बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

नज़रिया

हमने जज़्बा 'ए' मोहब्बत समेट ली ,
जिस दर से भी गुज़रे, खुशियां समेट ली .

यूँ तो ज़ख्मों की कमीं न थी जहाँ में ,
हमने हर दर्द की मलहम समेट ली .

यार नाज़ायज़ है वक़्त की तदबीर सोचना ,
हमने हर लम्हे में जिंदगी समेट ली .

बहुत मन्नतें कर ली खुद की खा.ना में ,
'राज़ ' उसने ख़ुदी में ख़ुदाई समेट ली .

ये न था की रंजोगम कुछ कम थे इस तरफ ,
हमने बस दर्द की नसीबी समेट ली

अंदेशा है तेरे साथ ख़ाक हो पाएं ,
पर तेरे साथ उम्र 'ए ' रूहानियत समेट ली .

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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

रेत का आँचल

ये कविता उन लोगो को समर्पित है जो बिना बात के कथित आंदोलनों में हुई हिंसा के शिकार हो जाते हैं….

रेत का आँचल ओढ़ आयी है, ज़िन्दगी कैसा मोड़ लायी है,
तिनका तिनका कर घर बनाया था-२
तिनका तिनका कर तोड़ लायी है,
रेत का आँचल ओढ़ आयी है, ज़िन्दगी कैसा मोड़ लायी है।

भेष में इन्शाँ, के छुपा करके-२,
भीड़ शैतानों की जोड़ लायी है,
रेत का आँचल ओढ़ आयी है, ज़िन्दगी कैसा मोड़ लायी है।

है बना दुश्मन इन्शाँ इन्शाँ का-२,
जाने कैसी ये होड़ लायी है,
रेत का आँचल ओढ़ आयी है, ज़िन्दगी कैसा मोड़ लायी है

हमको ज़िंदा ही दफ्न कर डाला-२ ,
ज़ज़्बा इंशानी कहीं पे छोड़ आई है,
रेत का आँचल ओढ़ आयी है, ज़िन्दगी कैसा मोड़ लायी है।

मौत से मिलकर हमें थोड़ा सुकूँ तो है-२,
ज़िन्दगी वैसे भी हमको कब सुहाई है,
रेत का आँचल ओढ़ आयी है, ज़िन्दगी कैसा मोड़ लायी है।

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भूल ना जाना इस सहादत को..............

ऐ मेरे वतन ,
निभा दिया वो हर फ़र्ज़ ,
जिसके लिए मैं आया था ,
छोड़ दिया उस माँ का दामन ,
जिसकी मैं दुनिया था ,
वो पिता जिसका एक ही सहारा था ,
मेरे जिगरा दी यारी ,अधूरी रह गयी मेरे बिन ,
मेरा सनम जिसका इंतज़ार कभी खत्म ना होने वाला था ,
आँखे बंद करके बहुत सुकून मिला ,
जब लिपटा था , तिरंगे की उस शान से ,
पर जब माँ सीने पर सर रख्कर रो रही थी ,
बहुत बेबस हो गया था ,
कैसे समजाता माँ , तेरा लाल तो अपने वतन पर शहीद हो गया ,
लेकिन सदैव ज़िंदा रहेगा वो ,अमर ज्योति बनकर …….

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जिंदगी का सफर है हसीं मेरे यार

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शर्म आनी चाहिये

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

जिनके बच्चे घरो में भूखे बैठे हो
उनको फुर्सत कहाँ अधिकारों की
घर से निकला है मज़बूरी उनकी
भेट चढ़ते वो ऐसे गुनहगारो की
इसका अब इलाज़ होना चाहिये !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

दो घूँट मय,चंद पैसो की खातिर
नेताओ के जाल में फंस जाते है
लेकर सहारा अपने अधिकारों का
आतंक का खुला तांडव रचाते है
उनपे अब शिकंजा कसना चाहिये !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

कही किसी का जब कोई अपना
जंग जिंदगी से लड़ रहा होता है
राह में अटका वो सांसे गिनता
ऐसे दबंगइयो का शिकार होता है
एक पल उनके बारे में सोचना चाहिए !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

मांग के नाम पर करे मौज मस्ती
कैसा अनूठा ये चलन चल पड़ा हैं
अपने घर दुकानो को जलते देख
इंसान मूरत बन बेबस बना खड़ा है
ऐसे हालातो पर शिकंजा कसना चाहिए !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

ईश्वर न करे किसी के भी जीवन में
सूना रह जाए मंडप ऐसी मनहूस घडी आये
क्या गुजरती है एक बेटी के बाप पर
जब मध्य राह से वर की बरात लौट जाये
ऐसी जाहिलियत पे शर्म आनी चाहिये !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

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[[___डी. के. निवातियां __]]

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"मुजे वो हिन्दुस्तान मिल जाये"

जिस के पास भी मांगु गीता और कुरान मिल जाये ।
मिल जुल कर रेहना हैं सबका ये ख्याल मिल जाये ।
ना कोई ईसाई ,ना कोई हिन्दू ,ना कोई मुसलमान हो ;
जहा सिर्फ हिन्दुस्तानी हो मुजे वो हिन्दुस्तान मिल जाये ।
-एझाझ अहमद

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शर्म आनी चाहिये

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

जिनके बच्चे घरो में भूखे बैठे हो
उनको फुर्सत कहाँ अधिकारों की
घर से निकला है मज़बूरी उनकी
भेट चढ़ते वो ऐसे गुनहगारो की
इसका अब इलाज़ होना चाहिये !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

दो घूँट मय,चंद पैसो की खातिर
नेताओ के जाल में फंस जाते है
लेकर सहारा अपने अधिकारों का
आतंक का खुला तांडव रचाते है
उनपे अब शिकंजा कसना चाहिये !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

कही किसी का जब कोई अपना
जंग जिंदगी से लड़ रहा होता है
राह में अटका वो सांसे गिनता
ऐसे दबंगइयो का शिकार होता है
एक पल उनके बारे में सोचना चाहिए !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

मांग के नाम पर करे मौज मस्ती
कैसा अनूठा ये चलन चल पड़ा हैं
अपने घर दुकानो को जलते देख
इंसान मूरत बन बेबस बना खड़ा है
ऐसे हालातो पर शिकंजा कसना चाहिए !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

ईश्वर न करे किसी के भी जीवन में
सूना रह जाए मंडप ऐसी मनहूस घडी आये
क्या गुजरती है एक बेटी के बाप पर
जब मध्य राह से वर की बरात लौट जाये
ऐसी जाहिलियत पे शर्म आनी चाहिये !!

पेट जिनके भरे हुए, घर कुबेर से भरे हुए,ऐसे लोगो को बवाल का बहाना चाहिये !
क्या लेना देना उन्हें किसी की बेबसी से, उन्हें तो परेशान करने का बहाना चाहिये !!

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[[___डी. के. निवातियां __]]

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संयुक्त परिवार

फासले इतने बढे है
दिलो मे आ गयी दरार
भागदौड भरी जिंदगी मे
टूट गये संयुक्त परिवार
कित पाये संस्कार फूल अब
दादी बाबा का उठ गया साया
प्रेम दया अब कहाँ से लाये
बहन भाभाई का साथ ना भाया
कितने मजे थे उस आंगन के
चाचा ताऊ के थे जो दुलारे
चाची ताई की नोकझोंक मे
गूंजते थे सबके किलकारे
ना बोझ था जिम्मेदारी का
तन्हाई का दामन नही था
झगडते थे हर रोज शौक से
पर दिलो मे कोई रंज नही था
आमदनी कम थी भले ही
परिवार एक सा खाता था
दर्द हो जाये एक को
परिवार आसूं बहाता था
तेर मेर ने उखाड डाला
संयुक्त परिवार के बरगद को
मातृत्व गुम हुआ पैसो मे
छीना बच्चो की जन्नत को
आया की छाया मे पलते
माता का दुलार ना ले पाये
अपने कुटुंब से ही दुर है जो
वो धरा कुटुम्ब कैसे अपनाये
नही बदली भारत की भूमि
बस संस्कार बदल रहे है
टूट रहे है संयुक्त परिवार तो
जग बैर भाव मे जल रहे है
कहने को है बात पुरानी
पर आज भी इसकी जरूरत है
जग की सब खुशियो की कुंजी
संयुक्त परिवार की मूरत है।

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कौन जानता है |ग़ज़ल |

परदे के पीछे का गफ़लत कौन जानता है |
बेगुनाह जेल में,गुनाहगार आज़ाद घूमता है |

झूठ को सच साबित करने में देर नहीं,
बेमौसम यहाँ लोगो का ईमान बदलता है |

फूटपाथ में सोने के लियें मजबूर है गरीब,
पर यहाँ अमीरों काला धन विदेश भेजता है |

कुछ लोग है यहाँ पर देश के दुश्मन ,
यहीं कुछ लोग नफ़रत का बीज बोता हैं |

क्यों लोग अंधे हो जाते है इस कदर ,
बिना सोचे-समझे अपना ही घर जलाता है |

माना कि कुछ उथल-पुथल है देश में ,
पर इस धरा से प्रेम हर भारतीय करता है |

Dushyant kumar patel

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देशभक्त कौन ? { कविता }

देशभक्त कौन ? { कविता }

निज जननी के सामान , माँ भारती को दे जो सम्मान ,
उसके सुख ,यश व् मान हेतु एक करे अपने मन -प्राण ,
आराध्या हो जिसकी माँ , और वोह उसका सच्चा भक्त .
वही है देश भक्त …..

सुन नहीं सकता जो अपनी माँ की निंदा /आलोचना ,
कैसे सह सकता है वोह पुत्र माँ भारती की अवहेलना,
अपनी आराध्या की निंदकों का जो बहा देता है रक्त ,
वही है देशभक्त ….

अपने कर्तव्य -पथ पर जो रहता है सैदेव अग्रसर ,
अपनी हर ज़िम्मेदारी को निभाने में रहता तत्पर ,
नहीं करता वह बर्बाद बडबोलेपन में अपना वक्त .
वही है देशभक्त …..

मातृभाषा ,क्षेत्र -भाषा या राष्ट्रभाषा सब हैं पूजनीय ,
हमारी संस्कृति ,सभ्यता ,वेश , इतिहास है अग्रणीय ,
गौरवपूर्ण निज देश -स्तुति में रहता है आसक्त .,
वही है देशभक्त …..

देश के संविधान के प्रति हो जिसकी आस्था गहन ,
उसके कानून ,आचार-संहिता , अनुशासन का पालन ,
प्रेम -सोहाद्र , शांति ,सदाचार बहाली का जिसने लिया हो व्रत ,
वही है देशभक्त ….

अपनी राष्ट्र -संपत्ति , स्मारक और एतिहासिक धरोहर ,
यह है हमारे श्रधेय पूर्वजो की दी हुई अनमोल धरोहर ,
एक जागरूक नागरिक की तरह सभाल करे इनकी जो हर वक्त ,
वही है देश -भक्त …….

अपने मन -वचन -कर्म से ही नहीं , अपने जान से भी ,
प्रेम करे अपने देश को , माँ-भारती को अपने प्राणों से भी ,
के अपने बलिदान से भी ना चुके ,जब बहाना पड़े अपना भी रक्त ,
वही है देशभक्त ……

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"पल भर मोहब्बत की भी आस न रखे कोई"

मेरी सांसों से चले एसी साँस न रखे कोई ।
मैं खुद प्यासा हूँ , मेरी प्यास न रखे कोई ।
दाँव पे रख दी हैं जिंदगी भर की मोहब्बत ,
पल भर मोहब्बत की भी आस न रखे कोई ।
-एझाझ अहमद

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कोई जलजला ही लगे

……………..एक गज़ल …………………..
ये मस्त हुश्न तेरा ,कोई जलजला ही लगे.
मुझको तो आशिकों की , अब क़ज़ा ही लगे.

कि बढ़ रहा है दमा और घुट रही साँस भी
दवा बेअसर ,दुआ किजिए कि दुआ ही लगे

किसने किया था सौदा, अस्मत का देश की
गुलामी कि वजह कौन थे, सच पता ही लगे

बैसाखियाँ किसी को चलना, सिखाती नहीं
है चला रहा जो सबको , वो होंसला ही लगे

‘हिन्दुस्तान’ को देखे तो कहे दुनिया बरबस
कामयाबियों का ये कोई सिलसिला ही लगे
गंगा धर शर्मा ‘हिन्दुस्तान’

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सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

क्या लाये थे .....

कहते सुना है लोगो से
क्या लाये थे क्या ले जाओगे
खाली हाथ आये थे खाली जाओगे
हमने तो जिंदगी में
इसके उलट देखा है
खाली हाथ आते है सभी
बहुत कुछ संग ले जाते है
कोई सत्य के साथ ले जाता है
किसी के संग बुराई अपार जाती है
कोई पुण्य की कमाई ले जाता है
पाप का ताज सर सजाकर जाता है
माना के धन दौलत सम्पति
सब यही धरा रहा जाता है
मगर करके पुण्य कर्म
स्वंय को जमी पे अमर कर जाता !!
!
!
!
@___डी. के निवातियाँ___@

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जिंदिगी

पूछा बुला के जिंदिगी ने एक दिन,
हर वक्त क्यों परेशान रहता है,
तेरा ऐसा क्या बुरा कर दिया मैंने,
जो तू मुझपे पशेमान रहता है,
पड़ गया सोच में की क्या जवाब दूँ,
गिनवा दूँ गम अपने या आसुओं का हिसाब दूँ,
पास मेरे ऐसा क्या है जिसपर फकर करूँ,
या बस सिर्फ जिन्दा हूँ इसका जिकर करूँ,
खामोश देख मुझको ज़िंदगी मुस्कुराई,
फिर आगोश में अपने लेकर उसने मुझे दुनिया दिखाई,
कभी गरीब क़े घर की रोटी, तो कभी टूटी झोपडी देखाई,
कभी जवान बेटे की मौत का मातम मानते माँ बाप दिखाए,
तो कभी अस्पताल ले जाकर मरते हुए बच्चे दिखाए,
दिखाना तो और बहुत चाहती थी ज़िंदगी,
पर मुझे होने लगी थी खुद पर शर्मिन्दिगी,
फिर ज़िंदगी ने मुझे प्यार से समझाया,
मिला है जितना उसी मैं ख़ुशी तलाश,
ज़िंदगी मे गम नहीं, ग़मों मैं ज़िंदगी तलाश,
है कोई इंसा जिसने ग़मों को न झेला हो,
की मुकद्दर मैं किसी क़े हरदम खुशियों का मेला हो,
ख़ुशी और गम एक ही सिक्के क़े हैं दो पहलु,
समझ चुके हो तुम मुझे तो मैं चलूँ,
मैंने कहा थोड़ा रुक ज़िंदगी, जरा गले लगाने दे,
अब तक जो थे तुझसे शिकवे गिले, सब मिटाने दे,
ज़िंदगी ने कहा तू तो समझ गया, औरों को भी समझाना,
मिलती नहीं मैं बार बार, हर किसी को बताना,
छोड़ शिकवे गिले जो मुझे जियेगा,
वादा है मेरा वो बार बार मुझसे मिलेगा |

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"पत्थर दील पे मेरे अब कोई असर न होगी"

पत्थर दील पे मेरे अब कोई असर न होगी ।
मर भी गये तो अब तुमको खबर न होगी ।
खो जायेंगे उस अँधेरी तनहा रातों मे ,
के गर सूरज भी निकले तो सहर न होगी ।
तुम्हे देखता रहे चाहे सारा जहाँ मगर ,
निगाहें मोहब्बत की तुम पर नजर न होगी ।
चाहोगे मुझे गर ख्वाब मे भी बुलाना ,
तो आँखे तुम्हारी बन्द रात भर न होगी ।
ढूंढ़ते रहोगे चेनो राहत रात दिन ,
सुकुन से जिंदगी फिर भी बसर न होगी ।
लाख कोशिसे करोगे गर मर जाने की तुम ,
तुम्हारी जिंदगी फिर भी मुख़्तसर न होगी ।
-एझाझ अहमद

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एक घुटन

वो आई थी,
खुशियों की लड़िया संग लायी थी.
मंद-मंद मुस्काई थी,
और अपने संग उमंगों की दुनिया लायी थी.

मैं भी उसके पलकों के तले सोता था,
और उसके गालों पर सैर करता था.
कभी-कभी उसके जुल्फों में छिप जाता था,
और कभी उसकी झील सी आँखों में गोटे लगाता था.

न क्यों वो बिना बताये एक दिन चली गयी,
वो क्या गयी वसंत की बहार चली गयी.
झिळझिळ तारों की सौगात चली गयी,
नरम एवं मुलायम अठखेलियों की हंसी चली गयी.

मैंने तो बड़े सपने सजा लिए थे,
आँखों में तरन्नुम के अहसास पल लिए थे.
रागों की माला गले में धारण कर ली थी,
और पुष्पों के गुच्छे भी अपने शरीर पर चिपका लिए थे.

पर मैं व्यर्थ ही रेगिस्तान में पानी तलाश रहा था,
क्या करूँ मृगमरीचिका देखकर खुश होने की अादत जो थी.
और मैं व्यर्थ ही अधखिले पुष्पों को निहारता था,
क्या करूँ ए स्वराज, अधखिले पुष्प देखने की आदत जो हो गयी थी.

और, एक दिन वो आई !!!

वो आई तब जब मैं खुशियों के दीप कही और जल रहा था,
आशयों की लड़िया कही और सजा रहा था.
पुष्पों के गुच्छे किसी और की कंठ में शोभा बढ़ा रहे थे,
अरमानों के दिए कही और ही जल रहे थे.

उसने माँगा मुझसे अभयदान,
पर मैं दे न सका कोई वरदान.

अब आये हो, जब पतझड़ में पत्ते सुख गए,
भीषण गर्मी में एक बूँद को तरस गया था,
और, बारिश में मुझे तर-बतर करने आये हो.
जब आँखे सूजकर लाल हो गयी,
तब गुलाबजल की कुछ बूंदे लाये हो.
क्या चाँद बूंदे मेरी आँखों की लालिमा दूर कर पायेगी?
क्या तुम्हारे वचन मेरी वेदना से भरी ह्रदय की पीड़ा को दूर कर पायेगी?
और क्या तुम्हारा समर्पण मेरे बेइंतहा ज़ब्त होते दादों की पीड़ा समझ पायेगी?

और, उसकी उमीदों की लड़िया टूट गई,
मन के भाव ताश के पत्ते की तरह बिखर गए,
आँखों की रंगत बेरंग हो गए.
आशाओं के दीपक बुझ गए.
अरमानो के आशियाने टूट गए.

वो बोलती है मैंने दिया उसे चुभन,
क्या करूँ अब मैं न होता था मगन,
बनती न थी किसी तरह की लगन.
और, उसके जीवन में रह गया अब बस ”एक घुटन”.
——— Swaraj Prasad
22th February , 2016

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रविवार, 21 फ़रवरी 2016

"हम ईश्क के कर्जदार न थे "

तनहा थे तो भले थे हम,
हम ईश्क के कर्जदार न थे ।
अब काफी है मुझको एक ईशारा,
हम पेहले समझदार न थे ।
एक ईशारे पे तेरे सब लुटा दे,
हम ईतने भी दिलदार न थे ।
मर्जी से दिया उसने सब मुझको,
हम उसके कोइ हिस्सेदार न थे ।
मौत की वजह से मिली दो गर्ज जमीं ,
हम पेहले से जमींदार न थे ।
-एझाझ अहमद

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आजादी

देश की हर आबादी ने,मांगी थी अपनी आज़ादी
क्या ये आज़ादी बस थी अंग्रेजी हुकूमत तक

अंग्रेजी हुकूमत से आज हर आबादी आज़ाद है
फिर भी भारतवंशी आज दाने-दाने को मोहताज है
सोच रही है हर आबादी ,कब मिलेगी इनसे आज़ादी

नारी अत्याचार से ,दानव भ्रस्टाचार से
अशिक्षा के हथियार से,जाति-धर्म के दीवार से
सोच रही है हर आबादी ,कब मिलेगी इनसे आज़ादी

महगाई के डायन से,बेरोजगारी के दामन से
आतंकवाद के रावण से,बढ़ते हाथ दुस्सासन से
सोच रही है हर आबादी ,कब मिलेगी इनसे आज़ादी

भुखमरी की आग से ,बूँद-बूँद की प्यास से
गन्दगी के अम्बार से,गरीबी की जाल से
सोच रही है हर आबादी ,कब मिलेगी इनसे आज़ादी

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साँझ की शिकायत

शिकायत साँझ ने कुछ ऐसे की
जैसा कोई रूठा दोस्त शिकायत कर रहा हो
कहा की मुझे भूल गया तू
सुबह से रात तक जगता
खून पसीना बहा
कागज़ जोड़ रहा

आज हाथ थाम
उसने लिया बैठा
उस गाँव मे जिसे
बहुत पहले अकेला छोड़ आया था मैं तनहा,
शाम ने धुंध को लपेटे हुए पूछा
उस शहर में ऐसा क्या पाया
तूने जो अपनी मिट्टी को
पीछे छोड़ दिया
गाँव की पगडण्डी को मोड़
शाम से नाता तोड़ दिया
रात से दिन तक यंत्रमानव
बना हुआ
रुक कभी मेरे साथ यहाँ
दिन की धुप और रात के अँधेरे के
बीच में है यही शाम
जो तुझे थामे हुए है
मेरे साथ कभी बैठ जरा..

ये जो बात थी तुझमे और मुझमे
दोबारा हो नहीं सकती
तेरे साथ बीते साथ को
मैं फिर जी नहीं सकती

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शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

माना के खता करते रेहते है हम

माना के खता करते रेहते है हम
पर आकर हमसे कोइ गिला तो करो
वफा ना सही तो बेवफ़ाई ही सही
आपस मैं शुरू कोई सिलसिला तो करो
ये हसीन राते और भी हसीन करदे हम
ईन रातों मे हमसे आप मिला तो करो
हमें भी कहा पसंद है ये अँधेरे
चराग जला कर आप ऊझला तो करो

गुलाबो से रहा करते साथ हमारे
बगैर हमारे भी गुलाबो से खिला तो करो
पता है के बेवफा हो गये है आपकी नजर मैं
पर आप अपने दील से हमारा निकाला तो करो
-एझाझ अहमद

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