगा !

तेरी  दुनिया  खुशिओं  से  भर जाएगी
गर  औरों  के  काम हमेशा   आएगा !

आज  भी  रस्ता  तकते  है  मेरे नैना
मेरा  प्रीतम लौट के  इक दिन आएगा !

जब बेटे  को  देखेगी  भूँखा  -प्यासा
माँ  का  दिल  टुकड़े -टुकड़े हो जाएगा !

क्यूं  दौलत  पे  लोग  बहुत इतराते  हैं
इक दिन मिट्टी में सब कुछ मिल जाएगा !

मेरी ग़ज़लों  के  कुछ  शेर  सुना  दीजे
वक़्त क़ज़ा इस दिल को सुकूं मिल जाएगा ! 
———————————
हक़ – सच
क़ज़ा – मौत
salim raza rewa 9981728122

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गुरुवार, 7 जनवरी 2016

आलोचना

मज़ा आता है दूजे की बुराई में l
ये दिल बाग़-बाग़ हो जाता है ll
औरो के लिए समय हो न हो l
इसके लिए समय निकल जाता है ll

बेशक लाख कमियाँ हो अपने में l
वो कभी किसी को नज़र नहीं आती ll
दूजे की एक कमी को पाकर l
बार-बार उंगलियों पर गिनी जाती ll

जितना समय लगाते है बुराई में l
यदि वो समय अच्छाई में लगाये ll
इससे अपनी कमियाँ भी दूर होंगी l
और शायद दूजे को अपनापन दे पाये ll

समय किसी के रोके नहीं रूकता l
फिर बुराई में क्यों समय गवाना ll
समय का सदुपयोग करो मेरे भाई l
क्योकि समय फिर वापस नहीं आना ll

बुराई अपनों से अपनों को दूर करेंl
अच्छाइयाँ गैरों को अपना बनाती है ll
एक उंगली दूजे की तरफ जब उठती है l
तो बाकि तीन अपनी तरफ ही आती है ll

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इक नज़र इधर भी__________

इक नज़र इधर भी_________
कल जैसी थी उन तारीखों का आज भी वही हाल है
कही जलसे तो कही कोई आज भी भूख से बेहाल है
आँखे मूंद भी लू तो कानो को उनकी सिसकिया सुनाई दे
तो कैसे मुख से कह दू की आपको मुबारक़ नया साल है
मैं नहीं कहता मत जश्न करो नहीं कोई खुशियाँ मनाओ
विकास पर इक नज़र प्यार भरी उन पर भी घुमाओ
चमचमाती सड़को पर जो
हमेशा रहते फटेहाल है
तब कहेगा दिल भी आपको मुबारक़ नया साल ह
______”विकास”_______

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विद्या की तू खान है वीणा वादिनी  - SALIM RAZA REWA

विद्या की तू खान है वीणा वादिनी 
शक्ति तेरी महान है वीणा वादिनी !

तुमसे ज्ञान की खुशबू है सारे जग में 
तुमसे ही सम्मान है वीणा वादिनी !

ज्ञान की सागर तू है माता सरस्वती 
हम सब तो अज्ञान  है वीणा वादिनी!

अपना आशीर्वाद हमें भी दे माता 
भक्त तेरा नादान है वीणा वादिनी !

तेरी किरपा जिसपे भी हो जाती है 
वो पाता  सम्मान है वीणा वादिनी !

तुमसे ही इज़्ज़त तुमसे ही शोहरत है 
महिमा तेरी महान है वीणा वादिनी !

हांथों को सच लिखने की ताक़त दे दो 
बस इतना अरमान है वीणा वादिनी !

—————————-
by salim raza rewa 9981728122

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अपना वो दामन बचाकर चल दिए - GAZAL SALIM RAZAV REWA

ग़ज़ल –
अपना वो दामन बचाकर चल दिए
जब मिले नज़रें चुराकर चल दिए !

दिल में चाहत लेके आए थे मगर
दर से उनके चोट खाकर चल दिए !

अब यकीं उनकी जुबाँ का क्या करे
जो फ़क़त सपने दिखाकर चल दिए !

मौसम-ए – गुल की तरह आए मगर
गुंचा-ए -दिल वो खिला कर चल दिए !

जब भि गुज़ रे वो मेरे नज़दीक से
ज़ुल्फ़ की ख़ुश्बू उड़ा कर चल दिए !

बन के दुश्मन देखने आए मगर
मेरे हक़ में वो दुआ कर चल दिए !

जब मिले तन्हाईओं में वो “रज़ा ”
दर्द – ए – दिल सुनकर चल दिए !
————————————
फ़क़त ! सिर्फ़
मौसम-ए – गुल ! फूलों का मौसम
गुंचा -ए -दिल ! दिल की कलियाँ

by shayar salim raza 9981728122

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मिसाल______________

ज़र्रा से ज़र्रा मिलकर बना जहान
चाँद सूरज तारों से सजा आसमान
अपने रूप,रंग प्रेम से ही बनाया फिर भी
मालिक तेरी सोच सा क्यों नहीं बना इन्शान
________विकास______

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मोह्हबत है तुमसे - 1

सनम तेरे बिन जीना ही क्या जीना
अधूरी मेरी जान तुम जो न हो ऐ हसीना !

जैसे बिन पानी के हो कोई खाली कुआं
वैसे ही रह जाऊँगा में काय बिन कोई रूह भटकता हुआ !!

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बुधवार, 6 जनवरी 2016

इस शहर में (ग़ज़ल)

इस शहर में दिल के काले है बहुत !
अपने धुन पे गुम मतवाले है बहुत !!

कैसा ये शहर प्यासा भटके पानी को ,
हर गली चौराहों में मैखाने है बहुत !

आज भी गरीबो के पास घर नहीं ,
इस शहर में ऊचीं ईंमारते है बहुत !

चारो – ओर शोरगुल दौड़ रहा शहर ,
हर शख्स अन्जान मुश्किले है बहुत !

यूँ सोचते बैठे न रह चल दौड़ अब ,
सोच लें जाना कहाँ रास्ते है बहुत !

Dushyant kumar patel

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सीरत

चेहरे पे चेहरा लगाते हैं,

सूरत वही रहती है,
सीरत छुपाते हैं,
अपनी परछाई से दूर भागते हैं,
और आईने से घबराते हैं लोग!……

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HINDUSTANI SAPNE

AANKHO ME CHAH HAI DIL ME TAMANNA
HE HINDUSTAN TERE LIE HAI KUCH KARNA
LADKHADA RHAE KADAM MERE DE DE SAHARA
DIKHLA DENGE DUNIYA KO HUM HI HAI WO SITARA.
BHULENGE NA TUGHE TU HI EK HAMARA
BHAR KE TU JOSH MUJH ME LGA DE TALA
SAJA DENGE TIRANGE S DUNIYA KA HAR EK KINARA
HAR KAR JO HO GAE HAI BESAHAR
BANENGE HUM UNKA BHI SAHARA.
MY DEAR AMERICAN BROTHERS AND SISTERS
JAISI VANI SE KARENGE KABHI NA KINARA
LEKIN CHHODENGE NA UNKO KABHI BHI
JO BHUL KE BHI GALTI KARENGE DUBARA.

utkarsh srivastava
KNIT, sultanpur

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खुदा ना करे by ALOK UPADHYAY

. मैं तुझको भुल के जिन्दा रहुँ, खुदा ना करे.
रहेगा साथ तेरा प्यार जिन्दगी बन कर..
ये और बात मेरी जिन्दगी वफा ना करे..

ये ठीक है नही मरता कोई जुदाई में..
खुदा किसी को किसी से मगर जुदा ना करे..
सुना है उसको महोव्त दुआऐं देती है..
जो दिल पे चोट तो खाऐ मगर गिला ना करे..

अगर वफा पे भरोसा रहे ना दुनीया को..
तो कोई शख्स महोव्त का होसला ना करे..
बुझा दिया हो नसीबों ने मेरे प्यार का चाँद..
मैं तुझको भुल के जिन्दा रहुँ, खुदा ना करे……
BY
ALOK UPADHYAY

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must read: a bitter true by T.VEERU published by Alok Upadhyay

आज ये आर्टिकल मै दुनिया में आने वाली घटनाओ को मद्देनज़र रखते हुये लिख रहा हु मै आशा करता हुँ आपको ये आर्टिकल पसंद ए और आप मुझे जरूर कमेंट करे क्यूंकि मैं बहुत बड़ा साइंटिस्ट नही हुँ सिर्फ एक साधारण सी फैमिली में रहने वाला लड़का हुँ । अब आगे मेरा अरिटक्ल पढ़े जो की मैंने पर्यावरण के ऊपर लिखा है।
हमारे सोर मंडल में सभी ग्रहो की उत्पति कैसे हुई ये मुझे नही पता ? हमारी पृथ्वी के आलावा सोर मंडल के और किसी गृह में जीवन है या नही ये मै नही जानता ? परन्तु आज मैं हमारी पृथ्वी के जीवन चक्र के बारे में अपने विचार प्रकट करता हूँ। पृथ्वी में जीवन कैसे पनपा ये नही जनता। परन्तु एक बार जब मैं डिस्कवरी चैनल देख रहा था देख रहा था तब उसमे बतया था की पृथ्वी में जीवन एक बैक्टीरिया पनपा था। हलाकि मेरा मानना है यह है जहाँ जीवन अपने आप पनप जाता है हमारी धरती पर हमारी प्रकति ही हमारा पालन पोषण करती है प्रकति ने अपने अंदर पल रहे सभी जीवो को एक सामान माना है। किसी के साथ भी भेद भाव नही किया। चाहे पेड़-पौधे हो जानवर हो या इंसान हो सभी को इस पृथ्वी पर एक सामान अधिकार है। आज मई पृथ्वी के उन सभी जीवो के प्रति अपने विचार प्रकट करता हूँ इस दुनिया में पेड़ पौधे और पशु पक्षी सबसे पहले आए. हम सभी जीवो को हमारी पृथ्वी ने जीवन दिया है और जीवन जीने के लिए संसाधन उपलब्ध कराये है। इस दुनिया सबसे विकसित जीव इंसान अपने आप को मानता है। तो अगर इंसान के नजरिये से इंसान ही सबसे विकसित जीव है तो पृथ्वी पर शांति , ख़ुशी और पृथ्वी को बचाने की जिमेदारी उस पर अधिक है। इंसान को ये नही पता की हमारी पृथ्वी ही हमारा स्वर्ग है और पानी ही अमृत है। इसलिए अगर इस स्वर्ग जैसी पृथ्वी का अंत होता है तो उसके लिए सबसे बड़ा कारण होगा इंसान। ये सभी आधुनिक विकास किस काम का है ? क्या आपने कभी सोचा है की हमसे पृथ्वी के जीव एवं पेड़ पौधे कितने दुखी है। आज मानव ही मानव का दुश्मन बन गया है। मै आपको एक रोमांचित बात बताना चाहता हूँ आपको यह तो पता ही होगा की जब एक कछुआ अपनी पीठ के बल उल्टा हो जाता है तो उसके लिए सीधा हो पाना कितना मुश्किल हो जाता है। एक दिन मै ' वाइल्ड ' चॅनेल देख रहा था उसमे मैंने देखा की एक कछुआ अपनी पीठ के बल पर उल्टा हो गया है। वह कछुआ आके उसकी मदद करने लगा और वह उस कछुए को सीधा करने में कामयाब रहा। इस घटना को देखकर मेरे मन में यह विचार आधा की पशु पक्षियों के अंदर इंसानियत है परन्तु इंसान के अंदर नही है। अगर इंसान अपने आप को इतना ही विकसित मानता है तो वह इस पृथ्वी के किसी भी पक्षी से अपने शारारिक बल से क्यों नहीं टकराता क्यों उनसे झुण्ड में और आधुनिक हथियार के साथ टकराता है। इंसानो मार्स पर जाने की तयार कर रहे हो। जितना खर्च तुमने मार्स पर जीवन तलाशने के लिए किया है। उतना खर्च हमारी इस पृथ्वी को बचाने के लिए क्यों नहीं करते हो। इंसान तू ये क्यों नहीं समझता है की प्रकति की शांति के आगे तू बेब्स है। तू खुद ही इस पृथ्वी और प्रकति की देन है जो भी चीज़े तूने बनाई है उन सभी चीज़ो में प्रकति की आत्मा बस्ती है तेरी बनाई हुयी सभी चीज़ो में प्राकृतिक संसाधन इस्तमाल हुए है। आज इंसान ही इंसान से दुखी है। तूने परमंडु हथियार और अन्य हथियार को बनाने के लिए किया है उतना खर्च इस पृथ्वी को बचाने के लिए कर। आज इंसान की बढ़ती आबादी से ही पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्र में बढ़ोतरी हुयी है , इंसान के कारण ही ओजोन लेयर में छेद हुआ है और इंसान के कारण ही पोल्लुशण हो रहा है। क्या तूने कभी सोचा है की अगर तेरे कारण इस पृथ्वी में पशु पक्षी पर पेड़ पौधो का नशा हो जायेगा ,तो तू जीवित रह पायेगा क्या ? आज तू अपने स्वर्थ के लिए हाथी के बेशकीमती दाँत उनसे छीन रहा है ,रहिनोसॉर्सेसेस के सिंह छीन रहा है और बांधो की हत्या करके उनके सवाल ले रहा है , बैट बनाने के लिए पेड़ो को काट रहा क्यों। किसके लिए ? कभी सोचा है की तेरी करतूतो से पेड़ पौधे एवं पशु पक्षी कितने दुखी है ? पेड़ पौधे तो हमें जीने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करते है और हमें अपने स्वार्थ के लिए उन्हें ही काट रहे है। क्या। तूने कभी सोचा है की प्राकतिक आपदाओ का अहसास सबसे पहले पशुओ को ही क्या होता है ? ये सब कुदरत करिश्मा है। कुदरत के कानून का इंसाफ कुदरत निष्पक्ष रूप से करती है। परन्तु इंसाफ के बनाये कानून में बेगुनाहो को भी सजा हो जाती है। तो मेरा बस यही कहना है हम अंत के करीब है हमें इस पृथ्वी को बयाना चाहिए न की इसके सर्वनाश का कारण बनाना चाहिए। अगर इस आर्टिकल से किसी को दुःख पहुँचता है तो मुझे माफ़ करना। मेरा इरादा किसी की भावनाओ को ठेस पहुचाना नही है। धन्यवाद
written by
T.VEERU
published by
ALOK UPADHYAY

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सैनिको की सहादत को सलाम

धरती माता को लगे आघात, आसमान भी रोने लगता है
जब जलती चिताये वीरो की सूरज भी पिंघलने लगता है,

नमन ऐसे वीरो की जाँबाजी के सजदे में सर झुकता है,
हो गौरान्वित बहनो का भी मन कांधा देने को करता है !!

सूख जाता है आँखों का सागर ,तनमन पत्थर सा हो जाता है
करे विलाप या शहादत को नमन, जिसका लाल खो जाता है !!

देश की आन बचाने को जो अपनी जान से मर मिट जाता है
माँ – बाप और बीवी बच्चो को, रोता बिलखता छोड़ जाता है !!
!
कल भरी थी मांग सिंदूरी, उसके हाथो की महेंदी अभी ताज़ा है
सजने संवरने की आयु में उसे विधवा का चोला ओढ़ा जाता है !!

इंसान नही देव तुल्य है वो, जो मातृ भूमि पर मर मिटते है
देते गमो का भार घरवालो को, देश का नाम रोशन करते है !!

–::–डी. के. निवातिया–::–

Salute to army.jpg

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तुमको प्यार करते थे तुमको प्यार करते हैं - GAZAL SALIM RAZA REWA

तुमको प्यार करते थे तुमको प्यार करते हैं       
जां निसार  करते थे जां  निसार करते  हैं  !      

ख़ुश रहे  हमेशा  तू  हर ख़ुशी मुबारक  हो  
ये दुआ  खुदा से  हम बार – बार  करते हैं !

लोग   दोस्तों  पे  भी  उँगलियाँ  उठाते हैं 
हम तो दुश्मनों   पर  भी एतबार   करते हैं !

वादे में है सदाक़त है लौट  के  वो  आएगा
इस उम्मीद में हम  तो  इंतज़ार  करते  हैं !

हम तो जान दे देते उनके इक  इशारे   पर 
दोस्तों  वो  हमको  कब  शुमार   करते हैं !

फूल सा खिला  चेहरा आँख वो गज़ालों सी
आके ख़्वाब में  अक्सर   बेकरार  करते हैं !

क्यूँ ”रज़ा” शराफ़त के मुश्कबार आँचल को 
अस्मतों के शैदाई  तार  – तार   करते  हैं !

17.3.13
sadaaqat-सदाक़त – صداقت -truth, sincerity,

mushk-baar,मुश्क-बार.مشک بار -diffusing musk, scented

shaidaa.ii शैदाई.شیدائی -lover, enamoured;

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Read Complete Poem/Kavya Here तुमको प्यार करते थे तुमको प्यार करते हैं - GAZAL SALIM RAZA REWA