पिरामिड।माँ।
तो
देखे
जलती
सूखे मुँह
धूमिलताएँ
प्रत्येक महीना
गरीब का पसीना
माँ
है वो
धरती
बिलखती
फूलों सी हँसी
आह री बेबसी
पलक झपकती
से
लेती
दुर्दिन
माताएँ भी
धूप की छाया
ममता ऊपर
खेतोँ के ढेलों पर
न
होती
आशाएं
आँशू कैसा
दुःखों के पार
रखती धीरज
निकलेगा सूरज
—-राम केश मिश्र
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