मंगलवार, 12 जनवरी 2016

‘अकेलेपन’ का अहसास

टूट रही थी सांस ‘मेरी’ और जुबां सूखी थी,
तुझे नहीं पुकारा था, ‘चंद बूँद’ पानी की जरुरत थी ||

तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला,
मेरे लबों को नहीं, मेरे सर को तेरी गोदी की जरुरत थी,

इश्क में तू करता रहा वादे पे वादे ,
मुझे तेरे वादों की नहीं, तेरी वफ़ा की जरूरत थी,

तेरे नाले मुझसे थे तेरा माशूक था कोई और,
तुझसे इश्क मेरी गलती थी, तुझसे नफ़रत 'उस वक्त' की जरुरत थी,

क़यामत के रोज पूछियेगा अख़लाक़ से 'अकेलेपन' का अहसास,
हम प्यालों, हम निवालों के बीच अकेला, जब किसी ‘अपने’ की उसे शिद्दत से जरुरत थी,

11/01/2016

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उदासी के दामन तले

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सोचो क्या होता

सोचो क्या होता
यदि न उगता सूरज
नित्य भोर में,
लालिमा पर भी
निशा का पहरा होता !!

सोचो क्या होता
अन्धकार अगर नही छटता
जीवन लगता शून्य प्राय
प्रातकाल की आशा होती
अगर निंद्रा का न अंत होता !!

सोचो क्या होता
देवदूत गर न करते क्रंदन
दीखता न पुष्पों में स्पंदन
दरख़्त की शाखाओ पर
संक्षोभ का आभास न होता !!

सोचो क्या होता
स्रोतस्विनी का जल स्थिर
विक्षोभ अगर न हो उत्पन्न
शबनम क्या होती जाने
यदि आरोहण का प्रताप न होता !!

न तुम होते न हम होते
ये सुन्दर संसार न होता
धन्य हो हे प्राणदायिनी
देकर ये अनमोल धरोहर
प्राकृतिक सौंदर्य स्वरुप
जीवन का कोई आधार न होता !!
!
!
!
डी. के. निवातियाँ ——!!

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मेरी डायरी के पन्ने- भाग- २

मेरी डायरी के पन्ने- भाग- २
दिले- नादाँ तुझे हुआ क्या है, आखिर इस दर्द की दवा क्या है ,
तेरे साथ की तमन्ना, जो न पाया कभी
चाहे पास हो या दूर तू, एहसास है वही
तेरी चाहत मे हमें क्या मिला है, आखिर इस दर्द की दवा क्या है,
दिले- नादाँ तुझे हुआ क्या है,
हुई हमसे जो खता सनम, हम है तेरे दोषी,
क्या जाने इस गुनाह की सजा क्या होगी,
मेरी बर्बादियों का ये सिला है, आखिर इस दर्द की दवा क्या है
दिले- नादाँ तुझे हुआ क्या है,

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आओ जी लें हम

आओ पल पल इस जीवन निर्झर को पी लें हम
सुख दुख के झूले का अद्भुत जोखिम जी लें हम

बचपन से घोट घोट कर पढ़े जीवन को पोथी में
अक्षरों से हो आजाद कुछ अनुभव जी लें हम

शब्द अर्थ बदलते हैं वक्ता के व्यक्तित्व से
आओ शब्दों के अर्थ को चलो जी लें हम

फूलों में चित्रकार ने हजार रंग भरे होंगे बेजान
क्यारियों में खिली खूशबू को आओ जी लें हम

कैसे यकीन करें रब का गैरों के बयान से
जी भर खुद में खुदा को आओ जी लें हम

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अपनी जुबां से कह नहीं सकते ।(गजल)

दिलों के रंज-गम अपनी जुबां से कह नहीं सकते ।
दगा दे यार साहिल पर समन्दर सह नहीं सकते ।।

मचा ले खलबली चाहे यहाँ आगोश में लहरें ।
तूफां भी चाहे तो समन्दर बह नहीं सकते ।।

तजुर्बा था बहुत हमको हुनर भी काम ना आया ।
जिगर में जख्म ऐसे थे की मरहम भर नहीं सकते ।।

गुलों के गुलाबी रंग के कायल ये भंवरे भी ।
कांटे गर चुभे दामन ये जिंदा रह नहीं सकते ।।

“अनुज” देता है नसीहत यहां इन गम के मारों को ।
अक्सर टूट जाते हैं जो पत्थर ढह नहीं सकते ।।

गजलकार — अनुज तिवारी “इन्दवार”

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सोमवार, 11 जनवरी 2016

मोम सा हो गया हूँ उस पत्थर के प्यार में

मोम सा हो गया हूँ मैं उस पत्थर के प्यार मैं
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं
वक़्त से नाता तोड़ दिया
उस कम्बखत के इन्तजार में
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

बहुत जतन लगाये
उसके दिल को रास ना आया
मेरे धड़कते दिल का
उसको विश्वास ना हो पाया
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

मेरी आहों पर हँसता था वो
मेरी साँसों में रचता था जो
टूट कर बिखर गया उसकी बाँहों में
वो काँटे बिखेर गया मेरी राहों में
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं

ज्योति बन जिंदगी रोशन कर दे ये समझा था मैं
आंसुओ का समुन्दर मेरी झोली में डाल गया है वो
नासूर बन जिंदगी को डस गया है जो
मोम सा हो गया हूँ मैं
उस पत्थर के प्यार मैं
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मेरी डायरी के पन्ने- भाग- १

मेरी डायरी के पन्ने- भाग- १
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
एक शमा ही काफी है पूरा घर जलाने को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
याद है आज भी वो दिन के जब छोड़ा था घर अपना
मेरे अपनों ने ठुकराया मुझे मेरे आशियाने से
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुज़रे ज़माने को
ज़िंदगी है तेरी पनाहों मे तू माने न माने
अपनों को भूल के करता फिरे गैरो से अफ़साने
दूर जाने के ढूंढा करे तू सौ बहानो को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
हर एक बात पे कहता है हमे क तुम क्या हो
आज हम कुछ नही इसकी वजह भी तुम ही हो
करे बाते नई- नई हमें नीचाँ दिखने को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
शुक्रिया मेरे महबूब जो तूने दर्दोगम दिया
इस हसीं दर्द ने हमें औरो के काबिल बना दिया
यारो ढूंढो मेरी खातिर अब एक नए ठिकाने को
सरे बाजार ढूंढ़ता हूँ गुजरे ज़माने को
एक शमा ही काफी है पूरा घर जलाने को

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बेटी से खुशनुमा है ये संसार दोस्तो - BETI PAR KAVITA - NAZAM

!! बेटी !!
बेटी से खुशनुमा है ये संसार दोस्तो !
रौशन इसी से आज है घर-बार दोस्तो —

बेटी कही पे माँ कही बहना के रूप में !
पत्नी बहु ये बनके निकलती है धूप में !
सुब्हे किरन से शाम तलब घर संवारती!
बच्चो के रूप रंग को हर दम निखारती !
ये तो अजब निभाती है किरदार दोस्तों —

सारी ये क़ायनात बदौलत इसी से है ,
सारे जहाँ में फैला मोहब्बत इसी से है !
चंपा चमेली बनके चमन में महक रही ,
बातों से यूं लगे की है बुलबुल चहक रही !
ये सबको दे रही है सदा प्यार दोस्तों —

अपने पती के संग ये बनवास में रही ,
जंगल में भूंख प्यास की हर मुश्किलें सही !
बनकर के माँ दुआ से ये जन्नत दिलाएगी ,
इज्जत भी ये दिलाएगी शोहरत दिलाएगी !!
इसकी दुआ में खुशियों का अम्बार दोस्तो —

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पथजड़ का मौसम

पथजड़ का मौसम
पथजड़ से लगे हर तरफ कमी सी लगे।
पत्ते पड़े फूल ना दिखे अब सुना जहां सा लगे।
जंदिगी की हंसी मे कुछ कमी सी लगे
बिन सवान धरती अधुरी सी लगे।
हर तरफ है सुना प्यार की कमी सी लगे
दिलो मे आई बेवफाई प्यार की कांतिल सी लगे।
अपने इरादो से अब जाने कितने हटने लगे
बेवफाओ के नाम पर अब जाने कितने मरने लगे।
जिसने रखा होसला इस दोर मे
उन्हे हर पल अब सावन सा लगे। लेखक:- अभि शर्मा(अभिषेक शर्मा नागौर)

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फूल बरसे, शबनम या मोती सब एक सा लगता है

फूल बरसे, शबनम या मोती
सब एक सा लगता है

फूल बरसे, शबनम या मोती सब एक-सा लगता है
इस दिल पे जो भी बरसता है पत्थर-सा लगता है।

गम सावन है न भादों है, मौसम है न आबोहवा
जब भी बरसे है तो बेमौसम बारिश-सा लगता है।

इक गम की कतरनें हों तो जोड़कर समझ लेते
यहाँ कई गम की कतरनों का अंबार-सा लगता है।

गम के साये में फुदक-फुदककर चलके आये हैं
अब यूँ जीना भी बच्चों के खेल-सा लगता है।

गम तो खरीदा, न ही कभी बेचा जा सकता है
पर इनका सजाया जाना बाजार-सा लगता है।
—- भूपेन्द्र कुमार दवे

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मेरी जिन्दगी, मेरी नहीं, तेरी जिन्दगी का हिस्सा तो है

मेरी जिन्दगी, मेरी नहीं,
तेरी जिन्दगी का हिस्सा तो है

मेरी जिन्दगी, मेरी नहीं, तेरी जिन्दगी का हिस्सा तो है
तेरी नमपलकों में दुबका अश्क का इक कतरा तो है।

माना कि हजार जुगनुओं से उजाला नहीं होता
पर हर याद की कतरन में छिपा कुछ उजाला तो है।

पतझर की कहानियाँ पढ़ते पढ़ते सोचता हूँ
हर किस्से में दिल मेरा खड़ाखड़ाता तो है।

वह कहता नहीं, गूंगा भी नहीं है दिल मगर
आँखों से ही बहुत बातें बेचारा करता तो है।

इस राह पर बिछे काँटे अंगारे न हटावो
इन्हीं की बदौलत दिल इसे पहचानता तो है।
—- भूपेन्द्र कुमार दवे

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वक़्त

वक़्त कहाँ गुजर गया,
यह समा कहाँ बीत गया ,
अभी तो ठेहेरे थे यहाँ ,
पर वक्त में टेहेराव कहाँ ?
पीछे की यादें कर रहे थे ताजा ,
पर वक़्त आगे बढ़ता गया ,
चाल धीमी कर सम्भल रहे थे अभी,
पर वक़्त की चाल से पीछे रह गये तभी ,
दौड़ना नही चाहते थे ,पर वक़्त ने रुकना कहाँ सीखा.

दूरियों को दूर कर रहे थे ,
कि वक़्त ही निकल गया कितनी आगे ,
वक़्त के साथ चलते चलते इतनी आगे आ गये
पीछे देखा ,तो वोह दिन “यादें ” बन गये
यादों को याद करने का समय नही अब
वक़्त के साथ चलना है बस ,
वक़्त हर दर्द का मर्हम है ,
वक़्त वक़्त पर साथ आता हैं जो , वक़्त के साथ
एकदिन याद बन जत है.

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रविवार, 10 जनवरी 2016

छिड़ी बहस इक बात पर....... (रै कबीर)

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छिड़ी बहस इक बात पर
धूम मचाई रात भर।।
बीवीजी गुस्से में लाल
देखके हो गया बुरा हाल।।
पहले मैंने बात पकाई
कि घर में किसने आग लगाई।।
बीवीजी के तेवर तीखे
और गुस्से में मुझपे चीखे।।
चुपचाप बैठ सुन मेरी बात
करी चपङ चूँ पङेगी लात।।
किस पर कर देते हो स्वाह
कमाते हो जो तनख्वाह।।
अरे ऐसा कुछ नहीं पगली
थी कुछ देनदारी पिछली।।
मुझको ना ऐसे चराओ
मेरे सामने हिसाब लगाओ।।
किस किस का करूं हिसाब
पता भी है क्या क्या है भाव।।
फरमाईश करती खोलके दिल
और भरने पङते मुझको बिल।।
भरता हूँ तुम सबका पेट
फिसलता पैसा जैसे रेत।।
दूर शहर में नौकरी बजाता
स्कूटर का पेट्रोल फुंक जाता।।
दिन भर करो टूट कर काम
इक पल का भी नहीं आराम।।
ऊपर से वो मेरा बॉस
हर काम का देता मुझको दोष।।
खून पसीने की ये कमाई
बंद कर आँखें तूने लुटाई।।
घर बैठे जो आए पिज्जा
क्यों ना हो पूरी इच्छा।।
अॉनलाईन शॉपिंग हॉम डिलीवरी
इसी काम की रह गयी नौकरी।।
दूध, पानी, बणिया, बिजली
भर भरके मेरी जान है निकली।।
खुद ने लिया ना कपङा लत्ता
झङा इस पेङ का पत्ता-पत्ता।।
टूटे मेरे जूते चप्पल
पर न आई तुमको अक्कल।।
थक गया हूँ अटकती साँसें
सहता तुम्हारी घूरती आँखे।।
समझा क्या कोहलू का बैल
क्या है ये घर या जैल।।
बैठी हो जो सर पे चढके
खुद की गलती मुझपे मढके।।
नाम का ही रह गया प्रितम
मारके ताने ढाती सितम।।
हर बात का तुम्हें हिसाब दूं
हर प्रश्न का जवाब दूं।।
अब कैसे तुमको मैं समझाऊं
मेरी बात का यकीं दिलाऊं।।
क्या समझी हो कुछ मेरी बात
या फिर मारोगी मुझको लात।।
तभी अचानक उठी प्रियतमा
हमको याद आई अम्मा।
बस माफ करो मुझको पिया
बैठो जरा थामो जिया।।
मालूम न था के हो परेशान
सुन के हूँ मैं तो हैरान।।
कितना मैंने तुम्हें सताया
पहले क्यों ना मुझे बताया।।
गलती हमें स्वीकार है
कल से बंद अब कार है।।
रोज रोज न होगी शॉपिंग
न होगी तुम्हारी जेब की चॉपिंग।।
बहुत हुआ जीना हराम
जाके करो थोङा आराम।।
हुआ चमत्कार कैसा अजीब
मानो खुल गए मेरे नसीब।।
बहने लगी जो उलटी गंगा
कुछ ना कुछ जरूर है पंगा।।
चलो बहस का हुआ अंत
बदल के दानव हुआ संत।।
तभी द्वार पर कोई आया
उसने बीवी जी को बुलाया।।
बङा सा डिब्बा हाथ थमाया
देखके सर मेरा चकराया।।
जालिम ने थमाया बिल
पढके जिसे घबराया दिल।।
देखते क्या हो इसको ऐसे
निकालो पर्स चुकाओ पैसे।।
घूरती आँखों से मरी आत्मा
उठाले अब तो हे परमात्मा !!!!

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मुक्तक-"डरता हूँ "-शकुंतला तरार

मुक्तक “डरता हूँ”
तुम्हारे लब पे मेरा नाम जो ठहर जाये,
तुम्हारे दिल में मेरा अक्श जो उतर जाये,
तुम्हें हवा भी अगर छू ले डरता हूँ, कहीं
तुम्हारे हाथ का वो फूल ना बिखर जाये ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

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शनिवार, 9 जनवरी 2016

मेरी डायरी के पन्ने

मेरी डायरी के पन्ने
मेरी डायरी के पन्ने बुलाते है मुझे
लिखना भूल गयी तुम ये बताते हैं मुझे
सूने पड़े उन पन्नो पर तू अपनी कलम तो रख
राहे खुद बखुद बन जाएँगी तू बढ़ के एक कदम तो रख
रंग बिरंगी स्याही से रंग दे उन पन्नो को
जी भर के जीले जीवन के हर लम्हे को
चुन ले खुशियों के फूल जीवन के दामन से
खुद बखुद खुशियां बिखर जाएँगी तेरे आँगन मे
तू मुस्कुरा के उनपे अपना हक़ तो रख
बड़ी दिलचस्प है ये ज़िंदगी ये सुनाते हैं मुझे
मेरी डायरी के वो पन्ने बुलाते हैं मुझे
डायरी के हर पन्ने पर मैं रोज़ कुछ नया लिखती हूँ
न थकती हूँ न रूकती हूँ बस लिखती ही रहती हूँ
रुकना तेरा काम नहीं है तुझको चलते जाना है
जीवन के हर पन्ने को एक नए रंग से सजाना है
रंग बिरंगी स्याही कलम की यही बताती है मुझे
मेरी डायरी क वो पन्ने बुलाते है मुझे
लिखना भूल गयी तुम ये बताते है मुझे

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एक बीता हुआ पल

याद नही क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
तुम हो मसरूफ अपनी खुशियों मे फिर से तनहा रह गए हम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
क्या खूब हसीन दिन था वो मिले थे जब तुम हमें
सोचते थे के छुपा के रख ले हम उस लम्हे को दामन में
काश छुपा लेते उस वक़्त को तो वक़्त जाता थम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
हर पल यही सोचते हैं के तुझे चाहे इस कदर
तेरी पलकों मे ढूंढ़ते हैं आज भी वो पहली सी नज़र
खो गयी वो निग़ाहें कहीं जिन्हे कभी चाहते थे हम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
तेरी चाहत ने हमे छोड़ा न किसी ओर के काबिल
आज भी मिलते हैं राह मे लाखो हज़ारो दिल
ढूंढा करे कोई कंधा हम सुनाने को अपना गम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम

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मेरे महबूब कभी मिलने मिलाने आजा GAZAL SALIM RAZA REWA

! GAZAL !
मेरे महबूब कभी मिलने मिलाने आजा
मेरी सोई हुई तक़दीर जगाने आजा !

तेरी आमद को समझ लुगा मुक़द्दर अपना
रूह बनके मेरी धड़कन मे समाने आजा !

मैं तेरे प्यार की खुश्बू से महक जाऊगा
गुलशने दिल को मुहब्बत से सजाने आजा !

तेरी उम्मीद ज़माने से लिए बैठे हैं
कर के वादा जो गये थे वो निभाने आजा !

मेरे सपनो का महल तेरे बिना सूना है
मेरे ख़ाबों को तू रंगीन बनाने आजा !

तेरी हर एक अदा जान से प्यारी मुझको
तू हंसाने न सही मुझको सताने आजा !

अब तड़प दिल की नही और सही जाती है
प्यार की कोई ग़ज़ल मुझको सुनाने आजा !

by salimraza rewa 9981728122

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मुक्तक -"क्या कहूँ"शकुंतला तरार

“क्या कहूँ”
तुम्हें घटा कहूँ तो आसमां पिघल जाये ,
तुम्हें हवा कहूँ तो बागबां मचल जाये ,
मैं किसी भी नाम से तुमको पुकारूँ जानम,
जो कोई और कहे जाँ मेरी निकल जाये ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

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नफरत ही नफरत है....!!

नफरत ही नफरत है
मोहब्बत का निशां नहीं
इतनी नफरत देखकर
खुदा भी हैरान है।

ज़ुल्म इतनी सादगी से है
जबरदस्ती का निशां नहीं
इतना विष देखकर
सर्प भी हैरान है।

राही बेबस ही बेबस है
संदेशे का इंतज़ाम नहीं
सफर ऐसा देखकर
मंज़िलें भी हैरान है।

फिर भी जश्न इस कदर मना रहा है
परवाही का निशां नहीं
इतनी उमंगें देखकर
नफरत भी हैरान है।

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