शनिवार, 28 नवंबर 2015

क्या बोया , क्या पाया, क्या खोया ............?

क्या बोया, क्या पाया, क्या खोया…?
बहुत कुछ बोया, बहुत कुछ पाया, बहुत कुछ खोया.!
अब जब बीत गयी ज़िन्दगी तीन चौथाई, फिर भी समझ नहीं पाता
क्या कुछ बोया,क्या कुछ पाया,क्या कुछ खोया ?

बचपन खो गया, जवानी के इंतज़ार में?
जवानी खो गयी, सब कुछ पा लेने की आस में?
और आज……?
खड़ा हूँ उम्र की उस दहलीज़ पे, जिसे सब बुढापा कहते हैं ..!
पीछे मुड़ कर जब भी देखता हूँ,आती और जाती रहती है ..!
एक एक तस्वीर मानस पटल पे, पर,कुछ भी ठहर नहीं पाता.!

और फिर……..?
मैं रह जाता हूँ, अकेला, उसी चिंतन में ..!
क्या बोया, क्या पाया, क्या खोया.?

अजीब सी विडिम्बिना है ? नियति आखिर क्या है इस ज़िन्दगी की ?
धन, दौलत, यश, नाम, प्रसिद्धी, पर इनका तो कोई अंत नहीं ?
बार बार यक्ष की तरह वही प्रश्न कुदेरता रहता है..?
क्या बोया, क्या पाया, क्या खोया…………….?

तो फिर ………….?
बंद मुठ्ठी आया था अकेला इस संसार में,
खाली हाथ पसारे जाऊंगा अकेला इस संसार से,
अब तो यही लगता है, सब कुछ पाया, बस खोने को ?

पर ईश्वर……………..?
वह तो विद्यमान था सदैव हमारे ही अंदर
क्यों देर कर दी उसे पहचानने में,क्यों तलाश कर नहीं सका सारी ज़िन्दगी …………..!
भटकता रहा, फिर भी जान न पाया अपने ही अंदर के विद्यमान ईश्वर को………..!

और अब
इस बची हुई एक चौथाई ज़िन्दगी में?
तलाश करने की कोशिश करता हूँ उसे?

पर
अब यह शरीर साथ नहीं देता………!
यह तो बूढा हो गया है ………….!
रहता है ग्रसित हर वक्त किसी न किसी बीमारियों से….!
किसी न किसी दर्द से घिरा रहता है ये शरीर ?
या यूं कहें की दर्द ही अब ज़िन्दगी बन कर रह गयी गयी है.!

बस ईश्वर को पा लूँ, यही चाहत और इच्छा है प्रवल मेरी
ध्यान लगाने की, तलाश करने की कोशिश हर वक्त करता हूँ..!
पा लेने को आपमे अंदर विद्यमान उस ईश्वर को,
जो हमारा ही था, पर हम बैठे थे भूल उसे ?

पर कहाँ…?
अब तो सारा ध्यान दर्द की ओर लगा रहता है …………..!
सोचता हूँ कि कहीं यही दर्द ईश्वर बन कर तो साथ नहीं रहता मेरे ?

————————————————————

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"ना बांटो देश को मेरे"

ना बांटो देश को मेरे, यूँ तुम बदनाम लहज़े में ,
मकां है ये हिन्दू का , ये घर भी है मुस्लिम का |
जो कर रहे शाजिश हमारे सब्र की हद की ,
जो टूटा बांध दरिया का , तो सब उनको डूबा देगा ||

यहाँ हिंदी भी बसती है और उर्दू गीत गाती है ,
मेहदी हरी होकर भी रंग लाल पाती है |
ये मेरे देश की मिटटी की ताकत है मेरे दुश्मन ,
की जितना भी हमे तोड़ो, ये हमको फिर जोड़ जाती है ||

—– > कि ये देश ना असहिष्णु था ना होगा कभी,
ये मुल्क ‘बिस्मिल’ का भी था और था ‘अशफ़ाक़’ का भी

——– कवि कौशिक

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पिता

बचपन से एक ही चाहत लिए चला हु ,
आगे चलकर तेरे जैसा बनूँगा ,
चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न बन जाऊं,
तेरा कृतज्ञ तो हमेशा रहूँगा ,
अपनी क़ाबलियत पे तुझे तब गर्व होगा ,
जब ख्वाब तेरे होंगे और पूरा मै करूँगा |

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शायरी

बैठे हुए है तेरे रूबरू ऐ ज़िन्दगी ,
तू मंज़िल लिए हुए मै हौसला लिए हुए ||

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शायरी

बगावत कैसी भी हो बेखौफ होनी चाहिए ,
रास्ते कैसे भी हो एक मंज़िल होनी चाहिए ,
वक़्त एक चीज़ जरूर सीखाता है ,
हालात कैसे भी हो कदमताल होनी चाहिए ||

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" वक़्त की हार "

लिखा नहीं है कुछ आसमानो पे ,
फिर भी रोज़ ढूंढता हु अपनी किस्मत इन सितारों में ,
छोड़ रखी है अपनी ख्वाहिशें इन खुली हवाओं में ,
दिक्कतें बहुत लिखी है मंज़िल तक इन राहो ने ,
रोज़ एक नयी जंग लड़के आ रहा हु ,
इस ज़िन्दगी के फलसफे में अपनी ख़ुशी तलाश रहा हु ,
रोज़ हारता हु फिर लड़ता हु ,
जीत की उम्मीद में अपने हौसले को तराश रहा हु ,
एक पल आएगा जबमंज़िल मेरे जूनून और काबिलियत की गुलाम होगी ,
जब मै बेखौफ हसूंगा, वक़्त उस दिन तेरी हार होगी ||

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शायरी

बाटना सीख मुस्कराहट को हर सांस को बोझिल न बना ,
बहना सीख लेहरो की तरह अपने जीवन को स्थिर साहिल न बना ,
माना के संघर्ष आसान नहीं है जीने के लिए ,
थोड़ी सी हिम्मत और दे लेकिन मुझे बुझदिल न बना ||

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शायरी

इंसानियत कही नहीं लेकिन धर्म बहुत है
ज़िन्दगी छोटी सी है लेकिन अरमान बहुत है ,
सोचता हु बढ़ती उम्र के साथ थोड़ी मासूमियत ही बचा लू ,
यहाँ ज़िंदगानी के लिए जगह नहीं लेकिन शमशान बहुत है !!!

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शायरी

माँ की लोरी से अच्छा कोई संगीत नहीं ,
पिता के जीवन से बड़ी कोई सीख नहीं ,
यु तो जंग रोज़ लड़ता हु रिश्तो से मै,
लेकिन माफ़ करने से बड़ी कोई जीत नहीं ||

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शायरी

जब तक ऐब इश्क़ और इबादत कबूल नहीं होते ,
वो कामयाब नहीं होते ||

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अब,रचना डॉ उमेश चमोला

दुनियां में चैन अमन नहीं है अब,
तरसती लाश के लिए कफन
नहीं है अब,
खुदा जाने क्या होगा अब?
शैतान के पाश में
बांध चुके हैं सब.
—–डॉ उमेश चमोला

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शायरी

दिल तड़पता है मेरा प्यार के लिए
किसी की हसरत भरी नज़रों के दीदार के लिए
ऐसे तन्हा यूँ कब तक जिऊंगा मै
कोई अपना तो हो इंतज़ार के लिए

तुम आओगे एक दिन ऐतबार है मुझे
और बात भी क्या है जो इस जहाँ में जी रहे हैं
हैरां न हो ए जिंदगी यूँ तनहा देख कर
ग़मो ने हाथ पकड़ा है जो आज पी रहे हैं।

ख़ुशी की तलाश में ज़िन्दगी गुजर गई
ख्वाबों की तासीर आँखों से खो गई
जीने का सलीका सिखाया था जिसने कभी
वो शबनम भी आज अंगारों की सेज़ हो गई।

…………देवेन्द्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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दुविधा

क्या आपको नही लगता ?
कि आजकल हो गई ,
ढेरों सुविधा ने ,
बहुत दुविधा ,
पैदा कर दी है.

टी.वी. पर आ रहे ,
विभिन्न चैनल की सुविधा की ही,
बात लीजिए ,
पहले जब टी. वी. पर मुख्य दो ही ,
प्रोग्राम आते थे ,
वोह थे बृहस्पतवार को चित्रहार ,
और इतवार को हिंदी सिनेमा।
हम उसके इंतजार में ,
बाकी पांच दिन ,
ख़ुशी ख़ुशी काट देते थे।

अब तो टी. वी. पर सैंकड़ों ,
चैनल आते हैं ,
चैनल तो हैं ,
पर चैन नहीं,
क्युंकि हम सारा परिवार ,
एकसाथ बैठ कर कोई एक ,
मनपसंद प्रोग्राम नही देख सकता है।

सिर्फ चैनेल ही क्यों ?
अब तो एक घर मेँ ,
टी.वी. भी अनेक हो गये हैं ,
ताकि हर सदस्य अपने ही ,
कमरे में अपने टी. वी.पर ,
अपने पसंद का चैनल देख सके।

मगर उसमे भी किसी को चैन कहाँ है ?
ऐड आने पर वो दूसरा ,
फिर तीसरा चैनल बदलता है।

क्या आपको नही लगता ?
कि आजकल हो गई ,
ढेरों सुविधा ने ,
बहुत दुविधा ,
पैदा कर दी है.

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

“बीटेक के चार वर्ष”

किसी नयी मंजिल की ओर
पहला कदम रखते हुए,
बीटेक की आखिरी सीढ़ियों से
उतरते हुए…
दिल के किसी कोने मे
सपनों के बिछोने मे,
बीते हुए पलों का मधुर संगीत,
किसी पुराने बरगद की
शीतल छाँव की भांति,
अपने साये मे कुछ देर और
ठहर जाने का निवेदन कर रहा है।
और इस निवेदन के प्रकाश मे चमकते,
पिछले चार वर्ष बड़े गर्व से
मेरे जीवन मे अपने वर्चस्व की
व्याख्या कर रहे हैं।।
रिमझिम बरसात है
अभी कल ही की तो बात है।
अपने बस स्टॉप पे खड़े हम लोग,
कॉलेज बस का इंतजार कर रहे हैं;
और रैगिंग पर उठने वाले वाद-विवाद से
रोमांचित हो रहे हैं।
वहीं हुमसे कुछ दूर खड़ा
जाने किस बात पर अड़ा,
सीनियर्स का एक समूह
रह-रह कर चिल्ला रहा है;
और रैगिंग की विभिन्न योजनाए
बना रहा है।
अद्भुत मुलाक़ात है
अभी कल ही की तो बात है।
कॉलेज बस के अंदर
हम लोग जैसे बंदर,
सीनियर्स रूपी मदारी के हाथों की
कठपुतली की भांति कूद रहे हैं;
और जाने अनजाने एक दूसरे
के कानो मे अपनी-अपनी प्रतिभा
के मंत्र फूँक रहे हैं।
वो देखो "हिमांशु" मूँगफली बेच रहा है,
और "मेहदी" गाने गा के सबका
ध्यान खीच रहा है;
परिचय दे देकर "राजकुमार" बेहाल है
सबसे जुदा मगर "कृष्णा" की चाल है ।
चंचल प्रभात है
अभी कल ही की तो बात है।
कॉलेज बस मे गूँजते नारे,
नैनी ब्रिज पर गंगा मैया के जयकारे,
बाहर खड़े लोगों का
ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं;
और उल्लास की आभा मे दमकते चेहरे
अपने आनंद की कहानी कह रहे हैं।
"अनंत जी का जोश
नया गुल खिला रहा है,
सारे चुप हो जाओ
देखो "बाँके लाल" आ रहा है।
क्या अजीब इत्तेफाक़ है
अभी कल ही की तो बात है ।
"वैभव शर्मा" अपने मोटापे से परेशान है,
कहता है योग करो तो
सब मुश्किल आसान है।
"अर्चना" और "पूजा" का
गोल-गप्पे खाने का प्लान है,
पर उन्हे शायद पता नहीं
आज बंद दुकान है ।
मौज मस्ती की सौगात है
अभी कल ही की तो बात है।
किसी क्लास मे कोई टिफिन खुला है
पर ये क्या ! टिफिन जिसका है
उसे खाने को कुछ भी नहीं मिला है।
इधर "अपूर्व" के चुटकुलों का
एक दौर चला है
लगता है अपना पूरा कॉलेज ही चुटकुला है।
"स्वप्निल सर" कह रहे
कि "धीरज" होशियार है,
सब उसकी बात मानो
वो क्लास का सी-आर है।
अब "धीरज" कहेगा,
तभी क्लास मे आएंगे
नहीं तो सारे लोग बँक पे जाएगे।
फ्री पीरियड है
चलो लाइब्रेरी बुला रही है
"अपूर्व"की टोली वहाँ भी
महफिल सजा रही है।
"शुचिता" "रहमान" के
किस्से सुना रही है,
और आलसी अनिल को
नींद आ रही है ।
"उपाध्याय" अपने ज्ञान कुंज से
ज्ञान के कुछ पुष्प लाया है,
और हमारी नीरस निरर्थक वार्ता को
सरस सार्थक बनाया है ।
उधर "हिमांशु" और "दीपिका" मे
हो रही लड़ाई,
"अर्चना" ने "धीरज" को पकड़ा
तो उसकी शामत आयी।
जाने किस विचार मे
डूबें हैं "पवन भाई",
आलू खा कर "इंस्पेक्टर" ने है
खूब धूम मचाई।
Exams आ गए है
अभी तक की नहीं पढ़ाई,
पर सेमेस्टर exams की
परवाह किसको है भाई!
हम तो चले चाचा की
गुमटी के तले,
जिनको है परवाह
वो हमारे हिस्से का भी पढ़े।
हम तो exams से एक दिन पहले
किताब खरीदने जाएगे
मिल गयी तो ठीक है
नहीं तो तक़दीर आजमाएगे ।
महके हुए जज़्बात हैं
अभी कल ही कि तो बात है ………
"वैभव" "सुमित" और "तृप्ति" अपने
रिश्ते को एक नया नाम दे रहे हैं,
और अपनी दोस्ती को
एक नया आयाम दे रहे है।
निधि ने अपनी क्लास मे
एक मंच सजाया है
जहां सब ने सब की खातिर
कोई गीत गुनगुनाया है।
ये गीत ही कल प्रीत की
प्रभा मे काम आएंगे।
और रूठे हुए अपने
मनमीत को मनाएगे।
और और रूठे हुए अपने
मनमीत को मनाएगे।।

———देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

स्मृतियाँ-यह कविता कॉलेज के आखिरी दिन की भावनाओं से प्रेरित है जब हम मित्रगण एक साथ कॉलेज मे चार साल गुजारे पलों को याद करते एक दूसरे से विदा ले रहे थे ।

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"आजकल "

होती किस्मत मेरी इन सितारों में,
तो देह मेरा पार्थिव न होता ,
डर बिकता है इन बाज़ारो में इसलिए ,
क्यूंकि मुस्कराहट का आजकल व्यापार नहीं होता ||

अगर आंकलन होता सिर्फ लिबाज़ से मेरा,
तो कफ़न का रंग कभी सफ़ेद न होता ,
बन रहा बनावटी हर चेहरा यहाँ इसलिए ,
क्यूंकि सादगी का आजकल प्रचार नहीं होता ||

होती अगर मेहर तेरी हर एक बन्दे पे ,
तो तेरे द्वार पे मैँ भूखा नहीं सोता,
सियासत होती है रोटी पे इसलिए ,
क्यूंकि गरीबी का आजकल धर्म नहीं होता ||

अगर होता इश्क़ आसान मेरे यार,
तो हीर-राँझा लैला-मजनू का चर्चा नहीं होता ,
बदल रहा हु अपना प्यार हर दिन अब इसलिए ,
क्यूंकि मोहब्बत में आजकल सब्र नहीं होता ||

अगर ले कर जा सकता धन दौलत साथ में ,,
तो मेरा कभी कोई उत्तराधिकार न होता ,
झूठ जीत रहा हर जंग यहाँ इसलिए ,
क्यूंकि सच के साथ आजकल इन्साफ नहीं होता ||

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अब अपने घर मे शोचालय बनवाले

मेरी विनती को आज मानव तु अपना लें,
मर्यादा, लाज, शर्म को ढलने से बताले,
अब अपने घर मे शोचालय बनवाले! देश शर्म से झुक रहा है, मानव का मे तुल रहा है! अपने देश के आशीयानों की तु लाज बचाले!
अब अपने घर मे शोचालय बनवाले! बहु बेटियों की आशाऔ पर, लाज शर्म की परिभाषाओ पर! नारी का सम्मान बडा लें!
अब अपने घर शोचालय बनवालें! नारी को इज्जत कहते है, दिन रात घुघंट में रखते है!
कहा जाती ये बाते जब वह डिब्बा लेकर जाती है!
अपनी मर्यादा को डिब्बे मे ना ढलने दे
अब अपने घर ………. पहला सुख निरोगी काया, अब यह तो दिखने में छाया,
खुले में मल जाने से, आज तक ना पनप पाया है!
आज तु इसको आजमा लें! अब अपने … …….
सरकार ने अभियान चलाया, मेहन्दुरिया का नाम भी आया!
घरघर जन-जागृती कर, स्वच्छता का दीप जलाया!
आज आपकी बारी है स्वच्छता अपना लें!
अब अपने …….
आज हमारी आशाओ पर, स्वच्छता की परिभाषाओ पर!
खुले में ना हो मल त्याग, बिमारियो का होगा त्याग!
स्वच्छता का दीप जलाकर अब ODF करवा लें
अब अपने घर शोचालय बनवाले!

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ek mulaqat

dekha tha jab usko pehli dafa
pareshan si thi, thi thodi khafa

mausam us din kuchh ashiqana sa tha
barish ki boondein thi rukne ka bahana sa tha

kinare khadi thi shayad tha kisika intezaar
us aasmaan ki pari se mujhe ho gaya tha pyaar

bheegi si zulfe uske gaalo ko chumti thi
sehmi si aankhein jane kisko dhundhti thi

chhoti si naak thi masum sa chehra tha
un khubsurat labon pe khamoshi ka pehra tha

aage badhe ham thoda ab unke kareeb the
unhone dekha hamein ham khushnaseeb the

hamein dekh apne paas wo haule se muskaai
hamne bhi jawab mein apni palkein jhukaai

kehna tha bahut par lafzon ne sath na diya
chhut gaya waqt hamse kismat ne hath na diya

tezi se ek sawari aakar unke samne ruki
dekha unhone hamein or adab se jhuki

unki sawari ja chuki thi ham wahin khade nihaarte rahe
us ek mulaqat ki yaadein hamare khwabon ko sanwaarte rahe…..

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वीरप्पन

ऐसा था उसका जीवन !
नाम था उसका वीरपन्न !
एेसा था उसका जीवन !
गरीबो के प्रति था अपना पन !
याद करका है जन जन !
ऐसा था उस का…………..!
शुरू हुआ उसका जीवन ,मुख मरी से तोडा माँ नें दम !
दवाई के लिए पैसे ना थे , खाने के लिए ना था अन्न !
एेसा था ……………………….!
14 वर्ष की आयु थी , बात यह पुरानी थी !
पैसा की जरूरत थी , कैसे बजाये पैसो की खनखन !
ऐसा …………… . ……….!
फिर एक चक्कर चलाया , दो हाथी मार गिराया !
बाजार में बेच आया ,कुछ पैसे ले आया !
कुछ रखा कुछ गरीबो मे बाट आया ,इतना ही था उसके पास धन !
ऐसा …………………………….!
मन में जोस था , ईश्वर दोस्त था !
जीवन भी जीना था , वन मे ही रहना था !
हाथ मे उठा ली गन !
ऐसा ……………………………!
उमर की बडती कतार ,कर रहा हाथ दांत का व्यापार !
मन में था गरीबो के प्रति प्यार , करने लगा चन्दन व्यापार !
जहां रहता वहां था वन !
ऐसा …………………………..!
जीवन से ना गबराया , मन्त्री क्या खन्त्री भी आया !
उसने बडे बडे नेता को मार गिराया !
कभी बन्दी बनाया तो , कभी छोड आया !
उसको चाहिये धन !
ऐसा……………………………………!
उसने मन्त्री खन्त्री को डराया , राज कुमार अभिनेता को ले आया !
कई वन रक्षक रो मार गिराया , लूट लिया इस माटी का धन !
ऐसा ………………………….!
सरकार मन्त्री ने चक्कर चलाया , एक बडा गिरोह बनाया !
देख मोका उसे मार गिराया , उसकी आंखो मे था मोतियाबिन्द !
ऐसा ………………………………!
उसमें एक बात अच्छी थी , मुह पर बडी बडी मुछै थी !
उसका एक कसुर था , क्योकी वो गरीब था !
उसके जीवन का हो गया अन्त !
ऐसा था उसका जीवन , नाम था उसका वीरप्पन !

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मुसाफिर

हम सब मुसाफिर है जिंदगी की राहो के
हँसते – रोते यंहा तुफानो से टकराना है!
!
निकले है पाने को आशाओ के नजराने
मंजिल के बहाने मौत को गले लगाना है !!

!
!
!
@___डी. के. निवातियाँ ___@

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दूरियाँ...।।।

दो बेजान शख्सियत की दूरी मापने की इकाई है.., पर दिलों के बीच फसलों का क्या,
भाप लेते हैं सागर की दूरियां
पर जेहऩ में दूरी की गहराइयों का क्या??

हौसले भी हैं, नसीब की दरकार भी
लगन की जन्नत है; कामयाबी की फरियाद भी 
हर शख्स जाने खुद को कुछ इस तरह…
“खूदा भी खिदमत हो, सूने उनकी गुहार भी!! 
इन सभी के दलदल मे, फसें उन आसूओं का क्या??
इनके जिद में छुपे , उस त्याग के जहन्नुम का क्या ??
हौसला किसी का कम नहीं है..
” पर हौसलौं और गूरुर की कम होती दूरियों का क्या??”

करीब हो चुके आखिरी तख्त पर 
ख्ळाहिशों के हकीकत की तब्दीली पर…
दूरियाँ अब कम होनी थी ममता से,
पर अब उन ममता के आंचल में बरसते उन अंगारों का क्या???
चले गए बहुत ऊपर .. तारों के आशियानों पर
करीबीयों के कुछ कुर्बानियों पर..
दे दिया तुमने उन्हें अपना नजऱाना
पर उस राह में फसें उन मुसाफिरों का क्या???

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