शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल(हम पर सितम वो कर गए)

हम आज तक खामोश हैं और वो भी कुछ कहते नहीं
दर्द के नग्मों में हक़ बस मेरा नजर आता है

देकर दुआएँ आज फिर हम पर सितम वो कर गए
अब क़यामत में उम्मीदों का सवेरा नजर आता है

क्यों रोशनी के खेल में अपना आस का पँछी जला
हमें अँधेरे में हिफाज़त का बसेरा नजर आता है

इस कदर अनजान हैं हम आज अपने हाल से
हकीकत में भी ख्वावों का घेरा नजर आता है

ये दीवानगी अपनी नहीं तो और फिर क्या है मदन
हर जगह इक शख्श का मुझे चेहरा नजर आता है

ग़ज़ल(हम पर सितम वो कर गए)
मदन मोहन सक्सेना

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शहीदे आजम शहीद भगत सिंह ..... लेजेंट ऑफ़ फैन भगत सिंह 2016

भगत सिंह हमारे देश के सरताज़.
याद सताती है मुझे उनकी आज.
सच कहु तो (शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) जैसा आज इस देश में ही नही बल्कि पूरी दुनिया में कोई नही है,
(शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) कुछ लोग कहते है की वो भगवन के अवतार थे |
मगर मुझे लगता है की वो भगवन ही थे, (क्योंकि जैसे श्री कृष्ण भगवान ने लोगो को कंश से बचाया था,
वैसे ही मेरे आदर्श शहीदे आजम शहीद भगत सिंह जी ने भारत के वंश को बचाया था) कितनी भाग्यशाली थी वो माँ,
जिसकी कोख से ऐसे अवतार ने जन्म लिया,
(शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) जी ने अपने घर का ही नही बल्कि पुरे देश का नाम रोशन किया है |
आज हम कभी भी किसी भी क्रन्तिकारी के बारे में सोचते है, तो सबसे पहले हमारे दिलो दिमाग में
एक ही महान पुरुष की तस्वीर दिखाई देती है और वो है (शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) क्योंकि वो एक ऐसे महान इंसान थे
जिन्होने अपनी जिंदगी से ज्यादा देश को चाहा था, वो एक ऐसे महान इंसान थे, जिन्हे आज के नौजवान अपना आदर्श मानते हुए गर्व महसूस करते है |
जिन्हे मैं खुद अपना आदर्श मानता हु वो हमारे बीच चाहे भले ही न हो, मगर वो हमारे दिलो में, दिमाग में, सोच में. विचार में हमेशा थे, है और हमेशा रहेंगे, पर पता नही क्यूँ की (शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) जी और उनके साथियों का जो देश आजाद करवाने का सपना था, वो कहि न कहि अधूरा सा लग रहा है, जो उन वीर सपूतों के दिमाग में जो इस देश की सुन्दर छवि बनी हुई थी वो कहि न कहि धुंधली सी दिखाई दे रही है क्योंकि उन्होंने तो एक गुलाम भारत देश को सोने की चिड़िया में बदल दिया था, उन्होंने अपने देश के लिए जो कुर्बानी दी थी, आज की पीढ़ी उस कुर्बानी का महत्व समझ नही पा रही है, हमारा देश भले ही अंग्रेजो की गुलामी से मुक्त हो गया हो, मगर हमारा देश भ्र्ष्टाचार, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ प्रथा, गुंडागर्दी इन परेशानियों से ग्रस्त है, हमारे देश की हर बेटी घुट – घुट कर जी रही है, कोई न कोई लड़की किसी न किसी जानवर का शिकार हो रही है आज जब भी कभी हम सुबहः अख़बार उठा कर देखते है तो कोई न कोई बेटी फांसी लगाकर, दहेज़ के चक्कर में जला कर या दुष्कर्म का शिकार हुई दिखाई देती है, किसी और देश के ही नही बल्कि हमारे देश के दीमक ही हमारे देश को खोखला कर रहे है, जिस उम्र में (शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) जी ने अपने देश के ऊपर जान न्योछावर की थी उस समय वो 23 वर्ष के थे, और आज के 18 वर्ष के नौजवान ही मर्दा पीते हुए, गुटका पान मसाला खाते हुए, सड़क दुर्घटना में मरे हुए दिखाई देते है हमे उनकी कुर्बानी का महत्व समझना होगा,
(शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) जी …
जिन्हे हमारे देश की हर महिला और हर बुजुर्ग अपना बेटा,हर लड़की अपना भाई कहते हुए गर्व महसूस करती है ऐसे थे मेरे आदर्श (शहीदे आजम शहीद भगत सिंह) जी आइये हम प्रण लेते है की हम उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलेंगे और हर लड़की को दूसरे की घर की इज़्ज़त समझने से पहले हम उसे अपने घर की इज़्ज़त समजेंगे |
(जय हिन्द, जय भारत)

लेखक :- साहिल शर्मा s/o मनोज शर्मा
संपर्क :- +919896976601,
+918570066412

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जिंदगी के चार पहिये... लेजेंट ऑफ़ फैन भगत सिंह 2016

1) पहला पहिया – माँ बाप के संस्कार एक अच्छा परिवार और बहन भाई का प्यार यही होता है जिंदगी का पहला पहिया |
2) दूसरा पहिया – घर की इज़्ज़त, माता पिता का आदर, गुरु का सम्मान,
दुनिया में अपनी एक खुद की पहचान आन, बान और शान इनको करो प्रणाम
यही होता है जिंदगी का दूसरा पहिया |
3) तीसरा पहिया – स्वस्थ शरीर, खून पसीने की कमाई, इज़्ज़त की रोटी
छोटे से परिवार ने मिल बाँट कर खाई यही होता है जिंदगी का तीसरा पहिया |
4) चौथा पहिया – पति और पत्नी में एक अटूट विश्वास, इन दोनों को इस जीवन में एक दूसरे का है सहारा
पति पत्नी के लिए सागर का किनारा आप को अच्छी सिख मिले यही उद्देश्य है हमारा |

लेखक :- साहिल शर्मा s/o मनोज शर्मा
संपर्क :- +919896976601,
+918570066412

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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

मुझे भी जगमगाना है ...

हो आँखों में भले आँसू, लबों को मुस्कुराना है,
यहाँ सदियों से जीवन का,यही बेरंग फ़साना है,
है मन में सिसकियाँ गहरी,दिलों में दर्द का आलम,
मगर हालात के मारे को महफ़िल भी सजाना है,

नहीं मंजिल है नजरों में, बहुत ही दूर जाना है,
थके क़दमों को साहस को,हर इक पल ही मनाना है,
खुद ही गिरना-सम्भलना है,खुद ही को कोसना अक्सर,
खुद ही को हौसला दे कर, हर इक पग को बढ़ाना है,

तेरी नफरत से भी उल्फत न जाने कर क्यूँ बैठे हम,
तेरी चाहत को भी हमको तो इस दिल से मिटाना है,
अजब ये बेबसी मेरी, हूँ मैं मजबूर भी कितना,
भुला जिसको नहीं सकता,उसी को बस भुलाना है,

अभी उम्मीद कायम है,है जब तक जिंदगी बाकी,
किया खुद से जो वादा है,वो वादा तो निभाना है,
अभी गर्दिश का आलम है, मैं हूँ टूटा हुआ तारा ,
सहर के साथ बन सूरज, मुझे भी जगमगाना है …

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नादान हूँ .......

प्यार तुम्हारा उसे मुबारक
जिसके लिए रखा संभाल के !
कुछ पल अर्पण कर दो तुम
हमारे लिए स्नेह भरे दुलार के !!

नजरे इनायत करो न करो
बस इतना हम पर कर्म कर दो !
रख कर सर अपने पहलू में
अपने आँचल की छाँव कर दो !!

इरादे अपने सर्वथा नेक है
गलत समझकर भर्मित न हो !
सुकून के पल कुछ ढूंढते है
दिल बहले नजर गुस्ताख़ न हो !!

जानना चाहो तो दिल से पूछ लो
तुम्हारी ह्या का कितना कद्रदान हूँ !
कर देना माफ़ अगर शरारत हो
तुम्हारी रिआयत में हो गया नादान हूँ !!

ये इल्तिजा, ये गुजारिश है
हमारी भावनाओ को दिल से पढ़ना !
करना अपने ह्रदय में अंतर्द्वंद
फिर किसी फैसले पर तुम आगे बढ़ना !!

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!
………डी. के. निवातिया…..

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ऐ सितमगर ||ग़ज़ल||

तुमबिन ज़िंदगी का हर ख्वाब अधूरा है |
दुनिया में एक तू ही सहारा है |

ऐ सितमगर , तू न कर इतना सितम,
तड़पते दिल ने तुम्हें पल-पल पुकारा है |

जी सके न मर सके तुमसे बिछड़ के ,
तेरी तस्वीर देख-देख हर रात गुजारा है|

खुदा जाने क्या बात है आज भी ,
तुमसे मिलने का ईरादा क्यों हमारा है |

जाने क्यों समझने लगे है लोग मुझे पागल ,
और कहने लगे है तू आशिक आवारा है |

dushyant kumar patel

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हाथ मलते रहे......

जिंदगी की राहो में ठोकरे खाते रहे, चलते रहे !
कदम – कदम पर गिरते रहे फिर सम्भलते रहे !!
दास्तान -ऐ- जिंदगी शाम की तरह ढलती गयी !
उम्र अपनी मजिल पा गयी हम खड़े हाथ मलते रहे !!

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!
!
D. K. Nivatiya.

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सच्चे प्रेमियों को समर्पित

तुम जिसे ठुकरा गयी, वो अब जग को रास आ रहा है,
जो सुना तुमने नहीं वो धून ज़माना गा रहा है,

तुमने बोला था न बरसेगी जहाँ एक बूँद भी कल,
उस जमीं के नभ पे इक्छित काला बादल छा रहा है,

रात के डर से अकेला तुमने छोड़ा था जिसे कल ,
उसकी खातिर आज सजकर, सूर्य का रथ आ रहा है,

काँच का टुकड़ा समझकर फेंक आई तुम जिसे थी,
पैसों के बाजार में हीरा बताया जा रहा है,

हार की अपनी वजह, जिसको बता आई कभी तुम,
आज हर कोई उसे पारस समझ अपना रहा है,

तुम हकीकत में न कर पायी कभी सम्मान जिसका,
अच्छे अच्छों के ह्रदय का वो सदा सपना रहा है,

वो अभागा था या तुम हो,स्वयं ही ये निर्णय करो तुम,
आज तुम बंजर हो, उसका दिल सदा गंगा रहा है …

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पता बदला है हमने..

पता बदला है हमने, अपने रहने का मेरे यारों,

के अब घर छोड़ के अपना, हम उनके दिल में रहते हैं,

कोई चिठ्ठी, कोई खत गर मेरा आये तो ऐ यारों,

पढ़ा देना उन्हें, हम दिल में बैठे सुनते रहते हैं।

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" निर्वाह घर का "

इस घर के निर्वाह के कारण………..
आओ करें हम दोनों , मिलकर काम !!

परेशानियों के बोझ तले दबे इस जीवन का……
आओ करें हम दोनों मिलकर के निर्माण !!

आओ इस जीवन की मजबूत बनाये नींव………
मैं बन जाऊं इज़्ज़त तुम्हारी , तुम बनो मेरा सम्मान !!

खर्च है इस घर में हर वक़्त देखो कितने……….
बच्चे , पढाई , परिवार और अथिति का सम्मान !!

आओ मिलकर के बाटें थोड़ा-थोड़ा बोझ………
इस जीवन पथ पर हम दोनों है एक समान !!

भाग दौड़ भरी इस दुनिया में , तुम अकेले क्यों हो परेशान….
उम्र पड़ी है ! सारी हम भी कर लेंगे कभी आराम !!

पढ़ा लिखा मैने भी बोलो तो किस काम का……….
नहीं चाहिए मुझे ऐसा जीवन, जो खत्म हो बिन पहचान का !!

चलो मेरे हाथो में दो , अब ये घर निर्वाह की डोर…….
और तुम थामे रखना देखो , भविष्य पूर्ति की ये कमान !!

रचनाकार : निर्मला ( नैना )

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सविता वर्मा की 3 कविताएं

सविता वर्मा की कविताएं
1
खुद की तलाश मे भटकती दर-बदर
मिल जाए मकाम, इस आस में खोजूं इधर-उधर
भटक रही तन्हा खर्च करती खुद को
तुमको सुन रही हूं, तुमको गुन रही हूं
सुन लूं, गुन लूं, तब तुमसे पुछूं
इतना ही है अम्बर मेरा, इतनी ही है जमीं मेरी
खर्च सुबह खर्च शामें इतनी ही है कीमत मेरी

2
भावना शून्य चेहरों पर
तमाम कलाकारी इस मन की
शब्दों से घोलते हैं रस
आखों की बेईमानी इस मन की
छोटे से पोखरे की छोटी सी मछली हम
समन्दर सा कौतूहल इस मन का
भाव विहीन अम्बर में
सारी कशीदाकारी इस मन की
अभिलाषा है अर्पण कर दूं
सारी अस्थिरता इस मन की
इस सहज जीवन में
सारा खोखलापन इस मन का
क्यु आते तुम ख्यालों में थम थम के
थोडा ज्यादा फिर और ज्यादा आते हो याद तुम
हृदय में उतरते-उतरते आत्मा को भिगोने लगे तुम
ये शिद्दत, ये उद्विग्नता,ये विडम्बना
क्या यही हो मेरे हिस्से में तुम
3
नजर न लग जाये नजर को जिससे देखते हो तुम
निखर जाता है चेहरा जब निहारते हो तुम
मन के एक एक तार को महका देते हो तुम
ये पवित्रता ये प्रेम,ये तड़प
क्या यही हो मेरे हिस्से में तुम
मेरे ही रहना सदा ये चाहत हो तुम
उडते हुए बादल को कैद करने की तम्मना हो तुम
पूरी न हो सके ऐसी दुआ हो तुम
ये आशा, ये निराशा, ये आरजू
क्या यही हो मेरे हिस्से में तुम

ये सब केवल मेरे लिए है
या अंशमात्र भी तुम्हारे लिए भी
चांदनी बिखेरती रातो में हम मिले
मन का वो चहकना
खिलखिला कर वो हंसना
ये सब केवल मेरे लिए है
या अंशमात्र भी तुम्हारे लिए भी
मन की गिरह खुलने को बेताब
जी रहा होता जी लेने का जज्बा
धडकनें हो जाती हैं तेज
ये सब केवल मेरे लिए है
या अंशमात्र तुम्हारे लिए भी
छोड देते, तोड़ देते, मेरी दी हुइॅ बंदिशे
ये रीतियां ये परम्पराएं
मचल जाता तुम्हारा भी मन
ये सब केवल मेरे लिए है
या अंशमात्र तुम्हारे लिए भी
खुशबू की डिबिया की तरह
महकती हूं, गमकती हूं
तुम्हारे एहसास से
ये सब केवल मेरे लिए है या अंशमात्र तुम्हारे लिए भी  

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माँ मेरी माँ..........लैजेंट ऑफ़ फैन भगत सिंह 2016

माँ मुझसे मत पूछ की मुझे क्या नजर आ रहा है |
बस तुझमे ही अपना खुदा नजर आ रहा है |
तूने रखा जब मेरे सर पर वो दोनों हाथ , तो
सारे जहाँ की कामयाबी थी मेरे साथ
तूने खिलाई मुझे अपने हाथो से रोटी
तुही है सारे जहाँ का सबसे प्यारा मोती ……….
तुही मेरी जिंदगी तू ही मेरी माँ
मेरा बस चले तो तेरे कदमो में बिछा दू ये जहाँ
तुझ जैसा इस दुनिया में मिलेगा कोई कहाँ तूने मुझे जन्म दिया तुही मेरी माँ ………..
मेरे हसने पर तू हसी मेरे रोने पर तू रोई
मुझसे बड़ी ना ख़ुशी है तेरी कोई
मुझे ठण्ड से बचाने के लिए तू खुद सर्दी में सोई
मेरी मौत के सामने तू खुद खड़ी हो गयी ………..
माँ मुझसे मत पूछ की मुझे क्या नजर आ रहा है |
बस तुझमे ही अपना खुदा नजर आ रहा है |
सारी रात सारा दिन तुझको ही मैं याद करूँ
तू खुश रहे मेरी माँ
मैं रब से ये फरियाद करूँ …………
तेरे बिना मेरे जिंदगी अधूरी
तू ही मेरी ख़्वाहिश पूरी.
एक पुतले की जान है तू …….
खुशियों का जहान है तू
मेरी माँ महान है तू …………
अपने बेटे की नजरो में इसलिए भगवान है तू .
तेरी ममता की छाओं में मुझे पेड़ से भी अच्छी छाँव मिली
मैं बहुत किस्मत वाला हूँ की मुझे तुझ जैसी माँ है मिली ……….
हमारे घर की लक्ष्मी , हमारे घर की जान है तू , मेरे घर की पहचान है तू
मेरी माँ महान है तू …….
मुझ पर हक़ है तेरा क्यूंकि तू है मेरी माँ
तुझसे अच्छा कोई नही , तू ही मेरा जहाँ
हर दुःख सुख की साथी तू
हमारे दीपक की बाती तू ………
साहिल तेरी कहानी लिखे …….
तेरे इन संस्कारो पर धीरे धीरे चलना वो सीखे
मैं करता आप पर विश्वास
मेरे खून की रगो में माँ के नाम का हर साँस
पापा आपके जीवन साथी.
आपकी ये प्यारी सी जोड़ी . लगती जैसे दीपक और बाती
मुझको तू चाहे ……….मुझको ही तू याद करे.
मेरे जीवन में खुशियों की बरसात करे
मैं हर लम्हा तेरी याद में रोऊ
मैं आखरी साँस तक तेरी ही गोद में सोऊ…………
मेरी भी मिल जाये जिंदगी तुझको
तुझमे खुदा नजर आता है मुझको………..
दिल करता है मैं तेरी याद में खो जाऊ
पूरी जिंदगी के लिए तेरी गोद में सो जाऊ
तेरी ममता का साया हूँ ………..
इस दुनिया को देखने तेरी कोख से आया हूँ |

लेखक :- साहिल शर्मा S/o मनोज शर्मा
संपर्क :- 9896976601
8570066412
9812207400

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हर शाम

हर शाम,
लिए दो प्याले जाम,
एक तेरे नाम, एक मेरे नाम,
याद आती है, कुछ मुलाकातें,
और कुछ साथ गुज़ारी शाम……….

चले थे जिन रस्तो पर,
लिए हाथों मैं हाथ,
बुने थे कुछ सपने,
सतरंगी साथ साथ,
मेरे सपने तो हैं, मेरे पास,
तुमने ही कर दिए, किसी और क़े नाम……..

दिल दिल होता है, कोई ज़मीन नहीं,
कभी कर दी इसके नाम, कभी उसके नाम,
मेरा दिल तो है, एक परबत,
अडिग, अचल, तेरे नाम, बस तेरे नाम……….

शिकवा गिला किस रिश्ते मैं नहीं होता,
क्या तकरार मैं प्यार और प्यार मैं तकरार नहीं होता,
क्या रूठने क़े बाद, मान जाने मैं मज़ा नहीं होता,
तुम जो रूठी, तो सारी दुनिया मैं प्यार मेरा, हो गया बदनाम……

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माँ मेरी माँ

माँ मुझसे मत पूछ की मुझे क्या नजर आ रहा है |
बस तुझे ही अपना खुदा नजर आ रहा है |
तूने रखा जब मेरे सर पर वो दोनों हाथ , तो
सरे जहाँ की कामयाबी थी मेरे साथ
तूने खिलाई मुझे अपने हाथो से रोटी
तुही है सरे जहाँ का सबसे प्यारा मोती ……….
तुही मेरी जिंदगी तू ही मेरी माँ
मेरा बस चले तो तेरे कदमो बिछा दू ये जहाँ
तुझ जैसा इस दुनिया में मिलेगा कोई कहाँ तूने मुझे जन्म दिया तुही मेरी माँ ………..
मेरे हसने पर तू हसी मेरे रोने पर तू रोई
मुझसे बड़ी ना ख़ुशी है तेरी कोई
मुझे ठण्ड से बचाने के लिए तू खुद सर्दी में सोई
मेरी मौत के सामने तू खुद खड़ी हो गयी ………..
माँ मुझसे मत पूछ की मुझे क्या नजर आ रहा है |
बस तुझे ही अपना खुदा नजर आ रहा है |
सारी रात सारा दिन तुझको ही मैं याद करूँ
तू खुश रहे मेरी माँ
मैं रब से ये फरियाद करूँ …………
तेरे बिना मेरे जिंदगी अधूरी
तू ही मेरी ख़्वाहिश पूरी.
एक पुतले की जान है तू …….
खुशियों का जहान है तू
मेरी माँ महान है तू …………
अपने बेटे की नजरो में इसलिए भगवन है तू .
तेरी ममता की छाओं में मुझे पेड़ से भी अच्छी छाँव मिली
मैं बहुत किस्मत वाला हूँ की मुझे तुझ जैसी माँ है मिली ……….
हमारे घर की लक्ष्मी , हमारे घर की जान है तू , मेरे घर की पहचान है तू
मेरी माँ महान है तू …….
मुझ पर हक़ है तेरा क्यूंकि तू है मेरी माँ
तुझसे अच्छा कोई नही , तू ही मेरा जहाँ
हर दुःख सुख की साथी तू
हमारे दीपक की बाती तू ………
साहिल तेरी कहानी लिखे …….
तेरे ही संस्कारो पर धीरे धीरे चलना वो सीखे
मैं करता आप पर विश्वास
मेरे खून की रगो में माँ का हर साँस
पापा आपके जीवन साथी.
आपकी ये प्यारी सी जोड़ी . लगती जैसे दीपक और बाती
मुझको तू चाहे ……….मुझको ही तू याद करे.
मेरे जीवन में खुशियों की बरसात करे
मैं हर लम्हा तेरी याद में रोऊ
मैं आखरी साँस तक तेरी ही गोद में सोऊ…………
मेरी भी मिल जाये जिंदगी तुझको
तुझमे खुद नजर आता है मुझको………..
दिल करता है मैं तेरी याद में खो जाऊ
पूरी जिंदगी के लिए तेरी गोद में सो जाऊ
तेरी ममता का साया हूँ ………..
इस दुनिया को देखने तेरी कोख से आया हूँ |

लेखक :- साहिल शर्मा S/o मनोज शर्मा
संपर्क :- 9896976601
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"माँ "

छोटी छोटी आँखो से दुनियाँ देखने लगा ।
छोटे हाथों से उँगलियाँ पकड़ ने लगा ।
मेरे कदम और भी मज़बूत हो गये ,
माँ का हाथ पकड़ के जब चलने लगा ।

मेरे कदम अकेले ही संभल ने लगे ।
जब अपने ही पेरौ पर चलने लगे ।
माँ मेरी स्कूल रखने फिर भी आई ,
जब खुद ही बेग अपना उठाने लगे ।

मुझको पढाया लिखाया आदमी बनाया ।
दुसरो के काम आ सके वो इंसान बनाया ।
जब जब मूझसे कोई गलती हो जाती ,
गले से लगा कर प्यार से समझाया ।

वक्त की रेत माँ से दुर करने लगी ।
जबसे बीवी मेरा डिब्बा बनाने लगी ।
बीवी का नमकीन सा बना खाना खाया तो ,
माँ के हाथों की बनी रोटी याद आने लगी ।

वक्त सारा ऑफीस मे लगा रेहता था ।
माँ का तावीज गले मे ही रहा करता था ।
मैं लौट कर जब तक घर ना आ जाऊ ,
माँ का सर सज़दे मे ही पडा रेहता था ।

पत्नि की आँखो मे चुभने लगी मेरी माँ ।
केहती हे की तंग करने लगी तेरी माँ ।
माँ को मेरे सर का बोज समझने लगा ,
तो केह दिया मेने अपने घर जा तु माँ ।

जवानी अब बुढापे मे बदल ने लगी ।
मुझको भी मेरी माँ की उम्र लगने लगी ।
जब पुरी जवानी ढल गई बुढापे मे ,
मेरी औलाद भी अंदाज़ बदल ने लगी ।

मेरे बच्चे मुजे एसे तड़पाने लगे ।
माँ के साथ किये सुलूक याद आने लगे ।
मेरी कोई बात नही सुनी उन्होने ,
मुझको भी मेरी माँ के घर ले जाने लगे ।

माँ ने जब देखा तो मुझपे रहम आया ।
उसने कहा के लो मेरा बेटा लौट आया ।
माँ की आँखों से निकले ईस तरहा आँसु ,
आँखों मे जेसे मेरा बचपन भर आया ।
-एझाझ अहमद

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बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

सारी बातें सुनी-सुनायीं !!

सारी बातें सुनी-सुनायीं,
किन बातों पर यकीं करें, और
कौन सी बातें, बात बनायीं !
सारी बातें सुनी-सुनायीं !!

इसने कहा कुछ, उसने सुना कुछ,
इसने किया कुछ, उसको लगा कुछ।
जिसको जैसा लगा घुमाया,
अपनी रोटी खूब पकायी !
सारी बातें सुनी-सुनायीं !!

ऐसी बातें सुनकर हमने,
उसको ही सच मान लिया।
औरों ने उकसाया हमको,
और हमने बस ठान लिया।
इसको मारा, उसको काटा,
घर-घर हमने आग लगायी !
सारी बातें सुनी-सुनायीं !!

क्या हम में अब समझ नहीं है,
क्या ख़ुद की कोई सोच नहीं।
या फिर इन्सां होने का,
अब हमको कोई गर्व नहीं।
किसी को बेवा, कोई यतीम,
हर इक आँखें खून रूलायीं !
सारी बातें सुनी-सुनायीं !!

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किन बातों पर यकीं करें, और
कौन सी बातें, बात बनायीं !
सारी बातें सुनी-सुनायीं !!
Originally Posted @ writerstorm.in

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कैसे भुला दू.....

कैसे भुला दू

तुम संग बिताये वो हसीँ पल
जिनमे न रात का पता था
न दिन की होती कोई खबर
उन यादो को मैं कैसे भुला दूँ !!

घुमड़ते बादलो के संग – संग
तेरा घनी जुल्फों का लहराना
सावन की फुहारों के संग-संग
तेरा वो प्यार का बरसाना,
वो हसी पलो मै कैसे भुला दूँ !!

कार्तिक की काली सर्द रातो में
टक – टक सितारों का गिनना
कोहरे की चादर में लिपटी सुबह
दीद्दार के इन्तजार में ठिठुरना
उन सर्द यादो को कैसे भुला दूँ !!

वसंत में चढ़ता फाग का रंग
फूलो से लहलाने का तेरा ढंग
कलि सा चटकता अंग – अंग
मन की एकग्रता करता भंग
सौंदर्य का वो रूप कैसे भुला दूँ !!

!
!
!
डी. के. निवातियां___!!!

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ख़ुदगर्ज़ी

सिमट गयी है ज़िंदगी इंसा की अपनी चारदीवारी में

अपने ग़म के अलावा कोई और बात चौखट अब पार नहीं करती

कितनी ख़ुदगर्ज़ी है देखो उसकी फ़िदरत में

कि किसी की मुश्किलें उसकी रूह को बेज़ार नहीं करती

होगी जिस रोज़ क़दर उसे अपने रिश्तों की

कही वक़्त की आँधी सब कुछ तबाह ना कर दे

इतना ग़ुरूर अच्छा नहीं गर समझ ले,क्यूँकि

वक़्त की मार कभी कोई आवाज़ नहीं करती

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"अपने आँसूओं को एसे ही बहाया मत कर"

अपने आँसूओं को एसे ही बहाया मत कर ।
जिन्हें धूप पसंद हो, उनपर साया मत कर ।
उसे तो आदत हैं बार बार धोका देने की ,
तु जानबूझकर उसके धोके खाया मत कर ।
अपने भी डाल देते हैं अब जख्मों पर नमक ,
तु सबको अपने घाव यू दिखाया मत कर ।
जिसको प्यार के कसमों की अहमियत ना हो ,
तु एसे बेवफा के वादो को निभाया मत कर ।
हर चीज़ तेरी उसने जलाकर राख कर दी हैं ,
उसकी निशानीसे खुद को तु जलाया मत कर ।
वो तो तुझे भुल गयी ,तु भी उसे भुल जा ;
याद मे उसकी खुद को तु तड़पाया मत कर ।
-एझाझ अहमद

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चंद शेर आपके लिए

चंद शेर आपके लिए

एक।

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है
जब दर्द को दबा जानकार पिया मैंने

दो.

वक्त की मार सबको सिखाती सबक़ है
ज़िन्दगी चंद सांसों की लगती जुआँ है

तीन.

समय के साथ बहने का मजा कुछ और है यारों
रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है

चार.

जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी
बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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Read Complete Poem/Kavya Here चंद शेर आपके लिए