बुधवार, 2 दिसंबर 2015

कुछ और देर ...

कुछ और देर …

रहने दो कुछ और देर
मुझे मेरे ख्वाब के साये तले
उसकी परछाँई से बात कर लूँ
बस, कुछ और देर ।

बहने दो कुछ और देर
बुलाते हैं इश्क़ के ज़लज़ले
उसके लफ़्ज़ों में भीग लूँ
बस, कुछ और देर ।

सिसकने दो कुछ और देर
फिर हो जाएंगे फ़ासले
उसके काँधे पे सर रख लूँ
बस, कुछ और देर ।

— स्वाति नैथानी

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shayari

Duniya bale tere naam s mujhko bulane lage h, tujhe bhulne m mujhko jamane lage h, kuchh log nhi jante k hakikat kya thi , bewafa vo the aur hm kahe jane lage h. By- prince

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एक पंछि की हैं कहानी,
बस प्रेम को निभाना था,
टुटे हुए थे पंख उनके,
फिर भी उड़ के जाना था…
उसी रात आना था तुफान,
तुफान तो चला गया,
टुट गई वह डाली,
जिनपर उसका आसियाना था…
दिल पर था गमों का बोझ,
खुशि का तो एक बहाना था,
एक पंछि की हैं कहानी,
बस प्रेम को निभाना था,
टुटे हुए थे पंख उनके,
फिर भी उड़ के जाना था…
बस शाम ही था न हुआ सवेरा,
काली रात घंघोर अंधेरा,
एक पंख था मुरझाया,
बस एक पंख से ना उड़ पाया,
रोता रहा किस्मत पर,
फिर भी न भाग्य बदल पाया,
एक प्रेमी के खातीर,
खुद को कितना तड़पाया…
टुट गई साँसे उनकी,
फिर भी प्रेम ना निभा पाया,
एक पंछि की हैं कहानी,
बस प्रेम को निभाना था,
टुटे हुए थे पंख उनके,
फिर भी उड़ के जाना था…!!
@md.juber husain

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मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

समस्या...

समस्या बताने को बहुत बुद्धिजीवी,
निवारण के लिए पल्ला झाड़ के खड़े होते है !
!
पहले तो कोई कदम उठाता नही,
कोई पहल करे तो नुक्स बताने वाले हजार होते है !!

!
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डी. के. निवातियाँ _____@@@

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समस्या .....

समस्या बताने को बहुत बुद्धिजीवी,
निवारण के लिए पल्ला झाड़ के खड़े होते है !
!
पहले तो कोई कदम उठाता नही,
कोई पहल करे तो नुक्स बताने वाले हजार होते है !!

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डी. के. निवातियाँ _____@@@

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समस्या.....


समस्या बताने को बहुत बुद्धिजीवी,
निवारण के लिए पल्ला झाड़ के खड़े होते है !
!
पहले तो कोई कदम उठाता नही,
कोई पहल करे तो नुक्स बताने वाले हजार होते है !!

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डी. के. निवातियाँ _____@@@

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वक़्त आ गया हैं !!

ब्रह्मांड सा विस्तार
हो रहा हैं हर दिन
इंसान का सोच,
मानव का जीवन
कहीं ऐसा तो नही
इस विज्ञान युग में
हम धरती को हि
भुल तो नही रहे हैं !
हमसब के सामने प्रश्न हैं
मनुष्य का स्थान कहाँ हैं ?
किस दिशा में अग्रसर हैं ?
शायद इसका उत्तर हैं भी या नही
वक़्त आ गया हैं
हम इस बारे में सोचे !
हमे याद रखना होगा
कुदरत कि भी सीमाए हैं
जो हमारी ज़िंदगी से जुडी हैं
हम इन्ही से हैं
और इन्ही में विलीन होना हैं !
क्या हमारा अस्तित्व कहीं और संभव हैं
अगर नही तो इस प्रकृति से
हमे प्यार क्यो नही,
दूसरी दुनियाँ होगी
पर कब कहाँ किसे पता
पर इस दुनियाँ को
कैसे बचाए सोचे
उचित कदम कि ओर फ़ैसला ले
अन्यथा परिणाम आप सबके सामने हैं !!

**Dushyant kumar patel**

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खालीपन का अभिरूप एक छोटा सा कमरा

वो शहर के नुक्कड़ का बड़ा मकान और उसका छोटा सा कमरा,
स्मृतियों के पार कहीं भूला कहीं बिसरा।
असफलताओं से निराश,
मुझे देख उदास,
मुझसे लिपट गया और बोला,
चल मेरी सूनी पड़ी दीवारों को फिर सजाते हैं,
और कुछ नए स्लोगन आदि यहाँ चिपकाते हैं।
भूल गया कैसे अपने हर इम्तिहान से पहले तू अपना हौसला बढ़ाता था,
और नए टाइम टेबल,प्रेरक पंक्तियों और छाया चित्रों से मुझको सजाता था।
मै घंटो कौतूहल वश तेरे संग इस आनंद में खोया रहता,
और वह मोहक दृश्य अपनी आँखों में कैद कर लेता जब अध्ययनरत थक कर तू सोया रहता।
वो वक़्त बेवक्त तेरे मित्रों का आना, हंसना हँसाना,वाद विवाद और फिर विचारों की गहराइयों में डूब जाना
नित्य नई उमंग नया उत्साह जगाता
और वह जिसे गम कहते हैं कहीं दूर तक नज़र नही आता।

कुछ याद है जब उस पवित्र प्रेम की आहट ने तेरा मन छुआ था,
तो उसका एहसास तुझसे पहले मुझे हुआ था,
और वह तस्वीर जो तूने, मेरी दीवार पर लगाकर कभी फाड़ दी थी

तू रोया था और ये दीवारें भी तेरा साथ दी थी।

तेरे स्वभाव,समझ और ख़याल से वाकिफ़ था मै,
जिससे तू अनभिज्ञ उसमे भी शामिल था मै।
मेरा जो यह एक कमरे का स्वरूप है
कुछ और नही है तेरे खालीपन का अभिरूप है।

आज जीवन की आपा धापी में न जाने किस किस का बोझ उठाये
तू स्वंय से परे जा रहा है,
और अनायास ही नित्य नए संघर्ष को आमंत्रण दिए जा रहा है।
स्वंय से यह विरह तेरी असफलताओं का कारण है
गौर से देख तू स्वंय प्रत्यक्ष इसका उदाहरण है।

तो फिर क्यों न मै और तुम साथ बैठ,
पहले की तरह सफलताओं असफलताओं का विश्लेषण करते हैं।
और सब कुछ दरकिनार रख तुझसे मिलते हैं।

तू वह जिसे तू जानता है
या मै जानता हूँ
और मै वही तेरे खालीपन का अभिरूप,
स्मृतियों के पार कहीं भूला कहीं बिसरा
शहर के नुक्कड़ का बड़ा मकान और उसका छोटा सा कमरा।
……..देवेन्द्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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"माँ और बचपन"

” माँ ” एक ऐसा शब्द हैं जिसकी व्याख्या नही की सकती और ना ही माँ की ममता को शब्दों में बांधा जा सकता है| इसकी ममता सभी कष्टों से ऊपर होती हैं और यह हर दुःख सहकर भी अपने बच्चे को हमेशा ख़ुश देखना चाहती है,अपने बच्चे की एक खुशी के लिए वो हर दर्द को सह जाती हैं और उस दर्द मे ही उसे अपनी ख़ुशी मिलती हैं | माँ अपने बच्चों के लिए न जाने कितनी तकलीफें उठाती है फ़िर भी हर दम मुस्काती हैं | “माँ ” कहते हैं भगवान हर किसी के पास नहीं जा सकते शायद इसलिए उन्होने औरत को माँ रूप दिया और धरती पर भेजा शायद इसलिये हर माँ में भगवान की छवि होती हैं…!!!

माँ को समर्पित मेरी कविता…!!

“माँ और बचपन”

माँ मुझको वो मंजर आज भी बहुत याद आता है..

तेरी गोद मे गुजरा बचपन आज भी बहुत याद आता है..!!!

मेरी एक किल्कारी पर वो तेरा बार बार बलईयां लेना..!!

मेरे एक रूदन पर तेरा अपनी आंखो का समंदर भर लेना…!!!

मेरे न सोने पर रात – रात जग कर कोमल हांथो का पलना करना..!!

निंद आ जाये जल्दी मुझको अपनी आंचल से पंखा झलना..!!!

माँ तेरी वो ममता की छावं आज भी मुझे बहुत याद आती है…!!

मेरे लड़खड़ाने पर वो तेरा सब काम छोड़ दौड़ आना..!!

गोद मे लेकर अपनी वो तेरा मीठी मीठी लोरी गाना..!!

घर के गलियारों मे कहीं चंचलता से मेरा वो छिप जाना…!!

मुझको न देख वो तेरी आंखों का नम और धड़कन का तेरा पल भर को रूक जाना…!!!

माँ तेरी वो तड़प आज भी मुझे बहुत याद आती है..मुझको वो मंजर बहुत याद आता है..!!!

मेरी बहते नाकों को वो तेरा अपनी आंचल से पोछ देना…!!

“बड़ा सुंदर है लाल तेरा” कहने पर औरों को तुरंत टोक देना…!!!

आज भी याद है मुझे जब मिट्टी से रंगे अंगो को मेरे देख तुम हंस देती थी..!!!

मुझको तो लगा लेती थी गले पर धरती को थोड़ा झिड़क देती थी..!!!

बरसात के बून्दों मे खेलकर जब मै घर आता था…!!

दूर से ही देख मुझे तुम अपनी आंचल फैला देती थी..!!!

सर्दी न लग जाये मुझे ये सोच झट अपने आंचल मे ढक लेती थी.

पर इतने ही देर मे आसमान को ना जाने तुम कितनी बार डपट देती थी..!!!

मानो जैसे कह रही हो तुम..!!

“थोड़ी देर तु और रूक जाता तो तेरा क्या चला जाता कम से कम मेरा बेटा खेल कर सूखा घर वापस तो आ जाता ”

माँ तेरे प्यार की वो तपिष आज भी बहुत याद आती है..

सांझ की आंच पर वो तेरा गरम गरम रोटीयां पकाना..!!!

अपने आंखो के सामने बिठाकर वो तेरा गरम गरम रोटीयां खिलाना.!!

माँ तेरे हांथो की बनी उन रोटीयों की सौन्धी महक आज भी बहुत याद आती है..

वक्त के साथ तु भी बूढि हो गई और मै भी थोड़ा बड़ा हो गया..पर तेरे साथ गुजरा वो मेरा कोमल बचपन ना जाने कहां खो गया.!!

माँ आज मै खुद मे ही खुद के बचपन को खोज रहा हूं..!!

ममता भरे उन पलों को याद कर मैं रोया हर पल हर रोज रहा हूं.!!

भूल न सकुंगा कभी तेरे कर्ज और उन बलिदानों को

हे जननी तुझे नमन है

मुझको इस दुनिया मे लाने को…!!

मुझको इस दुनिया मे लाने को…!!

विनोद कुमार “सिन्हा”

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निखारो तुम-हाइकू

राह तकें हैं
चूड़ी झुमके लाली
बिंदी पायल ।

पहरेदार
प्रेम के विरह मे
पाषाण से हैं ।

चाँद सताए
सितारों की लड़ियां
अंगार सी हैं।

बिखरी लटें
उलझी भटकती
पलकें छुए।

रूठे काजल
हवाओं पे बिफरे
धीमे बहो री।

कांतिहीन है
साज श्रृंगार सब
निखारो तुम।
……..देवेन्द्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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सोमवार, 30 नवंबर 2015

आ जाओ मेरे आँगन "गीत"

सावन का मदमस्त घटा हो तुम
आ जाओ मेरे आँगन झुमेंगे नाचेंगे हम !

नींद चुराने वाली
सपनो में आने वाली
महकी पुरवा हो तुम
जुबा मेरी गा रहा
तेरी चाहत की धुन ….
सावन का मदमस्त घटा हो तुम
आ जाओ मेरे आँगन झुमेंगे नाचेंगे हम !!

हँसते हैं,रोते हैं
तुझे याद करके अब
दिल हो जाता हैं बेचैन
आती नही हो नज़र जब तुम ….
सावन का मदमस्त घटा हो तुम
आ जाओ मेरे आँगन झुमेंगे नाचेंगे !!

मैं दीवाना हू तेरा बचपन से
न तड़पाओ ऐसे इस कदर मेरे यार
कि हैं तुम्हारी वर्षो से इंतज़ार
सहा हैं दर्द मैने हजार ….
सावन का मदमस्त घटा हो तुम
आ जाओ मेरे आँगन झुमेँगे नाचेंगे हम !!

दिल की दुरियाँ मिटा दो नजदिक आके
यकिन कर लो सिर्फ तुमसे हैं प्यार
उम्रभर रहेंगे बनके साया तुम्हारी
तुमसे बिछड़ के मर जायेंगे यार ….
सावन का मदमस्त घटा हो तुम
आ जाओ मेरे आँगन झुमेंगे नाचेंगे हम !!

पास आओ दिल चुराओ
दामन थामो न
तुझे देख मुस्कुरायेंगे हम
तेरी आचल मे छुप जायेंगे हम ….
सावन का मदमस्त घटा हो तुम
आ जाओ मेरे आँगन झुमेंगे नाचेंगे हम !!!
Dushyant kumar patel //

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हार्ट एनलार्ज

कुछेक पंद्रह सोलह साल पहले की ही बात है ,
मेरे डॉक्टर ने कहा था ,
मैडम आपका हार्ट एनलार्ज है ,
इलाज करवा लीजिये,
भविष्य में समस्या हो सकती है

मैने सोचा हार्ट एंलार्जेमेंट ,
तो कोई बीमारी नहीं लगती है ,
मेरे पापा का भी हार्ट बहुत लार्ज था ,
तो मेरा भी हार्ट एनलार्ज होना ही था ,
अगर यह कोई बीमारी है तो,
वीह तो हमारे जींस से मिली है।

और बात आई गई हो गई ,
इसी बीच हमारे उन बुजुर्ग डॉक्टर का ,
स्वर्गवास भी हो गया ,
यूँ ही बैठे बिठाये ,
कुछ दिन पहले ,
मुझे अपनी उस बीमारी का ,
ख्याल आ गया।
हार्ट एनलार्ज
,गर मेरा था ,
तो मुझे कोई समस्या ,
क्यों नहीं हुई?
मेरा,अपने उन डॉक्टर पर,
अपार श्रद्धा और विश्वास था।

मैं इस बात से बहुत ही हैरान हूँ ,
क्युकि आज जब ,
तरह तरह की बीमारियां ,
मेरा पता पूँछ पूँछ कर ,
बिन बुलाये मेहमान की तरह ,
आ धमकती हैं। ,

तो क्या हुआ मेरी उस ,
बीमारी को ?तो
क्या वोह अपने ,
आप ही ठीक हो गई?
या मेरा दिल ही समय के साथ ,
कुछ छोटा हो गया है।

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चलो बुहारें अपने मन को

चलो बुहारें अपने मन को
…आनन्द विश्वास

चलो, बुहारें अपने मन को,
और सँवारें निज जीवन को।

चलो स्वच्छता को अपना लें,
मन को निर्मल स्वच्छ बना लें।

देखो, कितना गन्दा मन है,
कितना कचरा और घुटन है।

मन कचरे से अटा पड़ा है,
बदबू वाला और सड़ा है।

घृणा द्वेष अम्बार यहाँ है,
कचरा फैला यहाँ वहाँ है।

मन की सारी गलियाँ देखो,
गंध मारती नलियाँ देखो।

घायल मन की आहें देखो,
कुछ बनने की चाहें देखो।

राग द्वेष के बीहड़ जंगल,
जातिवाद के अनगिन दंगल।

फन फैलाए काले विषधर,
सृष्टि निगल जाने को तत्पर।

मेरे मन में, तेरे मन में,
सारे जग के हर इक मन में।

शब्द-वाण से आहत मन में,
कहीं बिलखते बेवश मन में।

ढाई आखर को भरना है,
काम कठिन,फिर भी करना है।
…आनन्द विश्वास

http://anandvishvas.blogspot.in/2015/11/blog-post_30.html

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हम तुम ........( गीत )

हम तुम ……..( फिल्म गीत )

मिलना लिखा था किस्मत में, किस्मत से मिल गए हम तुम !
बनके चले राही एक मंजिल के,अब कभी जुदा न हो हम तुम !!

एक दूजे बिन लगता सब अधूरा
बिन दूजे के कैसे हो ख्वाब पूरा
आये हो पहलू में खुशबू की तरह
समेटने से बिखरते जाए हम तुम !!

मिलना लिखा था किस्मत में, किस्मत से मिल गए हम तुम !
बनके चले राही एक मंजिल के,अब कभी जुदा न हो हम तुम !!

अक्सर दो कदम चलकर संग
फिर रुक जाया करते है लोग
तोड़कर इस चलन को दुनिया में
एक मिसाल बन जाए हम तुम !!

मिलना लिखा था किस्मत में, किस्मत से मिल गए हम तुम !
बनके चले राही एक मंजिल के,अब कभी जुदा न हो हम तुम !!

कहीं किसी रोज़ ऐसा होता
हमारी हालत तुम्हारी होती
तड़प का अहसास जब होता
मिलन का कारण बनते हम तुम

मिलना लिखा था किस्मत में, किस्मत से मिल गए हम तुम !
बनके चले राही एक मंजिल के,अब कभी जुदा न हो हम तुम !!

खूबियाँ इतनी तो नही हम में
क्यों कर याद करे ये दुनिया
बस इतना ऐतबार बरकरार रहे
कभी एक दूजे को न भूले हम तुम !!

मिलना लिखा था किस्मत में, किस्मत से मिल गए हम तुम !
बनके चले राही एक मंजिल के,अब कभी जुदा न हो हम तुम !!

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@—-डी. के निवातियाँ —-@

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चल चल चल,
आगे बड़ता चल,
रास्ते हैं टेड़ी-मेड़ी,
जरा तु संभल के चल,
चल चल चल…
आगे बड़ता चल….
मिलेगी तुझे हर एक परेशानी,
हर कठनाईयाँ का सामना करता चल
मंज़िल को पाना हैं,
आगे बड़ता चल…
चल चल चल,
आगे बड़ता चल….
आसमा को झुकाना हैं,
तारे ज़मी पर लाना हैं,
चाहे मिलेगी खुशियाँ,
चाहे मिलेगी गम,
आगे बड़ता चल….
चल चल चल,
आगे बड़ता चल….
रास्ते चाहे कितनी हो टेड़ी-मेड़ी,
आगे बड़ता जाएगें,
हर गम को छोड़,
खुशियाँ लाना हैं,
आगे बड़ता चल….
चल चल चल,
आगे बड़ता चल……
@md.juber husain

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सुन्दरता

चाहे कितना भी भर लो
अपनी सोच से ज्यदा
पहुँच से ऊपर

ढेर लगा लो पैसे का
जाल बिछा लो रिस्तो का
जितना हो सके खरीद लो
छल लो किसी को प्यार के नाम से

खुद को बंद कर लो
खुशी नाम के संदूक में
चाहे कुछ भी कर लो
जीत नहीं पाओगे
भीतर के सूनेपन को

आकाश से कम है तुम्हारे पास
न कोई मुकाबला, न कोई मेल
अनगिनत तारे, सूरज, गृह
आकाश गंगा और हजारो लोग

सब भरा पड़ा है
फिर भी खाली दिखता है
सुना नज़र आता है
गुमसुम हो कर भी सुन्दर दिखता है

आकाश सिर्फ अपने आप को सुनता है
कभी खुद को सुनो
खालीपन के सुन्दरता को देख
सकेगो

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कहाँ खो गई मेरी माँ

उन दिनों की बात है जब पास थी तुम मेरी माँ,
दुख दर्द का भी न था अहसास,
सिर्फ खुशियाँ थी मेरे पास,
सभी थे अपने,था प्यार सभी का मेरे पास,
जब तुम चली गई, जैसे लगा टूट पङा हो पहाङ,
आँखो से आँसू न थम पाए,
फिर अपने भी लगने लगे पराए,
देख दूसरों की माँ को लगा कहाँ खो गई मेरी माँ !!…….
नन्हे-नन्हे हाथों से करता रहता हूँ मै काम,
एक रोटी का टुकङा भी न होता मेरे नाम,
कपङे भी है मैले मेरे न कोई रखता है अब मेरा ध्यान,
न खाने को कोई देता,सिर्फ करता रहता हूँ मै काम,
देख खेलते उन बच्चों को दिल में उठता एक तूफान,
आँखो में आँसू भर आते न मिलता कुछ आराम,
फिर दिल मुझसे यही पूछता कहाँ खो गई माँ
!!………
जब भी याद मुझे है आती,देखा करता तारों को,
फिर रातों में ढूँढा करता कौन सी है मेरी माँ,
इस दुनिया की भीङ में कहाँ छोङ गई मुझको माँ,
ऐसा लगता मुझको अब तो आ जाऊँ पास तुम्हारे माँ !!……..

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रविवार, 29 नवंबर 2015

"बेटी और कोख"

बलात्कार की बढती घटना से त्रस्त एक मां की अपनी कोख मे पल रही बेटी के लिये संवेदना.

“बेटी और कोख”

आ बेटी तुझपे आज मै कोख अपनी अर्पण कर दूं.,.!!

जीते जी ही तेरे मै कोख मे तेरा तर्पण कर दूं…..!!

आ बेटी तुझपे आज मै कोख अपनी अर्पण कर दूं..!!

मुझे पता है मुझे इल्म है मै निर्लज कातिल कहलाऊंगी..!!

पी लुंगी हर घुंट खुन का और दंष हर तानों का सह जाऊंगी..!!

पर जो दर्द मिलेगा तुझको इस बाहरी दुनिया मे,वो दर्द न मै सह पाऊंगी..l

तुझे नही पता इस दुनिया का बेटी,जब तेरा पहला कदम दुनिया मे आयेगा..
बाहर बैठा कई भेड़ीया तुझे देख कर लाड़ टपकायेगा..!!
और आगे जाकर यही भेड़ीया इज्ज्त का तेरी वोटि वोटि नोच खा जायेगा..!!!

ना देखेगा कोई उम्र तुम्हारा और ना ही तुम्हारी कोमलता
बस अपनी काम-पिपासा की खातिर तेरा चिड़ हर लेगा उसकी पशुता

लूट रही थी जब इज्जत द्रौपदी की तब कृष्ण बचाने आयें थे..
पर आज के इस दानवों की दुनिया मे ना कोई कृष्ण आयेगा..

जब आज पिता ही बन बैठा है कंश और भाई बन बैठा दुर्योधन..
इस नामर्दों की वस्ती मे तब कौन बचाने आयेगा तुम्हारा स्त्रीधन..?

आ बेटी तुझपे आज मै अपनी कोख अर्पण कर दूं..
जीते जि ही तेरा आज कोख मे तेरा तर्पण कर दूं…!!!

कितना अच्छा होता गर बेटी कोख मे ही पल बढ लेती..
ममता का दीवार खड़ी कर मां आंचल का छत कर देती…

माफ कर देना मुझको अभी तुम बेटी .
पर फिर से तुम्हे इस दुनिया मे लाऊंगी..
जब ये मूर्ख दरिन्दे बेटी का महत्व समझ जायेंगे..
एक बेटी ही तो औरत बनती है और बनती है जननी,
नही रहेगी बेटी जब इस दुनिया मे तो किसे देंगे ये मां की उपमा,
और बहन-बीवी किसे बनायेंगे..?

मर्दों की इस दुनिया मे क्या वो ही बच्चें जनने आयेंगे.?

आ बेटी तुझपे आज मै अपनी कोख अर्पण कर दुं..!!

आ बेटी तुझपे आज मै अपनी कोख अर्पण कर दूं..!!

विनोद कुमार “सिन्हा”

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मुद्दतों बाद

मुद्दतों बाद आज अंगने में मेरे
बरसात हुई ,
भीग गया तन -मन मेरा
मैं छुई -मुई की
डाल हुई ,
मुद्दतों बाद …..

थी धरा प्यासी मैं मुद्दत से
बनकर बादल वो छाये हैँ
जाने कितना वक्त लगा पर
शुक्र है कि वो आये है
उनकी बाहों में जब सिमटी
तो फिर से सुहागन
रात हुई,
मुद्दतों बाद….

उनके प्यार की झिलमिल बूँदे
लबों पे मेरे गिरती जाती
अँखियों के मोती भी झरते
दिल की कलियाँ खिल -खिल जाती
आज बना है वो मयकश और
मैं मदिरा का पात्र हुई,
मुद्दतों बाद……सीमा “अपराजिता “

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तू महसूस करता है या नही.....

पता नहीं तू महसूस करता है या नही ….
मैं हूँ तुझमे शामिल तेरी साँसों की तरह
तेरी धड़कनो के साथ धड़कती हूँ मैं
तेरी साँसों के साथ महकती हूँ मैं
पता नही तू महसूस करता है या नही..

तू अक्श है मेरा मैं परछाई तेरी
तू सागर मेरा मैं गहराई तेरी
कुछ भी नही मैं तेरे बिना
कुछ भी नही तू मेरे बिना
पता नही तू महसूस करता है या नही …..सीमा “अपराजिता “

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