“माँ”
सर जहां पर झुके वो मां के चरन
तीर्थ कहते जिसे वो मां के चरन
जिसके चरणों की धूल से जीवन
धाम बन जाये उस मां को नमन ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)
“माँ”
सर जहां पर झुके वो मां के चरन
तीर्थ कहते जिसे वो मां के चरन
जिसके चरणों की धूल से जीवन
धाम बन जाये उस मां को नमन ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)
है आज एक दुल्हन की विदाई!
दिल सहमा हुआ, धडकन है तेज ,
आँखो मे आँसू , दिल मे है कुछ ख्वाहिशे ,
हो रही है एक दुल्हन की विदाई !!..
अपनो को पराए और पराए को अपना करते हुए ,
खाई कुछ कसमो को निभाने की कोशिश करते हुए ,
रो रहा है दिल , कह रही है आत्मा,
न छोड जाऊ अपनो को,
हो रही है एक दुल्हन की विदाई !!
दिमाग यही सोचता है कैसे होंगे सभी,
क्या मुझे समझ पाएंगे,
गलतियो मे मुझे माफ कर पाएंगे,
ऐसी सोच रखे,
दिल व दिमाग मै एक उलझन सी है,
क्या दहेज के लिए प्रताडित करेंगे मुझे,
क्या लालच की आग मे झुलस जाऊगी मै,
यही कसमोकस लिए,
हो रही है एक दुल्हन की विदाई !!!…
[1]
मुश्किल में वो नही जो मंज़िल कि राह निकल गये हैं ,
मुश्किल में तो वो हैं जो सोचते बैठे हैं !!
[2]
मेहनत हि ऐसी चमत्कार हैं ,
जिससे खोयी हुई चीज प्राप्त कर सकते हैं !
[3]
व्यस्त ज़िंदगी हि ग़म कि उपचार हैं और खुशियों कि जननी !
[4]
आप बँधे रहकर केवल कल्पना कर सकते हैं ,पर उन्मुक्त हो कर सबकुछ सम्भव ,जो तुम चाहे कर सकते हो !!
[5]
अंहकार के ठहराव से अच्छे विचार भी बेकार होने लगता हैं !
Dushyant kumar patel
Read Complete Poem/Kavya Hereमुझे हैं जुस्तजू,तेरी इब्तिसाम देखने का !
ज़िंदगी से तेरी हर ग़म चुरा लेने का !!
अब तेरी गलियों में आना-जाना हैं बेवजह,
तू चांद हैं,जी करता हैं दिदार करने का!
जितना देना हैं दे, मेरे ज़िंदगी को सजा,
जुरत करूँगा हर दफ़ा,तुमसे ईश्क करने का!
बन जा तू हमराही,दिल के करीब आजा,
मैनें देखा हैं ख्वाब,तेरे साथ चलने का !
होगी ज़िंदगी हर दिन रंगीन तुमसे मिलके,
कैसे कहूँ जज्बात,तू वजह हैं जीने का !
*Dushyant kumar patel*
Read Complete Poem/Kavya Here तू वजह हैं जीने का ! [ग़ज़ल]ख्वाहिश है , कि हर बच्चा हँसता खिलखिलाता रहे ,
कि उसकी हँसी, मतलबहीन प्रतियोगिताएँ न छीन लें।
ख्वाहिश है, कि छोटा होता बचपन इतना न हो जाए छोटा ,
कि कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया,उससे उसका पूरा का पूरा बचपन न छीन लें। ,
ख्वाहिश है कि हर फूल खिलता ,महकता रहे ,
कि शहर का प्रदुषण,उससे उसके रंग चमक और खुश्ब न छीन ले।
ख्वाहिश है कि शहर के कंक्रीट जंगल में, कुछ हिस्सा मिट्टी का बच जाए ,
कि हमारा यह शहर हमसे, मिटटी की सोंधी ख़ुश्बू ना छीन लें।
ख्वाहिश है कि हर रिश्ता, सिर्फ फेसबुक तक न हो जाए सीमित।
कि समय का अभाव हमसे, हर रिश्ता न छीन ले।
ख्वाहिश है कि युवां, जिंदगी की अंधी दौड़ में इतना न हो जाए मशगूल,
कि काम बोझ उससे, जीवन की सारी की सारी खुशियां न छीन ले।
यूँ तो मेरी ऐसी छोटी मोटी ख्वाहिशें हैं बहुत ,
मगर डरती हूँ कि आने वाला कल मेरी सारी की सारी c न छीन ले। ख्वाहिश है , हर बच्चा हँसता खिलखिलाता रहे ,
कि उसकी हँसी मतलबहीन प्रतियोगिताएँ न छीन लें।
ख्वाहिश है कि छोटा होता बचपन इतना न हो जाए छोटा ,
कि कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया उसका पूरा का पूरा बचपन नछीन लें। ,
ख्वाहिश है कि हर फूल खिलता ,महकता रहे ,
कि शहर का प्रदुषण उससे उसकी चमक और खुश्बू न छीन ले।
ख्वाहिश है कि शहर के कंक्रीट जंगल में, कुछ हिस्सा मिट्टी का बच जाए ,
कि हमारा यह शहर हमसे, मिटटी की सोंधी ख़ुश्बू ना छीन लें।
ख्वाहिश है कि हर रिश्ता, फेसबुक तक न हो जाए सीमित।
कि समय का अभाव हमसे, हर रिश्ता न छीन ले।
ख्वाहिश है कि युवां, जिंदगी की अंधी दौड़ में इतना न हो जाए मशगूल,
कि काम बोझ उससे, जीवन की सारी की सारी मस्ती न छीन ले।
यूँ तो मेरी ऐसी छोटी मोटी ख्वाहिशें हैं बहुत ,
मगर डरती हूँ कि आने वाला कल मेरी सारी की सारी ख्वाहिशें न छीन ले।
रस्ते अनजान थे , दूर थी शायद मंज़िले ,
न खबर थी कि वक़्त ने ,लिखे राह मे कितने जलजले ,
हर सुबह अपनी ही धुन मे नयी आस वो लेकर जगा,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||
कुछ खुशिया बांटी बाप ने , कुछ याद माँ की लोरियाँ,
आँखों से होती गुफ्तुगू , लफ्ज़ो से थी उसकी दूरिया ,
अपनी मासूमियत को वो, घुटनो के बल लेकर भगा ,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी कि राह मे चलने लगा ||
कुछ ऐब सीखे दोस्त से , आँखों में बस्ती इश्क़्क़ीया ,
कुछ मनचले से ख्वाब थे कुछ उनसे बढ़ती नज़दीकियां ,
हम तो समझे प्यार था वो चल दिए देकर दगा ,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||
खुद सोच में थी उलझने , जिम्मेदारिओं की बोरिया ,
मेरी उम्र सी बढ़ती रही मेरी हसरतो से दूरिया ,
भूल हुई थोड़ी देर से जाना यहाँ न कोई अपना सगा,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||
आईने से दूरी मेरी ,खुदको दूसरो की आँखों में परखा ,
ख़ुशी का जश्न न बनाया , की दुखो पे खूब चर्चा ,
समाज की इन कायदो को पूरा कर कर वो थका ,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||
पैरोडी —
सीधा-सादा भोला-भाला
वह तो प्यारा सा मतवाला
आके शहर में तो उसका
देखो निकला है दीवाला
गाँव की माटी में शहर की चौपाटी में
क्या-क्या है भेद उसने आके जाना ||
कौन हो तुम किस देश से आये
क्या है करम कहानी
कौन जतन से प्यार बढायें
क्या है प्रेम की बानी
तुमने मुझको है पहचाना
तुमने मुझको अपना जाना
आके शहर में तो उसका
देखो निकला है दीवाला
गाँव की माटी में शहर की चौपाटी में
क्या-क्या है भेद उसने आके जाना ||
चलते-चलते गीत गुनगुनाएं
हमको किससे डरना
सीने में जब आग लगी हो
मरहम का क्या करना
पल भर प्यार के गीत बनालूं
तुमको ही मैं तुमसे चुरालूं
गाँव की माटी में शहर की चौपाटी में
क्या-क्या है भेद उसने आके जाना ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)
मेरी विनती को आज मानव तु अपना लें,
मर्यादा, लाज, शर्म को ढलने से बताले,
अब अपने घर मे शोचालय बनवाले! देश शर्म से झुक रहा है, मानव का मे तुल रहा है! अपने देश के आशीयानों की तु लाज बचाले!
अब अपने घर मे शोचालय बनवाले!
बहु बेटियों की आशाऔ पर, लाज शर्म की परिभाषाओ पर! नारी का सम्मान बडा लें!
अब अपने घर शोचालय बनवालें!
नारी को इज्जत कहते है, दिन रात घुघंट में रखते है!
कहा जाती ये बाते जब वह डिब्बा लेकर जाती है!
अपनी मर्यादा को डिब्बे मे ना ढलने दे
अब अपने घर ……….
पहला सुख निरोगी काया, अब यह तो दिखने में छाया,
खुले में मल जाने से, आज तक ना पनप पाया है!
आज तु इसको आजमा लें! अब अपने … …….
सरकार ने अभियान चलाया, मेहन्दुरिया का नाम भी आया!
घरघर जन-जागृती कर, स्वच्छता का दीप जलाया!
आज आपकी बारी है स्वच्छता अपना लें!
अब अपने …….
आज हमारी आशाओ पर, स्वच्छता की परिभाषाओ पर!
खुले में ना हो मल त्याग, बिमारियो का होगा त्याग!
स्वच्छता का दीप जलाकर अब ODF करवा लें
अब अपने घर शोचालय बनवाले!
हिन्दीसाहित्य ने उभरते हुए लेखको, कवियों, विचारको को एक नया मंच प्रदान किया है, दिन प्रतिदिन बढ़ती इसकी ख्याति के परिपेक्ष्य में हमारे सभी प्रिय कवि साथियो को समर्पित कुछ पंक्तिया पेश करता हूँ, आशा करता हूँ आप को पसंद आएगी !!
मिले थे सब अजनबी की तरह
आज थोड़ा सा जानते है, थोड़े से अनजान है !
यहां देखो इंटरनेट की दुनिया में
कवि भाइयो का एक छोटा सा संसार है !!
रोज होता है तखल्लुस अपना
नए कलाम के साथ नए कलमदारो से !
देख कर साहित्य के प्रति रूचि
होता अभिमान की संस्कृति से सरोकार है !!
गर्व की बात तो अब ये है
युवा पीढ़ी के नर-नारी दोनों साथ चले !
बड़ा अच्छा लगता देखकर
प्रत्येक विषय पर रचनाओं के विविध प्रकार है !!
गीत, ग़ज़ल, कलाम, कविता,
दोहे, मुक्तक, हाइकु शेर शायरी जैसी विधाए
करुण, हास्य, व्यंग, कटाक्ष,
प्रेम प्रेम और विरह के जज्बातों की भरमार है !!
नमन करता हूँ सभी भाइयो को
अलग पेशे से ताल्लुक पर लिखने का शौक रखते है !
निकल कर कुछ वक़्त खुद के लिए
मनोरंजन के साथ साथ करते साझा अपने विचार है !!
!
!
!
डी. के. निवातियाँ _____!!
खिल-खिलाती धूप में,
सरसराती छाँव में ,
लहलहाते , कुम्हलाते ,
हवा के झौंकों से ,
जीवन के कुछ पन्ने ,
मैं आज पलट रहा था ,
चँद कोरे शब्द ,
अर्थ-हीन बातें ,
खत के रूप में तेरे नाम,
लिखी हुई कभी की मुलाकाते,
नाकाम आरजुओं की राख,
उन पन्नों से धुआँ बनके ,
उड़ी , मुड़ी , छिटक गई ,
पकड़ना चाहा तो फिसल गई,
ज़िंदगी भी तो रेत की तरह है,
मुट्ठी में पकड़ो तो
कहीं न कहीं से
फिसल ही जाती है…!!
सबसे पहले जो खुद को झुठलाएगा,
सच्चा वो उनका आशिक़ कहलाएगा।।
भीड़ से मेरे यार ने ये ऐलान किया,
सबसे पहला पत्थर कौन उठाएगा।।
अहले-शहर के हाथ कटे क्यों रब जाने,
कौन मुझे अब मेरा खून दिखाएगा।।
दुनियाँ में तो उसने बस इनकार किया,
देखें हश्र में वो कैसे झुठलाएगा॥
आखिर उनके सारे सितम अब ख़त्म हुए,
उनके सितम बिन क्या आशिक़ जी पाएगा॥
‘लेनिन’-सी इक लाश छिपी है हस्ती में,
रब जाने इसे कौन, कहाँ दफ़नाएगा॥
किसने छीना मेरा चैन-व-क़रार यहां,
आप न गर बतलाएं, कौन बताएगा॥
क्या मैं बताऊँ ‘ईश्क़ी’ उन तोहमातों की,
अब न मिटे जो ता-हश्र भी न मिट पाएगा॥
(C)परवेजं’ईश्की’
ये है,
नहीँ, ये नहीँ है,
वो है,
नहीँ, वो भी नहीँ है,
इनमेँ से कोई भी नहीँ है,
ये तो इन्सान हैँ,
वो तो कोई ओर था,
इन्सानोँ के भेस मेँ,
कोई आदमखोर था,
जिसने मेरी अस्मत को,
तार-तार किया,
इन्सानियत का हैवानियत ने,
चीर-फाड़ किया,
शायद उसके घर मेँ,
बेटी नहीँ होगी,
बीवी नहीँ होगी,
बहन नहीँ होगी,
पर, माँ तो ज़रूर होगी,
क्योँकि ऐसे ही कोई,
दुनियां मेँ नहीँ आ जाता,
फिर क्या,
नारी जात उसे,
हवस का शिकार दिखती है,
और ऐसा करते उसे कभी,
अपनी माँ, बेटी, बहन, बीवी का,
ख़्याल नहीँ आता है,
कि उनके साथ अगर ऐसा होता,
तो परिस्थिति क्या होती,
हर नारी भी तो किसी की,
बेटी, माँ, बहन, बीवी, बहू होती है
शायद वो सचमुच इन्सान नहीँ है,
अगर होता तो ये बात समझता,
हाँ, वो हैवान है,
इन्सानी खाल मेँ,
एक ख़ूंख़्वार, आदमखोर,
हवस पीड़ित हैवान!!
(C)परवेजं’ईश्की’
पिया बावरे. . .
आजा साँवरे. . .
नींदिया न आवे. . .
रतिया जगावे. . .
दिल को कहीँ भी चैन न आवे,
काहे तू बलमा इतना सतावे,
पिया बावरे. . .
आजा साँवरे. . .
मोहे चैन न आवे. . . . . . !!
पल-पल निहारूँ रस्ता तुम्हारा,
अँखियोँ मेँ काटूँ दिन रात सारा,
धुन तोहरी लागी मोरे जिया को,
नैनोँ मेँ बरखा करे हे ईशारा,
पिया बावरे. . .
आजा साँवरे. . .
मोहे चैन न आवे. . . . . . !!
सखियां कहे है हुई बावरी मैँ,
कँगन न झुमका सजी साँवरी मैँ,
जागी न सोई तुझ मेँ ही खोई,
बिरहा की धूप मेँ जल जल मरी मैँ,
पिया बावरे. . .
आजा साँवरे. . .
मोहे चैन न आवे. . . . . . !!
(C)परवेज़’ईश्क़ी’
तुम रहो न रहो, पर तुम्हारे ख्यालात रहेंगे !
जज्बातों से महकते गुलिस्ता आबाद रहेंगे !!
चले जाना है सबको एक दिन हस्ती मिटा के !
मगर तुम्हारे नग्मे दिल को सदा याद रहेंगे !!
ले आये हो कहाँ से कहाँ इस अहले चमन को
तुम्हारे इस जज्बे के किस्से सदा आम रहेंगे !!
कैसे भुला पाएंगे हम तुम्हारी कुर्बानियो को !
खुद को मिटा के बनाये रास्ते तेरे नाम रहंगे !!
हर गम, हर जुदाई को सहना हमे आता है
मगर सीने में तेरे नाम के शोले दहकते रहेंगे !!
तूफानों से डटकर करेंगे मुक़ाबला अंत तक
तेरे जलाये चिराग रोशन- ऐ -आबाद रहेंगे !!
माना है तुमको “धर्म” ने अपना हमसफ़र !
अब तेरे नक़्शे कदम पर हम चलते रहेंगे !!
!
!
!
!!____डी. के. निवातियाँ ___!!
Read Complete Poem/Kavya Here आबाद रहेंगे.........एक टूटा हुआ सितारा हूँ।
बाब-ए-गर्दिश का मारा-मारा हूँ।।
न मिला आशियाँ कहीँ भी मुझे।
जो बिखर जाए मैँ वो धारा हूँ।।
चाहे ठुकरा दे या क़बूल तू कर।
मैँ तो जैसा भी हूँ बस तुम्हारा हूँ।।
कोई देखे भी क्योँ मेरी जानिब।
मैँ तो सुनसान इक नज़ारा हूँ।।
मौत से ज़िन्दगी हुई बदतर
ज़िन्दगानी का एक हारा हूँ।।
क्या अलू शायरी का जाने तू।
इक गदा और मैँ आवारा हूँ।।
जिस मेँ कोई तपिश न हो ‘नूरी’।
मैँ वो बुझता हुआ शरारा हूँ।।
ला दोगे क्या …
तारों भरी रात चाहिये मुझे
ला दोगे क्या
चाँद को जलने दो
नैनों से पिरो लेंगे वो बारात ।
फूलों भरी वादी चाहिए मुझे
ला दोगे क्या
भँवरों को तरसने दो
फूलों की महक से करेंगे मुलाक़ात ।
ढलता सूरज चाहिए मुझे
डुबो दोगे क्या
उसकी लाली को पिघलने दो
पूछेंगे कैसे करता हर दिन करामात ।
गहरा समंदर चाहिए मुझे
ठहरा दोगे क्या
लहरों को संभलने दो
बहते पानी में ढूंढेंगे जज़्बात ।
— स्वाति नैथानी
Read Complete Poem/Kavya Here ला दोगे क्या ...किसी ओर की माँ
जब माँ की याद सताती है
उसकी हर बात याद आती है
हर कोई माँ को याद कर रोता है
लेकिन यह कभी नहीं सोचता है
तूने कभी उसको खाना खिलाया था
तूने कभी हाथों से उसको दूध पिलाया था
तूने कभी दवाई पिलाई थी
क्या कभी उसके लिए नई साड़ी खरीदी थी
या केवल कफ़न ही खरीद कर लाया है
क्या उसके जन्म दिवस पर केक काटा था
क्या कभी उसे घुमाने ले गया था
उसका टूटा चश्मा कब बनवाया था
उसकी फोटो पर फूल चढ़ाता है
उसके नाम पर ग़रीबों को खाना खिलाता है
जैसा तेरा इन्तजा़र करती थी
क्या तूने वैसा इन्तज़ार किया
अब बरसों बाद विदेश से लौटा है
वृद्धाश्रमों में अब माँ को ढूँढता है
क्या चीथड़ों में उसे पहचान पाएगा
तू उसको ऐसे देखकर शरमा नहीं जाएगा
पहचानने से इन्कार भी कर देगा
दूरकी कोई रिश्तेदार बतायगा
अगर वह गले लगाना चाहेगी
तेरी आँख नीचे झुक जाएगी
क्यों सब दिखावा करता है
क्यों उसके लिए अब रोता है
अब आँसू बहाने से कोई मतलब नहीं
अब वह नहीं है तेरी माँ
अब वह है किसी ओर की माँ
संतोष गुलाटी
Read Complete Poem/Kavya Here किसी ओर की माँ