मंगलवार, 17 नवंबर 2015

समझ नही आता ........( ग़ज़ल )

समझ नही आता ……..( ग़ज़ल )

उन्हें जिगरी यार कहें या संगदिल समझ नही आता !
दूर दूर रहके अपनापन जताना समझ नही आता !!

उनकी बहकी – बहकी अदाओ से हम उलझन में है !
उनका नजरे मिलाकर नजरे चुराना समझ नही आता !!

कभी – कभी लगता है, यक़ीनन हम ही है हमदम यार के !
कभी बेगानो सा करना सलूक उनका समझ नही आता !!

वो अक्सर करते है शिकायत गुफ्तगू में गैर तबज्जगी की !
मगर बात करने पर नजरअंदाज करना समझ नही आता !!

दुनिया में कम हो हमारी शान अौ शौकत उन्हें मंजूर नही !
मगर उन से एक कदम भी आगे जाना कतई नही भाता !!

वैसे तो अक्सर रहते है उनकी आँखों में ख्वाब हमारे !
जाने क्यों छुपाते है वो ये राज हमसे समझ नही आता !!

दिल की बाते जुबान पर लाने से कतराना उनका !
इसे बेबसी कहे या कुछ और समझ नही आता !!

पहले खुशामदी से उनका घर दावत पे बुलाना!
हाजिर होने पर फिर बेरुखी जताना समझ नही आता !!

लाख कोशिशो के बाबजूद समझ न सका “धर्म” उनको !
जाने किस मिटटी की है शख्सियत वो समझ नही आता !!

——::०:: डी. के. निवातियाँ ::०::——

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