शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

“ प्रकर्ति की चीख “

ज़िन्दगी क्या है सोचता हूँ मैं ?
देख इन्सान को घबरा जाता हूँ मैं !
नदियों का पानी हो या पहाड़ो की चट्टानें,
हर जगह छाई है खुली उदासी
बचे हैं काले घने जंगल,
दौड़ते वहां मैं एक पल खोजता हूँ ,
ज़िन्दगी को रोते देख अब इन्सान को कोसता हूँ !
ज़िन्दगी क्या है सोचता हूँ मैं ?
देख इन्सान को घबरा जाता हूँ मैं !
कि अब तो चेत जा ओ मनुष्य ! धरती का सीना फट रहा है
आसमान भी फफक-फफक कर रो रहा है
समंदर भी अब उफान पर है न कह कि अब मनुष्य है श्रेष्ठ यहाँ !!
कदमों तले उसके ये सारा जहान है
प्रकृति से तू है उत्पन्न बचा तेरा क्या अब बखान है !!!!
वक़्त है शेष अभी मजबूत कर अपना मन कर ले इसका नमन
लिख नया अध्याय इस युग का कर के ये उदारता
मनुष्य है तू ! मनुष्यों!! को क्यूँ नहीं पुकारता ??
छोड़ हिंसक कृत्य धन की होड़ मन को सुधार ले |
इन्सान है तू पहले !!! प्रकृति प्रेम भी तो पाल ले
ये उपदेश दे मैं अपनी कलम रोकता हूँ
मजबूर हो साथ उनके मैं दो कदम चलता हूँ ||
ज़िन्दगी क्या है सोचता हूँ मैं ?
देख इन्सान को घबरा जाता हूँ मैं !!!!!

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here " प्रकर्ति की चीख "

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें