गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

रसोईघर

रसोईघर
रसोईघर एक किले से कुछ कम नहीं
उसकी स्वामिनी होती है एक गृहिणी
बर्तनों की आवाज़ और चूड़ियों की खनखनाहट से
किले में उसका होना संकेत है
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं

सब कामों पर उसका नियंत्रण होना
अपनी फ़ौज को युद्ध के लिए तैयार रखना
आभास होता है एक सुघड़ गृहिणी होना
कुछ गड़बड़ी हो तो रोक देना
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं

किले के द्वार खुलते ही गरम चाय की चुस्की देना
रात के भोजन के बाद द्वार का बंद हो जाना
गृहिणी की आज्ञा का पालन करना
बिना सज़ा दिए एक अपराधी को माफ़ करना
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं

मसालों की खुशबू और हलवे की सुगन्ध से
अन्नपूर्णा देवी के मंत्रों का शुरु हो जाना
कुक्कर की सीटी और दाल छोंकने की आवाज़ों से
वाद्ययंत्रों का बज उठना
रसोईघर की व्यवस्था करना एक किले से कुछ कम नहीं

उसके रसीले भोजन के चटकारे लेना
गृहिणी के लिए है जैसे किला जीतना
किले से दुर्गंध आने लगना
युद्ध हार जाने से कुछ कम नहीं
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं

गृहिणी का अपनी गलती को ढूँढना
किले का उथल-पुथल हो जाना
उसकी कोशिश का व्यर्थ न होना
फिर से किले को सुचारू रूप से चलाना
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं

थालियों की चमक में से झाँकती
उसकी माथे की बिंदिया
साड़ी के पल्लू से गीले हाथ
और माथे से पसीने की बूँदे पोंछना
सुघड़ गृहिणी होने से कुछ कम नहीं
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं

रसोईघर गृहिणी की रणभूमि है
और वह किले की महाराऩी
दूसरे किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं
चारों ओर से किले पर अपना आधिपत्य रखना
रसोईघर गृहिणी के लिए एक किले से कुछ कम नहीं ।।
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“प्यार”

पहली ठोकर ने मुह के बल गिराया
दर्द पुराना होने तक महसूस किया
दूसरी ठोकर ने सर खोल कर रखा दिया
होश आने तक जिंदगी हवा हो गई थी
तीसरी ठोकर ने आत्मा को रुला दिया

दुबारा न गिराने का इरादा कर
सोचा पत्थर ही हटा दे

पत्थर को जो देखा
दिल ने कहा, चलो फिर
ठोकर खाते है

क्योंकि उस पत्थर का नाम
"प्यार" था

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चिड़िया रानी.....(बाल कविता)

चूं चूं करती चिड़िया रानी
नित नया संगीत सुनाती है !
डाली-डाली, दौड़े वृक्ष-वृक्ष
प्रातकाल हमको जगाती है !!

उठो जागो हुआ सवेरा
अपनी धुन में गाती है !
आँखे खोलो, नही सोना
अब रैना बीती जाती है !!

उदय हुआ नव् दिन का
मधुर पवन गुनगुनाती है !
रवि बिखेरे अपनी किरणे
नभ में लाली बिखराती है !!

लहलाते वृक्ष हरे भरे,
पुष्पों से सुगंध आती है !
करलव करते नभ में पंछी
मिलकर सरगम गाती है !!

रोज सवेरे मेरे घर भी
एक नन्ही चिड़िया आती हैं !
छेड़कर वो मधुर संगीत
निश दिन हमे बताती है !!

उठ जाओ तुम मेरे प्यारो
तुम्हारी डगर बुलाती है !
राह देखती मंजिल तुम्हारी
ये रोज स्मरण कराती है !!

@@@___डी. के. निवातियाँ____@@@

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आरम्भ है प्रचंड… - www.sanatansewa.blogspot.com

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, या कि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, या कि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड……..
मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले, वही तो एक सर्वशक्तिमान है, – २
कृष्ण की पुकार है, ये भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है,
कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड़ हो जो लड़ सका है वोही तो महान है!
जीत की हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं, क्या ज़िन्दगी है, ठोकरों पे वार दो,
मौत अंत है नहीं, तो मौत से भी क्यों डरें, ये जा के आसमान में दहाड़ दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, या कि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
वो दया का भाव, या कि शौर्य का चुनाव, या कि हार का ये घाव तुम ये सो चलो, – २
या कि पूरे भाल पे जला रहे विजय का लाल, लाल यह गुलाल तुम ये सोचलो,
रंग केसरी हो या, मृदंग केसरी हो या कि केसरी हो ताल तुम ये सोच लो!
जिस कवि की कल्पना में ज़िन्दगी हो प्रेमगीत, उस कवि को आज तुम नकार दो,
भीगती मसों में आज, फूलती रगों में आज, आग की लपट का तुम बघार दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान,याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड…
आरम्भ है प्रचंड…
आरम्भ है प्रचंड…
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ http://sanatansewa.blogspot.com/

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राम जी

सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी
विश्राम से पहले ऊँचा, मुकाम देना राम जी
सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी

तुम्हीं हमें दुनिया में लाए, तुमने ही रास्ते दिखाए
चौड़ा हो सीना तुम्हारा, ऐसी पहचान देना राम जी
सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी

अजब मेले लगाए, गजब करतब दिखाए
बढ़ती ही जाए हरदम, वो दुकान देना राम जी
सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी

जो काम दिए तुमने, हो जाएं पूरे हमसे
हमको यथोचित प्यार और सम्मान देना राम जी
सपने तो दिए हैं अब उड़ान देना राम जी

रास्ते में चोर लुटेरे, हम आसरे पे तेरे
अचूक जाए तीर, ऐसी कमान देना राम जी
सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी

सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी
विश्राम से पहले ऊँचा, मुकाम देना राम जी
सपने तो दिए हैं, अब उड़ान देना राम जी

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जिसको भारत स्वीकार नहीं, वो पाकिस्तान चला जाए। - www.sanatansewa.blogspot.com/

अब वो नस्ल है बदल चुकी जब फिर से हिन्दू छला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,.. वो पाकिस्तान चला जाए
हम त्याग चुके वह मानवता,….जो कायरता कहलाती थी
कोई तिलक लगाता था तो वह कट्टरता समझी जाती थी
नियम न माने जो घर के….. वो लेकर सामान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,.. वो पाकिस्तान चला जाए
सर्व धर्म समभाव के बदले, भारत का अपमान नहीं होगा
माता को डायन कहने वालों का,. अब सम्मान नहीं होगा
जब तक चुप बैठे हैं.. वो बचा कर अपनी जान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,..वो पाकिस्तान चला जाए
जो जाति, धर्म, मज़हब का रोना,. छाती पीट कर रोते हैं
आतंकियों के मरने पर उनकी, मईयत में शामिल होते हैं
खून खौलता है सबका,…. कब तक हाँथों को मला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,..वो पाकिस्तान चला जाए
कुछ लोग देश में गद्दारों को भी साहब और जी कहते हैं
जयचंदों से है इतिहास भरा,… ये हर युग में ही रहते हैं
हमदर्द हो जो गद्दारों का,.. वो खुद शमशान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,वो पाकिस्तान चला जाए
हर मज़हब को अपनाया हर धर्म को हमने शरण दी है
इस उदारवाद ने ही केवल, मर्यादा अपनी हरण की है
ऐसा दानी क्या कि खुद का नाम ओ निशान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,वो पाकिस्तान चला जाए
राष्ट्र की बलिवेदी पर जो भी कुर्बान हुआ वो तरा ही है
जिसे धर्म धरा पर गर्व नहीं वह जीवित हो भी मरा ही है
वीर सुभाष, भगत सिंह का व्यर्थ न बलिदान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,.वो पाकिस्तान चला जाए
शान्ति शान्ति करते करते कितना नुकसान करा बैठे हैं
हम जिनको भाई कहते हैं, वो कब से ले के छुरा बैठे हैं
कहीं इतनी देर न हो जाए, कि सब सम्मान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,वो पाकिस्तान चला जाए।। http://sanatansewa.blogspot.com/

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जिसको भारत स्वीकार नहीं, वो पाकिस्तान चला जाए। - www.sanatansewa.blogspot.com/

अब वो नस्ल है बदल चुकी जब फिर से हिन्दू छला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,.. वो पाकिस्तान चला जाए
हम त्याग चुके वह मानवता,….जो कायरता कहलाती थी
कोई तिलक लगाता था तो वह कट्टरता समझी जाती थी
नियम न माने जो घर के….. वो लेकर सामान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,.. वो पाकिस्तान चला जाए
सर्व धर्म समभाव के बदले, भारत का अपमान नहीं होगा
माता को डायन कहने वालों का,. अब सम्मान नहीं होगा
जब तक चुप बैठे हैं.. वो बचा कर अपनी जान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,..वो पाकिस्तान चला जाए
जो जाति, धर्म, मज़हब का रोना,. छाती पीट कर रोते हैं
आतंकियों के मरने पर उनकी, मईयत में शामिल होते हैं
खून खौलता है सबका,…. कब तक हाँथों को मला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,..वो पाकिस्तान चला जाए
कुछ लोग देश में गद्दारों को भी साहब और जी कहते हैं
जयचंदों से है इतिहास भरा,… ये हर युग में ही रहते हैं
हमदर्द हो जो गद्दारों का,.. वो खुद शमशान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,वो पाकिस्तान चला जाए
हर मज़हब को अपनाया हर धर्म को हमने शरण दी है
इस उदारवाद ने ही केवल, मर्यादा अपनी हरण की है
ऐसा दानी क्या कि खुद का नाम ओ निशान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,वो पाकिस्तान चला जाए
राष्ट्र की बलिवेदी पर जो भी कुर्बान हुआ वो तरा ही है
जिसे धर्म धरा पर गर्व नहीं वह जीवित हो भी मरा ही है
वीर सुभाष, भगत सिंह का व्यर्थ न बलिदान चला जाए
जिसको भारत स्वीकार नहीं,.वो पाकिस्तान चला जाए
शान्ति शान्ति करते करते कितना नुकसान करा बैठे हैं
हम जिनको भाई कहते हैं, वो कब से ले के छुरा बैठे हैं
कहीं इतनी देर न हो जाए, कि सब सम्मान चला जाए
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" मुमकिन है "

मुर्दे में जान फूंकना
मुमकिन नहीं
लाशों में आवाज़ फूंकना
मुमकिन नहीं

मुमकिन है
जीते जी बंजर न बनना
मुमकिन है
मरने से पहल ना मारना…!

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बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा ।

ग़ज़ल.कल न लौटेगा दुबारा।

क़द्र उसकी क्यों करें हम जिंदगी से जो है हारा ।
चल रहे है ठोकरों पर आज हम भी बेसहारा ।।

हारने का ये तो मतलब हैं नही क़ि टूट जाओ ।
टूटने के दर्द का तुम कुछ करो एहसास प्यारा ।

मिल सकेगी न कभी मंजिल उसे तुम मान लेना ।
जो निकल दरिया से भागा बुझदिलो सा कर किनारा ।।

उम्र भर जिसने न समझा उम्र की तरकीबिया को ।
उम्र ढल जायेगी उसकी क्या करेगा बन बेचारा ।।

ख़्वाब सपने जो सजायें चल उसे कर दे हक़ीक़त ।
वक़्त गुजरा न मिलेगा कल न लौटेगा दुबारा ।।

सोचने की उम्र तो अब है नही मेरे दोस्त रकमिश” ।
कब उड़ोगे हौसलों के पंख का लेकर सहारा ।।

—R.K.MISHRA

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अलंकृत दोहे ......

अलंकृत दोहे ……

कल कल करलव करती कावेरी बहती करके कलनाद !
शीला सहित अगड बगड, नहाते उतरे जीवन नैया पार !!

घन घन करती घटा चली,गरजे घट में उमड़े घनघोर !
अंतर्मन में संशय उठते, घबराहट में करत अति शोर !!

पत्ता पत्ता पेड़ से पड़ा पेट बल, गिर मिटटी में हुआ भोर विभोर
पवन पुरवाई पुरजोर चली, वनस्पति कांपे होकर झकझोर !!

घट में घटती घनी घटना, घट विच घट में ही घटती रही !
विषमताओं में उलझे प्राण, उम्र जीवन पर्यन्त कटती रही !!

मन मयूर मांगे मेघ मलहार, नृत्य मग्न हो लगावत आस !
कबहुँ आवे मोरे सावरिया, कितने बरसो में नही आये पास !!

!
!
!
!!________डी. के. निवातियाँ _____!!

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प्राण

हे भगवान!
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

सुख चैन ढूँढते
उस खुशहाल गांव के
ग्रामीणों की तरह
जो आने के एक दुष्ट जादूगर से
हो गए हे बेचैन, परेशान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

उस राजकुमार की तरह
जिसने बंधाई ग्रामीणों की उम्मीद
जो करेगा दुष्टता का अंत
देगा पुनः चैन की नींद
लौटेगा उनका सम्मान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

उन ग्रामीणों और राजकुमार की तरह
जो हैं हैरान
जादूगर तो चित्त है चारों खाने
फिर भी हँसता है, कैसै जाने?
"मरणासन्न हूँ! मार नहीं पाओगे
दूर देश बसे तोते में रखे हैं मेरे प्राण
तुम कैसे पहुँच जाओगे"
हे भगवान!

कहानी ने याद दिलाया
प्राणों को दाना बना
अपने परिंदों को खिलाया
परिंदों की ऊँची उड़ान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

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बधाई सन्देश .......!!

यह कविता मैंने अपने दोस्त को उसके जन्मदिन पर भेट की थी, आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ !!

तुम्हे आज क्या दू मै तोहफा,
कुछ भी तो नहीं पास मेरे देने के लिए !
देता हु तुमको आज कुछ
शब्दों की माला जीवन में अपनाने के लिए !
राह कठिन हो न घबराना,
कांटे से गुजरना जरुरी है फूल पाने के लिए !
सुख दुःख है जीवन का फेरा,
हर शै: को अपनाना, सफलता पाने के लिए !
चलना सदैव सत्य और प्रगति के पथ पर
बहुत जरुरी है जीवन में आत्मसम्मान पाने के लिए….!!
!
!
तुम्हारा शुभाकांक्षी ……!!
!
डी. के. निवातियाँ ………!!

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हाइकू.जय माता दी.

।हाइकू।जय माता दी।

अभी सबेरा
दोपहर के बाद
छायेगी श्रद्धा

पुनः शाम को
कलरव आरति
शंख ध्वनि से

लगेंगे तांते
हल्दी चन्दन टीके
अलख जगेगा

भव्य रूप का
झिलमिल चित्रण
दर्शन होगा

बजे नगाड़े
गूँजेंगे जयकारे
जय माता दी

—R.K.MISHRA

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ग़ज़ल.दिवाने याद रहते है.

.ग़ज़ल.(दिवाने याद रहते है)

तेरी नजरो की ख़ामोशी , तराने याद रहते है ..
लगे जब हम कभी तुमको मनाने याद रहते है..

भले खुद को लुटा दे तू हमारी शौक में हमदम .
मग़र वो दर्द के तेरे जबाने याद रहते है …

बहुत कम फ़ासले थे पर कभी कोशिस न की तुमने ।।
न मिलने के तुम्हारे सब बहाने याद रहते है ।।

हमारे दिल की राहो को तुम्हारा यूँ कुचल जाना .
नही अब जख्म होते पर पुराने याद रहते हैं ..

कभी आना तो देखोगे नही बाक़ी है तन्हाई ..
मग़र तेरे गम के मंजर के तराने याद रहते है ..

करो तुम लाख कोशिस पर मुझे न भूल पावोगे .
खुदा भूले तो भूले पर दीवाने याद रहते है ..

अभी भी वक्त है हमदम इरादा हो चले आना ..
तेरे आगोश के लम्हे सुहाने याद रहते है . .

×××

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ग़ज़ल.मुझे भी डर नही लगता.

ग़ज़ल .मुझे भी डर नही लगता
R.K.MISHRA

अब तेरे बिन घर मेरा ये घर नही लगता .
अब अँधेरो से मुझे भी डर नही लगता .

आयेगी तू लौट कर मुझको अभी भी है यकीं .
बेबसी तब तक रहेगी पर नही लगता .

रूप तेरा आ ही जाता है अँधेरी रात में .
चाँद सा चेहरा वो संगमरमर नही लगता .

तू जो थी तो जिंदगी भी चल रही थी साथ में .
अब जी सकूँगा एक पल अक्सर नही लगता .

उस नदी के पास जो तू एक दिन मुझसे मिली थी .
ढूढ़ता हूँ दरबदर पर वो दर नही लगता .

इन नतीज़ो की न माने तो मेरे इस दिल की सुन ले .
ये धड़कता है अभी पथ्थर नही लगता .

एक पौधा सींचता हूँ मैं मेरे इन आंशुओं से .
लाख़ चाहू पर अभी तो फर नही लगता .

ढह ही जायेंगे घरौंदे अश्क़ की बरसात से .
बच सकेंगे प्यार के मंज़र नही लगता .

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ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .

.ग़ज़ल.प्यार का बाज़ार है .
R.K.MISHRA

तुमने सजा रखा है जो ये प्यार का बाज़ार है .
ये डुबो देगा तुम्हे भी दिल तेरा गद्दार है .

तोड़ दिल को जो गये तुम वक्त से पहले मेरा .
प्यार के काबिल न छोड़ा हो गया बेकार है .

है पता तुमको नही क्या हुआ होगा यहा .
सर्द मौसम गम भरे अब अश्क़ की भरमार है .

सह अकेले मैं रहा हूँ दर्द की वो सलवटे .
ढल रही अब चांदनी चाँद भी लाचार है .

फ़िक्र मत कर बद्दुआये मैं कभी दूँगा नही ..
पर तेरे इस संगदिल पर मेरा धिक्कार है .

रूप तेरा भी ढलेगा एक दिन तुम देख लेना .
फ़ैसला होकर रहेगा बस वक्त का आसार है..

×××

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ग़ज़ल गीत.हर कोई इंसान था.

।।ग़ज़ल गीत ।।हर कोई इंसान था।।

दोस्तों से क्या कहूँ मैं रंजिसे बढ़ने लगीं है .
अब वफ़ा के नाम पर जब साजिस होने लगी है .
प्यार की महफ़िल सजी थी रास्ता आसान था .
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..

जब चले थे कारवां था, हमवफा थे लोग अपने .
थे सजाये चल रहे थे आरजू कुछ ख्वाब सपने .
मिल रही थी मंजिले दिल मेरा नादान था ..
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..

दर्द से वाक़िब नही थे, न ही गम के ज़लज़ले थे .
प्यार की चाहत मिली बस साथ सबके चल पड़े थे .
महफ़िलो से महफ़िलो तक रास्ता आसान था .
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..

सब बिछड़ते जा रहे थे पा के महफ़िल प्यार की .
फासले बढ़ते रहे पर थी ख़बर न हार की ..
साहिलों पर अकेला था मगर अनजान था ..
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..

खो गये है दोस्त सब पाके इक शाया किसी का .
न खबर आयीं किसी की न ही खत आया किसी का .
अश्क़ आँखों से बहे थे दर्द का एलान था ..
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..

R.K.MISHRA

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ग़ज़ल.हर मज़ा बेकार सा था .

।गजल।हर मज़ा बेकार सा था।

वक्त था पर दर्द में हर अश्क़ बेजार सा था ।।
साहिलों पर जो भी मिला हर शख़्स गुनेहगार सा था

मुद्दतो बाद जब हुई शिद्दत किसी को पाने की ।।
बोली लग रही दिल की हर महफ़िल बाजार सा था ।।

न गम थे ,न ज़फ़ा थी,और न थी वहाँ तन्हाइयां भी ।।
फासले भी नही थे पर हर मजा बेकार सा था ।।

इल्म न था खुद के ऊपर जश्न तो पुरजोर था ।।
जम रही महफ़िल के ऊपर दर्द का बौछार सा था ।।

हर कोई था दर्द से वाक़िब मग़र ख़ामोश था ।।
प्यार से जादा उसे उस दर्द पर एतबार सा था ।।

हो रही थी गुप्तगू पर बढ़ रही थी रौनके भी ।।
इश्क़ का दरिया वही पर हर कोई बेकरार सा था ।।

थी वहा पर चाहते पर ख्वाहिशो की क़द्र न थी ।।
बच निकल आया वहा पर प्यार तो दुस्वार सा था ।।

R.K.MISHRA

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Read Complete Poem/Kavya Here ग़ज़ल.हर मज़ा बेकार सा था .

ग़ज़ल.न तुझमे कमी है न मुझमे कमी है .

।गज़ल।न तुझमे कमी है ।।

वहाँ तेरे आँगन में महफ़िल जमी है ।
यहाँ मेरे दिल पर गमे रौशनी है ।।

भले आज तेरी नजर न उठे ये ।
जो चेहरे से हटकर जमी पे ज़मी है ।।

मग़र आज मुझको पता चल गया है ।।
यक़ीनन छटेगा ये गम मौसमी है ।।

बहेगी हवा कोई चाहत की गर तो ।
ढहेगा तेरा गम ये जो रेशमी है ।।

अग़र हौसला हो जरा आज कह दे ।।
न तुझमे कमी है न मुझमे कमी है ।।

जरा पास आकरके आँखों में झांको ।।
पलको पे उभरी नमी ही नमी है ।।

अग़र पास में हो छिपा लेना वो खत ।। दिखाना न उसका यहा लाज़मी है ।।

असर हो रहा है ये गम के है लम्हे ।
ग़र तस्वीर तेरी दिल में थमी है ।।

चलो अब तो लब्जे जुबाँ से तो बोलो ।
न मैं मोम हूँ न तू कोई ममी है ।।

……R.K.MISHRA
***

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Read Complete Poem/Kavya Here ग़ज़ल.न तुझमे कमी है न मुझमे कमी है .

ग़ज़ल.मेरी करते शिक़ायत है.

।ग़ज़ल।मेरी करते शिकायत हैं।

मेरे हमदर्द वो है जो मेरी करते शिकायत है ।।
दिलोँ से याद करते है जुबां करती बगावत है ।।

बढ़ी है रंजिसे तो क्या फ़िकर करता हूँ उनकी मैं ।
उनके हमवफओ की मेरे इस दिल में इज्जत है ।।

ज़रा मग़रूर रहते है मग़र धोख़ा नही देते ।।
छुपे रुस्तम नही होते अभी उनमे ग़नीमत है ।।

बढ़ें है फासले तो क्या कभी हम एक तो थे ही ।
किसी भी दोस्त से बढ़कर अभी उनकी भी कीमत है ।।

कभी हमको मिली खुशियां उन्हें न गम हुआ होगा ।
उन्होंने ख्वाब में देखा मिली उनको भी जन्नत है ।।

आदत है नही उनकी करे तारीफ़ झूठी वे ।
मग़र तारीफ़ से बढ़कर लगी उनकी नफ़ासत है ।।

यकीनन दोस्त न ठहरे मग़र हैं दोस्त के क़ाबिल ।
उन्हीँ की बद्दुआओं में छिपी मेरी मुहबत है ।।

— R.K.MISHRA

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