बुधवार, 2 दिसंबर 2015

पत्थर कौन उठाएगा...!!

सबसे पहले जो खुद को झुठलाएगा,
सच्चा वो उनका आशिक़ कहलाएगा।।

भीड़ से मेरे यार ने ये ऐलान किया,
सबसे पहला पत्थर कौन उठाएगा।।

अहले-शहर के हाथ कटे क्यों रब जाने,
कौन मुझे अब मेरा खून दिखाएगा।।

दुनियाँ में तो उसने बस इनकार किया,
देखें हश्र में वो कैसे झुठलाएगा॥

आखिर उनके सारे सितम अब ख़त्म हुए,
उनके सितम बिन क्या आशिक़ जी पाएगा॥

‘लेनिन’-सी इक लाश छिपी है हस्ती में,
रब जाने इसे कौन, कहाँ दफ़नाएगा॥

किसने छीना मेरा चैन-व-क़रार यहां,
आप न गर बतलाएं, कौन बताएगा॥

क्या मैं बताऊँ ‘ईश्क़ी’ उन तोहमातों की,
अब न मिटे जो ता-हश्र भी न मिट पाएगा॥
(C)परवेजं’ईश्की’

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