गुरुवार, 26 नवंबर 2015

दुआ

जब कर्म और फल की प्राचीन परम्परा ने अपना जाल फेंका,
तो एक रात सरकारी अस्पताल के बाहर फूटपाथ से मैंने चाँद को देखा।
बादलों की गिरफ्त से छूट कर वह अभी अभी निकला था,
और पहले से अधिक चमकीला और उजला था।

इससे पहले मैंने कभी उसे ऐसे नहीं माना था,
बस आकाश में घूमता एक खगोलीय पिंड ही जाना था।

अब चन्द पल मुश्किलों के उसके साथ बांटता हूँ,
और किसी अपने की सलामती की दुआ मांगता हूँ।
……………..देवेन्द्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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"किश्त "

अपने उसूलो पे ज़िन्दगी बसर कर ,
इन सामाजिक रीतियों में तेरी मासूमियत घट न जाए ,
अपनाना आसान होता है बुराइओं को सभी ,
कही ज़िन्दगी के किस्सों में इंसानियत की किश्त कम न पड़ जाए ||

अपनों के बीच मुस्कान बाँट लो ,
मुश्किल हालात सिर्फ तन्हाई मे न कट जाए ,
मिलने के लिए मौको की तलाश न करो ,
कही ज़िंदगी के रिश्तो में वक़्त की किश्त कम न पड़ जाए ||

हार जाओ खुदको किसी की खातिर ,
अपने अभिमान से कही एक आशियाना बिखर न जाए ,
वफ़ा से ही तो ज़िन्दगी खूबसूरत बनती है ,
कही मोहब्बत के सफर में वादो की किश्त कम न पड़ जाए ||

आँखों ने देखे है अरमान हज़ारो ,
ये सिर्फ रात के सपनो में न सिमट के रह जाए ,
लड़ रहा हु हर प्रतिकूलता से मैं यहाँ ,
कही मंज़िल के रास्तो में हिम्मत की किश्त कम न पड़ जाए ||

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कुछ तो शर्म करो ......

रचना बड़ी अवश्य है, कृपया दो मिनट का समय देकर जरूर पढ़े औए अपने विचार व्यक्त करे !!

पहले लोग मिसाल देते थे गरीबी में दाल रोटी की
रोटी आज मुश्किल में है दाल ने दामन छुड़ा लिया !
टमाटर दिखाता है वक़्त बे वक़्त अपने तेवर लाल
महंगाई में अबकी प्याज ने जी भर के रुला दिया !
अमीरो के लिए गाडी बंगले सस्ते होते हर बजट में
टैक्स में देकर भरी छूट उनको राहत दिला दिया !
आम आदमी आते है अक्सर महंगाई की चपेट में
गरीबो का सब्जी से रोटी खाना मुहाल करा दिया !
एक कर कुछ रुपया जोड़ा था मुश्किल से गरीब ने
कमबख़्तो ने बहकाकर वो भी जमा करा लिया !
खुद रहते बंगले गाडी में पहनकर लाखो के सूटबूट
किसानो के गले में फांसी का फन्दा लटका दिया !
भूल गए पूर्वजो के बलिदान को उन्होंने कुछ किया ही नही
देकर जनता बीच नारे बड़े बड़े मुदा विकास का बना लिया !
लगाते है इंसानी जान की कीमत चंद कागज़ के टुकड़ो में
वतन पे मरने वालो को एक राजनितिक मोहरा बना लिया !
अरे कुछ तो शर्म करो पावन धरा के ईमानदार नेताओ
आजादी के परवानो को सियासत का हिस्सा बना दिया !
गांधी, पटेल, सुभाष, आजाद, मौलाना, भगत, टैगोर,मंगल
आंबेडकर, अशफाक, बिस्मिल जैसे कितनो ने जीवन त्याग दिया
भूल गए क्यों तुम जिनकी कुर्बानी उन्हें भी जाति धर्म बाट लिया !
अब तो छोड़ो ये दलगत राजनीति, देश धर्म का ध्यान करो
दुनिया की आँख का तारा बने अपना देश ऐसा विचार करो
सुन लो देश के नेताओ क्या तुमने खुद कभी कुछ छोड़ा है
देकर एक दूजे को गाली सदा जनता का माल खसोटा है !
घास फूंस, खाद उर्वरक, डीज़ल पेट्रोल, कोयला, बिज़ली
किस किस की बात करे जवानो के ताबूतों तक को लूटा है !
मत लो इम्तहान सब्र का देश के गरीब और किसानो का
तुम्हारी जान बचाने वाले सीमा पर जान गवांते जवानो का !
न रहना इस नासमझी में की भारत माता के वीर रहे नहीं
हवा न दो ऐसी चिंगारी को जिससे अछूता कोई बचे नहीं !
तपस्या प्रेम के हम पुजारी शांति के हम दूत कहलाते है
हम उस देश के वासी है जहां पत्थर भी दूध से नहाते है !
!
अंत में बस इतना सुन लो अपनी ओकात में आ जाओ
देश मेरा है दुनिया में अनूठा, इसकी शान मत गँवाओ !!
!
जय हिन्द , जय भारत, …..!!
!
डी. के. निवातियाँ ………….!!

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नारी और विश्व की प्रगति और नर चेतना

नारी और विश्व की प्रगति और नर चेतना–संतोष गुलाटी

नर को मानना पड़ेगा
नारी दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी का रूप है
नारी की प्रगति के बिना
विश्व की प्रगति संभव नहीं
नारी बचपन से ही जागरूक है
सब कर्तव्यों को निभाती है
अपने अधिकारों की माँग करती है
वह कभी भी सोई नहीं
नर चेतना सोई रहती है
क्षत्राणी कभी भी सोई नहीं
विदेशी ताकत से लड़ती रही
पुरुष को चेतना जागरण का संदेश देती है
धुरी के बिना पहिया चल नहीं सकता
नारी की प्रगति के बगैर
कोई राष्ट्र प्रगति कर नहीं सकता
ज़रूरत है नर को नारी को जानने की
वैसे नर को सब पता है
लेकिन वह अनजान बनता है
नारी जब विशेष कुछ करती है
नर में हीनता का भाव जाग पड़ता है
नारी शिखर पर न पहुँच जाए
नर ने ऐसी सौगधं खाई है
उसकी प्रगति में रोड़े अटकाना
अपना शान समझता है
जब परिस्थिती बेकाबू हो जाय
वह तब अपनी लगाम
नारी के हाथ थमा देता है
शिव जब महिषासुर को न मार सके
उसको मारने के अधिकार दुर्गा को दे दिए
पापी का नाश किया
नारी के साथ काम करना
उसकी शान के ख़िलाफ है
क्योंकि वह अधिक शक्तिशाली है
पत्नि उससे अधिक कमाए
या अपने कार्य सुचारू ढंग से करे
वह सर्वदा टाँग अड़ाता है
नारी कठपुतली बन कर रहे तो ठीक
शेरनी बन जाए तो वह उसके विपरीत
बराबरी का अधिकार स्वीकार नहीं
नारी में क्या-क्या शक्तियाँ हैं
अभी तक उस से अनभिज्ञ बनता है
नर की चेतना जागृत करना आवश्यक है
जब भी नारी आवाज़ उठाती है
नर की रूह काँप जाती है
नारी की कोख़ उसको कमज़ोर बना देती है
हे जननी ! धातृ ! नर की चेतना को जगाओ
अपने अधिकारों के लिए युद्ध जारी रखो
विश्वास रखो एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी
नर को नारी के कर्तव्य बताने की ज़रूरत नहीं
एक बार नर नारी की ज़िंदगी जी के तो देखे
अपने मर्द होने का घमंड लुप्त हो जाएगा
नारी केवल भोग की वस्तु नहीं
वह अबला नहीं चंडी, सहनशीलता की प्रतिमा है
नारी का सदा सम्मान होना चाहिए।
नारी भी नर के बिना अधूरी है
संसार को चलाने के लिए
दोनो का साथ में चलना ज़रूरी है ।
नर की चेतना को जागृत करना ज़रूरी है ।।

संतोष गुलाटी

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"माँ"

तू वह नीव ह जिसपे आज मेरी मुस्कराहट कड़ी ह ,
तू वह आँख ह जिससे मैने सपने देखे ह ,
तू वह उम्मीद ह जिसपे आज मेरे हौसले खड़े ह ,
तू वह वक़्त ह जो मझे सिर्फ बचपन दिखाता ह !!!!

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बचपन

बचपन

यह कैसा था बचपन
बस खेलना और खाना
कभी पेड़ पर चढ़ना
तो कभी नदी में कूद जाना
कभी यह न सोचना
कि माँ को कभी न सताना
कितनी आज़ादी कितनी मस्ती
कितनी जोश भरी ज़िंदगी
अब बुढ़ापा क्या आया है
बचपन की याद सताने लगी है
अब बचपन की हरकते करना
अपने को मूर्ख कहलाना है
पता ही नहीं चला
बचपन आया और चला गया
मैं कब और कैसे बड़ा हो गया
अगर पता होता
कि बचपन लौट कर नहीं आता
तो थोड़ी मस्ती ओर कर लेता
बचपन का मज़ा जाने ही नहीं देता
मुझे तब पता चला
कि मैं बड़ा हो गया हूँ
जब पिताजी ने एक दिन कहा
सलीके से बात करना सीखो
क्योंकि बचपन बीत गया है
और मैं अब बड़ा हो गया हूँ ।

संतोष गुलाटी——–

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वक्त

राह चलते चलते रहनुमा बदल गये !
मंजिल का पता नही, रास्ते बदल गये……!
वक्त क्या बदला दोस्तो, कस्तियाँ तो वही रही किनारे बदल गये…….!

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वक्त

राह चलते चलते रहनुमा बदल गये !
मंजिल का पता नही,रास्ते बदल गये ……!
वक्त क्या बदला दोस्तो,
कस्तियाँ तो वही रही ,किनारे बदल गये……..!

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विनीत मन -हाइकू

घर आओगे
उसने पूछा नहीं
कुछ बात है।

गुमसुम सी
केश खुले-बिखरे
हां नाराज़ है।

स्नेह की कली
विरह के नभ की
धूप में खिली।

मुरझाई सी
ह्रदय से लिपट
हरी हो गई।

अनुपम है
रूठने मनाने में
जो मिठास है।

बिखरे हुए
सुर मृदुभाव के
लय बद्ध हैं।

“विनीत”मन
गीत रच प्रेम के
करबद्ध है।
….देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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बुधवार, 25 नवंबर 2015

ज़िन्दगी

काबिलियत तब धोखा देती है ,
जब मुझे खुद पर यकीन नहीं होता ,
ज़िन्दगी तो एक अनकही कहानी है ,
यहाँ हर रात काली हर सवेरा रंगीन नहीं होता ||

होसलो से अपने उम्मीद न खोना ,
मेरे हर कर्म का मालिक मेरा मुकद्दर नहीं होता ,
ज़िन्दगी तो हर पल नया मौका देती है ,
एक हार से कोई ऊसर एक जीत से कोई सिकंदर नहीं होता ||

कभी अछ्छाई से अनभिज्ञ न होना ,
बेच उसूलो को किसी का उत्थान नहीं होता
ज़िन्दगी तो सिर्फ मानवता धर्म सिखाती है ,
एक दोष से कोई रावण एक दया से कोई राम नहीं होता ||

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आओ कुछ ऐसा कर जायेँ

aao kuch aisa kar jaye.
duniya ki divaro par apna naam likh jaye.
or jaye is jaha se tab
amavasya ka chand bhi hume dakhne ke liye aa jaye.

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सोरठा । सज्जन और दुर्जन के प्रति ।

सोरठा । सज्जन और दुर्जन के प्रति ।

प्रेम वचन निःस्वार्थ, भरे दुःखित पर हृदय जे ।
करें ज्ञान विस्तार, सज्जन रूप प्रतीत ते ।।

द्वेष, द्रोह शुचि बीच, वाणी बरसे घृत गरल ।
ते दुर्जन सम जान, भरे कुटिल व्यंग्योक्ति दुःख ।।

@राम केश मिश्र

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"रणभेरी"-उत्साह गीत

बज उठी समय की रण-भेरी
अब रण कौशल की बारी है,
हार मिले या जीत मिले
कर्तव्य प्रथा ही प्यारी है।
साहस किसमे है कितना
किसमे कितना विश्वास भरा,
इस महासमर मे उठती
प्रश्नो की पावन चिंगारी है।
प्रतिभाओं के सूर्य कई हैं
कई सितारों के साथी,
आगे बढ़ पाऊँगा कैसे
जुगनुओं का मै बाराती ,
अपने महिमा मंडन को
बहुत किया है व्यर्थ प्रलाप,
सार्थक करने सार्थकता को
करना होगा "वार्तालाप" ।
है “असमंजस” मे चित्त मेरा
चिंता मे चित न हो जाऊँ ,
“हल्ला बोलूँ” किस कौशल से

किस कौशल से सम्मुख आऊँ ।
है “प्रस्तुति” परमार्थ की
परमार्थ इसका पूर्ण है,
शील साहस धैर्य से
अब मन मेरा सम्पूर्ण है।
साथ लिए टिम टिम जुगनू की
मै आगे बढ़ता जाता हूँ,
लौ निचोड़ अपनी सारी
मै सूरज से टकराता हूँ।
बुद्धि विवेक का अवलोकन हो
या प्रश्नो का हो प्रहार,
अति-विनीत हो सबका मै
प्रत्युत्तर देता जाता हूँ।
तन्मयता की ऐसी छवि पर
सोच मे पड़ा विधाता है,
मैंने लक्ष्य को साधा है
या लक्ष्य ने मुझको साधा है।
हार हो या जीत हो
बस युद्ध करने का जुनून है,
जब तक रहूँ मर्यादित रहूँ
फिर बिखर जाऊँ शुकून है।
है “अपूर्व” “शोभित” “अनंत”
इस महासमर की कांति किरण,
चहुंदिश चंचल चातुर्य लिए
स्वच्छंद विचरता ख्याति हिरण।
उस “बागेश्वर” की बाग के
हम “पल्लव” हैं “प्रतीक” हैं,
“अभिषेक” कर प्रकाश से
जिसने दिया सादर शरण ॥
….देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

स्मृतिया- यह कविता मेरे कालेज के एक वार्षिक techincal festival “Enigma-2008” से प्रेरित है जिसमे उस वर्ष विभिन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था जैसे-“वार्तालाप”,”असमंजस”,”प्रस्तुति”व”हल्ला बोल”।अपूर्व,शोभित,वागेश्वर,प्रतीक,अनंत व अभिषेक आदि इस वार्षिक प्रतियोगिता के आयोजक मण्डल के सदस्य थे। यह कविता मेरे सभी मित्रों एवं आयोजक मण्डल के सम्मानित सदस्यों को समर्पित है।

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मुक्तक । सम्मान के प्रति।

मुक्तक। सम्मान के प्रति ।

घूँट अपमानों की पीता जी रहा इंसान है ।
दम्भ, घृणा, ईर्ष्या है, खोखला अभिमान है ।
देखकर गहरी परत ये मान पर अपमान की ,
बैठ कोने में कहीँ अब रो रहा सम्मान है ।।

@राम केश मिश्र

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ग़ज़ल । जलाना तो पड़ेगा ही ।

।ग़ज़ल। जलाना तो पड़ेगा ही ।।

लिखा तकदीर ने बरबस बिताना तो पड़ेगा ही ।
गमो का लुफ़्त जीवन में उठाना तो पड़ेगा ही ।

भले मरहम लगाकर ये दुनिया हौसला दे दे ।।
अग़र है जख़्म गहरा तो छुपाना तो पड़ेगा ही ।

नही नाराज़गी खुद से शिक़ायत है नही गम से ।
रहे नारज फिर भी ख़ुश दिखाना तो पड़ेगा ही ।

मिला जो इश्क़ में हमसे वही क़ातिल मेरा ठहरा ।
मग़र वादों का है बन्धन निभाना तो पड़ेगा ही ।।

मिलेगी हार मालुम है किसी शाजिस से ही मुझको ।
मग़र दिल की तमन्ना है जलाना तो पड़ेगा ही ।

बिखर कर टूट जाये दिल शिकायत से मिलेगा क्या ।
छुपाकर अश्क़ आँखों में मुस्कुराना तो पड़ेगा ही ।।

“रकमिश”सोच लेना तुम मिलेगी उम्र न फिर से ।
मिली ये जिंदगी -दौलत लुटाना तो पड़ेगा ही ।।

@राम केश मिश्र

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तुम्हारे ही खातिर है हम-गज़ल

जिस राह पे तुमने रखा कदम है,
उस राह के भी मुसाफिर हैं हम।

अपनी वफा के काबिल तो समझिए,
उम्र भर साथ चलने को हाजिर हैं हम।

तन्हा सफर जल्दी कटता नहीं है
हवाओं का रुख यूं बदलता नहीं है,
खुदा ने मेरे बस यही है कहा
हर सफर मे तुम्हारे ही खातिर हैं हम।

साथ दोगे हमारा तो एहसान होगा
तुम्हारी मोहब्बत मेरा ईमान होगा,
छोड़ दो मुझको तन्हा या आबाद कर दो
हर सितम आज सहने को हाजिर हैं हम।

बातें नही ये दिल के बेचैन से जज़्बात हैं
मुद्दत से हसरतों की तन्हाइयों के साथ है,
अब तो कोई बंदगी का रहनुमा मिले
जमाने की नजर मे कब से काफिर हैं हम॥
…………..देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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शायरी

खूब कोशिश कि तुझे कलम मे समेटने कि,
लिखते लिखते ये स्याही अपना असर खोती रही,
जिदंगी जीने के लिए जरूरत थी बहाने की,
बस तु मुस्कुराती रही हमारी बसर होती रही

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Teri Baahi Mein

Teri baaho mein meri kabhi karwatein hongi,
Chaadaro pe kuch un-kahi silvatein hongi..
Teri rengti ungliyo se kuch shararatein hongi,
Chandni raato main shuru kayi mohabbatein hongi..
Ugte sooraj ki halki garmi mein,
Badalti kayi aashayein hongi..
Mausam ke badalne ke darmiyan,
Boht si un-suni baatein hongi..
Dhalti-badhti umr ke saath,
Parwaan apni chahatein hongi..
Teri baaho mein meri kabhi karwatein hongi,
Chaadaro pe kuch un-kahi silvatein hongi…

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Socha Na Tha

Waqt itna zaalim ho jaega, ye socha na tha.
Chand rasmo ke baad yeh ishq fanaa ho jaega, socha na tha..
Kehkar gaya tha wo ki laut aega.
Haatho ki lakeero se kisi aur ka ho jaega,
Kabhi ye socha hi na tha..

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Kafir Hone Ka Naam

Kya waqt aaya he…
Har shaqsh kisi na kisi samander me samaya he,
Kash koi dariya hume bhi mil jata…
Jiski gheraiyo ko dhundhne hum nikal padte…
Ishq ka fitoor na sahi,
Kafir hone ka naam to mil jata….

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