रविवार, 28 फ़रवरी 2016

आज़ाद मरते नही- सोनू सहगम

aazad

-: आज़ाद मरते नही :-

ग़ुलामी की बेड़ियों में रहना ,
उन्हें एक पल भी गवारा नही ।
कहा जब दहाड़कर -विरोधियों को
आज़ाद हूँ मैं , ईमान मेरा अभी मरा नही ।।

पर्वत शिखर की भाँति
थे उनके हौशले, इरादे
कहते सभी -अभी बच्चे हो
सबको दिखाई कमर तोड़ वक्त की,
बोल नही थे , जो कंठ से निकले उनकी
थी वो सिंह की दहाड़ ,
गर्जना थी वो खोलते रक्त की ।।
उनके मुख से निकला हर स्वर,
तरुणों में जोश भरता था,
देश का नौजवान, बच्चा – बच्चा ,
खुद को आज़ाद समझता था,।।
मृत्यु से डरना ,जिसने सीखा जरा नही ।।

आज़ादी का जोश ,उनके सीने में,
ज्वालामुखी बनकर धड़कता था।
बड़े बड़े दुश्मनों के सम्मुख भी,
पठ पर हाथ- मूँछो पर ताव मारता था ।।
इतिहास का था वो काला दिन
अल्फ़्रेड पार्क में घटना जो घटनी थी,
एक आज़ाद शेर के शिकार को ,
अंग्रेज नही,निकली गीदड़ को टोली थी ।।
दुश्मन के हाथो पकडे जाना ,
उनके स्वाभिमान को काबुल न था ।
खुद को मारी जब गोली
चहरे पर तनिक शिकन न था।।
“मरते नही आज़ाद”
(लेखक:- सोनू सहगम)

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दिवाना एक बेवफा का

तेरी बेवफाई के लिए भी सेज़ मै सजाऊंगा
तेरी ख़ुशी के लिए,अपनी ख़ुशी का जनाजा मै उठाऊंगा
दुनिया भी देखेगी , तेरी इस बेहयाई को
तेरी चुनरी से अब,अपना कफ़न मै बनाऊंगा

हाथो में लगी मेहँदी का रंग,तेरा फीका पड़ जाये न
अपने खून के हर कतरे से,तेरा हाथ सजाऊंगा
तू सजेगी और संवरेगी ,भूलकर अपने इस दीवाने को
ये दीवाना तेरी खातिर ,शहनाई भी बजायेगा

तू मुझको भी याद करेगी,ऐसा कुछ कर जाऊंगा
कांटा तेरे कदमो को न लगे,फर्श मै बन जाऊंगा
तू उठेगी और जाएगी,अपने घर साजन को
तुझको रुखसत करने के बाद,जिन्दा दफ़न हो जाऊंगा

तेरे लिए मौला से कहकर ,एक अलग जन्नत बनवाऊंगा
तेरी हर खता के लिए,खुद को सजा दिलाऊंगा
मौला भी रोएगा,और कहेगा बस
अब फिर कभी न मै,ऐसा दीवाना बनाऊंगा

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किताबें

बचपन में पढ़ी –
किताबें ,
अब सुकून नहीं देतीं .

उनके साथ ,
पन्नें पलटते ,
देखे थे ,
मैंने ,
कई सपने .
तरह तरह के
और सारे रंगीन .

अब वक़्त के साथ,
बिखर गए हैं सभी .

पर मज़ा यह है की,
किताबें अब भी हैं मेरे पास,
उन सपनो की तस्कीद लिए,
जो बाँट सकती हैं – सपने ,
मेरे और उनके बच्चों में .

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ग़र सच्ची है मोहब्बत मेरी...

ग़र सच्ची है मोहब्बत मेरी, उसे एहसास तो होगा,
मोहब्बत का ये मारा दिल, इक उसके पास तो होगा,
तसव्वुर में वो जिसके खो के थोड़ा चैन पाते हों,
चलो हम ना सही, कोई यूं उनका ख़ास तो होगा।

भले ठोकर ही मारें वो समझ के राह का पत्थर -२
वो ठोकर से मिला हर ज़ख़्म लेकिन ख़ास तो होगा।

मोहब्बत को तेरी सिचुंगा अपने आँशुओं से मैं,
गुलिश्तां दिल का ये मेरा, यूहीं आबाद तो होगा।

के अब तो जान लेके हम हथेली पर निकलते हैं-२
यूँ जी के भी करेंगे क्या, तेरा ना साथ जो होगा।

बड़े मरते हैं आशिक़, हम भी मर जायें तो क्या गम है-२
ज़माने भर मोहब्बत का फ़साना याद तो होगा।

*विजय यादव*

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शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

गुलजार से तुम

अंधेरी रात में पूरे चाँद से तुम
ठिठुरती रात में मधम आग से तुम
अधजगी रात में पूरे नींद से तुम
घुप अंधेरे में एक चिराग से तुम
बन्द घर में खुल जाते खिड़की से तुम
ज्यादा मेरे लिए थोड़े अपने लिए तुम
नितान्त तन्हा मन में गुलजार से तुम

सविता वर्मा

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सुनो न,
देखो बुन रही हूँ
स्वेटर तुम्हारे ख्यालों का
मन की सलाइयों से
एक एक फंदा तुम्हारी यादों का
रेशम सा सुनहरा
जो तुमने दिया था अब वो धागा न रहा
पहनोगे न तुम।।

सुनो न
देखो सुन रही हूँ
धुन तुम्हारी चुप्पी की
लबों पे जो सजी थी बांसुरी सी
और सौत सी तकलीफ देती
अदृश्य वायु से तुम्हारे शब्द
जो कभी कहे ही नही गए
लिख रही हूँ एक गीत उनसे
एक नई सरगम गढ़ूंगी
सुनोगे न तुम।।।।

सुनो न
देखो चुन रही हूँ
फूल तुम्हारी मोहब्बत के
भर रही हूँ पोटली में
जो बीज बोया था मन की कोरी माटी मे
उग गया है अब उफ़्फ़ कांटे भी हैं
पर कोपलें भी फूट पड़ी हैं
रक्तिम लालिमा सी लिए
पर गूँथ डालूंगी इन्हें मन की माला में।
अपनाओगे न तुम।।

“सरगम अग्रवाल”

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पुकार............

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

एक दूजे के सब दुश्मन हो गए
हर कोई दूसरे पर कर प्रहार रहा
रोज कही पे पंगा, कही पे दंगा
और हो कही पर बलात्कार रहा !

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

भूल गए आज तुम्हारी कुर्बानी
अपना मतलब सबको याद रहा
जिसको दी देश की जिम्मेदारी
वो जीवन आनद से गुजार रहा !

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

कोई कहता यंहा क़ानून गलत है
कोई दोष संविधान में निकाल रहा
अपनी गलतियों का आभास नहीं
व्यर्थ गुस्सा व्यवस्था पे उतार रहा !

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

कौन है रक्षक, कौन है भक्षक
इसका नहीं अब कोई भान रहा
अपना ही अपने को मारने लगा
अब तो चहुँ और हो नरसंहार रहा !

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

सत्ता की भूख मिटाने को आज
सब नियम कायदो को भुला रहा
जुर्म की लंका में सब बावन गज के
नहीं अब कोई दूध का धुला रहा !

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

कोई आग लगाये, कोई तमाशा देखे
कोई नफरत की आंधी को चला रहा
असहाय निर्दोष की जान पे आई है
कही दोषी मजे से गुलछर्रे उड़ा रहा !

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

अब तो आ जाते इन आँखों में आंसू
देश “धर्म” का कितना हो बेहाल रहा
आ जाओ में मेरे देश के स्वभिमानो
देश का दुश्मन फिर तुम्हे ललकार रहा !!

आ जाओ गांधी, भगत, सुभाष, ये देश आज तुम्हे पुकार रहा !
दिया जो तुमने अनमोल तोहफा आजादी का हो अपमान रहा !!

!
!
!
डी. के. निवातियां___

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उसूल बदलने होंगे

चली थी ज़िंदगी जिन उसूलों पे अब तक,
और न जाने चलेगी ये कब तक ।

बदल गया ज़माना अब उसूल भी बदलने होंगे,
वर्ना खायेंगे खोखा, और रोते रहेंगे ।

आइना नया बनाना पड़ेगा,
नज़रों से सबकी छुपाना पड़ेगा ।

असलियत देखा दे जो इंसा की मुझको,
संभल जाऊंगा , बचा लूंगा खुदको ।

जियूँगा ज़िंदगी, शर्तों पे अपनी,
सुनूंगा सबकी, करूँगा बस दिलकी ।

अच्छा हुआ तो मिसाल बनूँगा,
बुरा हुआ तो किसे से न कहूँगा ।

छंट जायेंगे दोस्त, परिजन और कुछ चाहने वाले,
बच जायेंगे जो, वही होंगे साथ चलने वाले ।

बहुत कम भी हौ, तो भी गम ना करूँगा,
ख़ुशी से जियूँगा, कभी शिकवा ना करूँगा ॥

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भीड़ का हिस्सा

मां
तुमने कहा था न
मत बनना
भीड़ का हिस्सा
मैं नहीं बना।
पर मां
तुम तो चली गई वहां
जहां से कोई लौटता नहीं।
देखो न
भीड़ के पास क्या नहीं है।
गाड़ि़यां, आदमी, दौलत, औरत, शराब, सत्ता
वो मस्त हैं।
उनके बच्चों का बीमा है
बीवी के लिए सातों दिन के कपड़े हैं
अलग-अलग रंग और डिजाइन के
बच्चे मोटर में बैठते हैं
कलर के हिसाब से
इस दुनिया ने मुझे
दो जून की रोटी के लिए
तरसा दिया है मां
भीड़ का हिस्सा होता तो
तुम्हारे पोते-पोती के
स्कूल का फीस भरता
प्रिंसिपल की रिमाइंडर
मेरे मोबाइल के
मैसेज बाक्स तक आने के पहले
1000 बार सोचती
पर
तुम्हारा कहना मैंने माना
मैं भीड़ का हिस्सा नहीं बना।
मां,
एक बात बता दो।
सपने में ही बता देना।
जब तुम जानती थी कि
भीड़ का हिस्सा बनने में ही फायदा है
तब तुमने अपने इस भोले बच्चे को
भीड़ से अलग रहने की
कसम क्यों दी थी मां?
क्यों???

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खेदारु.......IBN

खेदारु…. एक छोटी सी कहानी….

गंगा नदी के तट से कुछ दूर पे एक छोटा सा गाँव (चांदपुर) बसा है ! जो उत्तर प्रदेश के बलिया जिले मे स्थिति है,उस गाँव मे (स्वामी खपड़िया बाबा ) नाम का एक आश्रम है, जहाँ बहुत से साधु-महात्मा रहते हैं !

उन दिनों गर्मियों का मौसम था, एक महात्मा आए हुए थें ! जिनका नाम स्वामी हरिहरानंद जी महाराज है, बाबा हर शाम को उस आश्रम मे सत्संग (प्रवचन) सुनाया करते थें ! जिसे सुनने आस-पास के गाँव के लोग और दूर के गाँव के लोग भी आते थें !
उस दिन बाबा इंसानी प्रवृति और नशे की चीज़ों जैसे- गुटखा,खैनी,बीड़ी,सिगरेट,जर्दा,शराब आदि जैसी नशीली चीज़ो पर (जो कितना बुरा असर करते हैं इंसानी शरीर पर ) इसके बारे मे लोगों को बता रहे थें,(प्रवचन दे रहे थें) !

सभी लोग बड़े ध्यान से बाबा का प्रवचन सुन रहे थें ! तभी बाबा की नज़र उस इंसान पे पड़ी जो बिल्कुल उनके सामने (सबसे आगे चौकी के नीचे ) बैठा था ! सभी लोग तो बड़े ध्यान से बाबा का प्रवचन सुन रहे थें, पर वो इंसान बड़े ही लगन से अपने हथेली मे खैनी (तंबाकू) रगड़ने (बनाने) मे ब्यस्त था ! अचानक से बाबा की नज़र पड़ी उसपे, बाबा ने उसे अपने पास बुलाया और उससे उसका नाम पूछा !
वो बोला बाबा…..हमरा नाम खेदारु है बाबा, इहे पास के गाँव का रहने वाला हूँ !
बाबा बोलें ठीक है, ये बताओ तुम खैनी (तंबाकू) कब से ख रहे हो ! वो बोला बाबा ई त हम बचपन से जब ८-९ साल का रहा, तब से खा रा हूँ ! फिर बोला बाबा हमरा से कवनो ग़लती हो गया का, माफी चाहता हूँ बाबा, बहुत दिन से हमहु चाहता हूँ, ई का (खैनी.) को छोड़ना पर का करूँ बाबा ई (खैनी) हमरा को छोड़ती ही नहीं ! बहुतई कोशिश किया हूँ,बाबा पर ई (खैनी) हमका नहीँ छोड़ती !

उसकी बातें सुनने के बाद, बाबा बोलें- लाओ दिखाओ वो (खैनी) जो तुम्हे नहीं छोड़ती,ज़रा हम भी देखें वो क्यों नहीं छोड़ रही तुम्हे ! फिर खेदारु ने अपनी पेंट की जेब से चीनौटी (एक छोटी सी डब्बी जिसमे खैनी रखते हैं) नीकाली और बाबा को दे दिया !
बाबा चीनौटी को अपने बगल मे रख के खेदारु को बोलें जाओ और अपनी जगह पे बैठ जाओ, और हाँ जब तुम्हे इसे (खैनी) खाने का मन करे तो इसे अपने पास बुला लेना ! तुम मत आना इसके पास चल के इसे खाने के लिए ! फिर देखते हैं क़ि ये तुम्हारे पास चल के जाती है या तुम खुद चल के इसके पास आते हो !
अगर ये (खैनी) तुम्हारे पास चल के गई तो हम मानेंगे क़ि ये तुम्हे नहीं छोड़ रही,
अन्यथा तुम ही इसे नहीं छोड़ रहे हो……..

बस……….बाबा की बात खेदारु के भेजे मे समझ आ गई……………!!

……………………………………………………….ख़त्म……………………………………………………

…………………………………………………….इंदर भोले नाथ………………………………………………..

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तू हर इक शै में बस्ता है

तू हर इक शै में बस्ता है, कहाँ सबको समझ आता है तू
है शुक्र तेरा मेरे साहिब, हर जगह नज़र आता है तू

हालात कभी मुश्किल जब हों, तू हर मुश्किल आसान करे
जब सोच नहीं पाता हूँ मैं, मेरी सोच में बस जाता है तू

मेरी नज़रें तो सीमित हैं, तेरी नज़रों में कुल आलम
जब समझ न मेरी काम करे, मेरा काम वो कर जाता है तू

दुनिआ की नज़रों में कातिल, बदमाश लुटेरे होंगे वो
पर मुझे बचाने मुश्किल में, उन घटों में भी आता है तू

मेरी समझ से दुनिआ बाहर है, बस मैं तो मुहब्बत करता हूँ
नफरत करने वालों में भी, मुझको तो दिख जाता है तू

कविता लिखने की कोशिश में, कभी कलम हाथ में होती है
जब शब्द नहीं मिलते मुझको, आके खुद लिखवाता है तू

‘रवि’ नाम तो अपना लिखता हूँ, पर इतना भी काबिल मैं नही
बस काम वोही मैं करता हूँ, जो मुझसे करवाता है तू

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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

जिदंगी जैसी है यारो; खूबसूरत है

जिदंगी जैसी है यारो; खूबसूरत है,
है ख़ुशी की भी ग़मों की भी जरुरत है,
ना चला है जोड़ जीवन में किसी भी वीर का,
वक़्त के साम्राज्य में किसकी हुकूमत है ?

बचपना, क्या बुढ़ापन,कैसी जवानी है,
तेरी-मेरी, यार सबकी इक कहानी है,
मुस्कुराहट खिल रही थी जिन लबों पे कल तलक ,
आज उन आँखों में भी खामोश पानी है,

था कही जिन आँखों में इक जगमगाता-सा दिया,
वक़्त की राहों में अब वो आँख बूढ़ी है,
जिस तरह हमको जरुरत है सहारों की कही,
उस तरह कुछ मोड़ पर ठोकर जरुरी है,

दोस्त क्या, दुश्मन हैं क्या, सब ही दीवाने हैं,
हैं कभी दुश्मन भी अपने; अपने बेगाने हैं,
हैं कभी खामोश लब, कभी लब पे गाने हैं,
सबकी अपनी एक दुनियां, अपने तराने हैं,

रात की चादर तले जो चाँद भारी है,
सूर्य की दहलीज़ पे वो भी भिखारी है,
हार के, रो के किसने किस्मत सवांरी है,
मुस्कुरा, गम को भुला, दुनियां तुम्हारी है,

हँस के, गा के, तुम बिता लो,जिंदगी के पल हैं जो,
मौत आने पर तो सबकी ही फजीहत है,
जिदंगी जैसी है यारो; खूबसूरत है,
है ख़ुशी की भी ग़मों की भी जरुरत है…

“साथी “

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Sयथार्थ

यथार्थ के धरातल पर
इन लोकाचारो से दूर
जब इन्सान इन्सानों से
हाल ए दिल पुछे तो पायेगा
नितान्त तन्हा है इब्सा
Savita Verma

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बस एक अभिलाषा ... कविता

बस एक अभिलाषा … कविता

जन-जन के ह्रदय को देश-प्रेम जगा दो ,
भगवान् मेरे भारत की तकदीर संवार दो ,

हर युग में आये तुम लेकर भिन्न अवतार ,
हर बार दिया इसे दुःख -क्लेशों से तार ,
इस युग में आकर भी इसकी बिगड़ी बना दो .
भगवन मेरे ………

विरोधियों,दुश्मनों और गद्दारों की भीड़ बड़ी है भारी ,
सुरसा बनकर हर समस्या लग रही है बड़ी भारी .
अपनी अद्वितीय शक्ति से इनको परास्त कर दो .
भगवान् मेरे ……….

तुम्हारी भक्ति के सामान अमूल्य है राष्ट्र -भक्ति ,
प्रत्येक भारत वासी के लिए आवश्यक है देश-भक्ति ,
इस भावना का संचार रक्त की भांति इनमें कर दो .
भगवान् मेरे ……..

जाति – धर्म -रंग -क्षेत्र -भाषा भेद को सब भूल जाएँ ,
मिलकर रहे प्यार से ,परस्पर बैर -भाव सब भूल जाएँ ,
हम सब हैं एक परिवार ,यह सभी को समझा दो .
भगवान् मेरे ……..

महान स्वतंत्रता -सेनानीयों व् महा पुरुषों की कुर्बानी ,
अमल करें सैदेव अपने संत-महात्माओं की अमर-वाणी ,
इनके प्रति श्रद्धा ,सम्मान हर दिल में जगा दो .
भगवान् मेरे ………

हम भारतीओं की एकता ही इसकी आखंडता है ,
हमारा परस्पर प्रेम व् भाईचारा ही इसकी ताकत है.
मेरे देशवासी भाई-बहनों को मिलकर रहना सिखा दो .
भगवान् मेरे ……..

सुनते आये है अपने पूर्वजों से , देश तभी संपन्न होता है,
जब देश में शांति , सदाचार , अनुशासन का पालन होता है,
मेरे देश को भी सुखी और -समृद्ध बना दो .
भगवान् मेरे ……..

हमें देश को चहुँमुखी विकास पथ पर तो है चलाना ,
मगर प्राकृतिक संसाधनों को भी है संजो कर रखना ,
प्रकृति और विकास के मध्य सामजस्य बिठाना सिखा दो .
भगवान मेरे ………

मेरे देश की भलाई ही है मात्र मेरे जीवन की अभिलाषा ,
बड़े ही दीन-हीन होकर व्यथित होकर लगायी है आशा ,
अब देर ना करो , इसकी कठिनाईयों का जल्द उपचार कर दो ,
भगवान् मेरे …….

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हृदय की गाथा .....

निकले थे लेकर अरमानो का पिटारा जीवन के सफर पे
खट्टे मीठे अनुभवों ने खुशियो की झोली खाली कर दी !
भटकते रहे दर – बदर होकर वक़्त के रथ पे सवार
खो गयी मंजिल तो कश्ती लहरो के हवाले कर दी !
जब मिला न कोई दर्द बाटने वाला हमसफ़र हमे राह में
लेकर सहारा तिनको का जिंदगी तूफ़ानो के हवाले कर दी !
हर एक रंज -ओ-गम को रखते रहे समेत कर पहलू में
हृदय की गाथा आंसुओ की स्याही से कागजो पे लिख दी !!

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०___डी. के. निवातियां___०

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भारत को श्रेष्ठ बनाना है

कण कण जिसका क़र्ज़ है हमपर, उस माटी का क़र्ज़ चुकाना है .
एक सोच है एक लक्ष्य, भारत को श्रेष्ठ बनाना है

हब्शी भेड़ियों की लार टपकती
उस अग्नि में लाज सिसकती
उस सिसकी की करूँ क्रंदना
निर्वस्त्र हो गयी मानव वेदना
उस दानव के पंजो से दामिनी का दमन बचाना है
एक सोच है एक लक्ष्य, भारत को श्रेष्ठ बनाना है

बिन विद्या वो है अपंग
सहमत नहीं कोई चलने को संग
नेत्रों से बहे जब अविरल धारा
कलम बनेगी उसका सहारा
विद्या का द्वीप जलाना है तो हर बेटी को पढ़ाना है
एक सोच है एक लक्ष्य, भारत को श्रेष्ठ बनाना है

कट्टरता है देश का दुश्मन
उसके चपेट में युवा मन
अपने लोभ में विवश कुछ नेता
एक को अनेक क्यों कर देता
तिरंगे का रंग बचाना है तो आपस की दुरी मिटाना है
एक सोच है एक लक्ष्य, भारत को श्रेष्ठ बनाना है

प्रेम स्वभाव है प्रकृति अपनी
मेल भाव है संस्कृति अपनी
कई धर्म है, कई जात है, कई राज्य कई भाषा
सर्व हितानी सर्व सुखानी है , है यह परम अभिलाषा
अनेकता में एकता सार्थक करना है तो, भारतीयता ही पहचान बनाना है
एक सोच है एक लक्ष्य, भारत को श्रेष्ठ बनाना है

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समर पथ

जिवित है प्राणी
चल रहा धीमें-धीमें
हरदम हरपल चलती है
परछाई उसके पीछें-पीछें
राह कठिन पा जाता है
खुदा को दोषी ठहराता है
जान वचाने की खातिर
वो क्या-क्या खेल रचाता है
अमृत समय मे लाने को
दीक्ष हला विष पीता है
खुद को मानव कहता है
और आगे वढ़ता रहता है।
-:निर्देश कुदेशिया

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नज़्म - इंक़लाब / ज़ीस्त

मुझसे इस वास्ते ख़फ़ा हैं हमसुख़न मेरे
मैंने क्यों अपने क़लम से न लहू बरसाया
मैंने क्यों नाज़ुक-ओ-नर्म-ओ-गुदाज़ गीत लिखे
क्यों नहीं एक भी शोला कहीं पे भड़काया

मैंने क्यों ये कहा कि अम्न भी हो सकता है
हमेशा ख़़ून बहाना ही ज़रूरी तो नहीं
शमा जो पास है तो घर में उजाला कर लो
शमा से घर को जलाना ही ज़रूरी तो नहीं

मैंने क्यों बोल दिया ज़ीस्त फ़क़त सोज़ नहीं
ये तो इक राग भी है, साज़ भी, आवाज़ भी है
दिल के जज़्बात पे तुम चाहे जितने तंज़ करो
अपने बहते हुए अश्कों पे हमें नाज़ भी है

मुझपे तोहमत लगाई जाती हैं ये कि मैंने
क्यों न तहरीर के नश्तर से इंक़लाब किया!
किसलिए मैंने नहीं ख़ार की परस्तिश की!
क्यों नहीं चाक-चाक मैंने हर गुलाब किया!

मेरे नदीम! मेरे हमनफ़स! जवाब तो दो-
सिर्फ़ परचम को उठाना ही इंक़लाब है क्या?
कोई जो बद है तो फिर बद को बढ़के नेक करो
बद की हस्ती को मिटाना ही इंक़लाब है क्या?

दिल भी पत्थर है जहां, उस अजीब आलम में
किसी के अश्क को पीना क्या इंक़लाब नहीं?
मरने-मिटने का ही दम भरना इंक़लाब है क्या?
किसी के वास्ते जीना क्या इंक़लाब नहीं?

हर तरफ़ फैली हुई नफ़रतों की दुनिया में
किसी से प्यार निभाना क्या इंक़लाब नहीं?
बेग़रज़ सूद-ओ-ज़ियाँ की रवायतों से परे
किसी को चाहते जाना क्या इंक़लाब नहीं?

अपने दिल के हर एक दर्द को छुपाए हुए
ख़ुशी के गीत सुनाना भी इंक़लाब ही है
सिर्फ़ नारा ही लगाना ही तो इंक़लाब नहीं
गिरे हुओं को उठाना भी इंक़लाब ही है

तुम जिसे इंक़लाब कहते हो मेरे प्यारों
मुझसे उसकी तो हिमायत न हो सकेगी कभी
मैं उजालों क परस्तार हूं, मेरे दिल से
घुप्प अंधेरों की इबादत न हो सकेगी कभी

ख़फ़ा न होना मुझसे तुम ऐ हमसुख़न मेरे
इस क़लम से जो मैं जंग-ओ-जदल का नाम न लूं
ये ख़ता मुझसे जो हो जाये दरगुज़़र करना
जि़क्र बस ज़ीस्त क करूं, अजल का नाम न लूं

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बहारें थम गई - शिशिर "मधुकर"

बहारें थम गई फिर से लो मौसम मलिन आया
कलह से क्या मिला तुमको ना मैंने कुछ पाया
जिंदगी चल रही थी जो सब को साथ में लेकर
बिना समझे ही बस तुमने उसको मार दी ठोकर
बड़ी मुश्किल से कोई इस जहाँ में पास आता है
जिससे मिल बैठ के गम छोड़ इंसा मुस्कराता है
मगर तुमको मेरी कोई ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
मेरी रुसवाई करने में तुम बिलकुल नहीं थकती
तुम्हारे वार सह सह कर मैं अब तक भी जिन्दा हूँ
कटे पर से जो ना उड़ पाए अब बस वो परिंदा हूँ
मेरे जीवन में जैसे सब ने मिलकर जहर बोया है
मेरा हर रोम रोम छलनी हो बिन आंसू के रोया है.

शिशिर “मधुकर”

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क्यूँ है ?

सुबह उगना ही है तो शाम को ढलता क्यूँ है,
किस से चाहत है बता सूर्य तू जलता क्यूँ है,

क्या है ख्वाहिश तेरी क्या दूर बहुत मंजिल है,
रोज तू इतनी सुबह घर से निकलता क्यूँ है,

दिल तू कब समझेगा वो हो नहीं सकता तेरा,
तू उसकी चाह में पल-पल यूँ पिघलता क्यूँ है,

सच से वाकिफ हूँ मैं कोई और उसकी चाहत है,
स्वप्न झूठे तू दिखा मुझको यूँ छलता क्यूँ है,

प्यार और दोस्त तो इंसान हैं मौसम तो नहीं,
आये दिन फिर यहाँ इंसान बदलता क्यूँ है,

रिश्ते-जज्बात वफ़ा-प्यार क्या सस्ते हैं बहुत,
पैसे पे लोगों का ईमान फिसलता क्यूँ है,

जो भी बेईमान है, झूठा है, भ्रस्ट लोभी है,
फूल प्रगति का उनके घर पे ही खिलता क्यूँ है,

सब तो मशरूफ हैं जीवन की आपा-धापी में,
‘ओम’ बस एक तू रह-रह के मचलता क्यूँ है,

झूठ-अन्याय के अंधियारे में खुश हैं सारे,
सच की सम्मा तू जला राह पे चलता क्यूँ है !!!

“साथी ”

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