बचपन में पढ़ा करते थे,
पानी भाप बन जाता है,
और भाप फिर से पानी में परिवर्तित,
इसे ऐवपोरशन कहतें हैं,
बचपन में पढा करते थे,
हमारे पुर्वज बंदर थे,
उन्होने प्रगति की,
और वोह आदमी बन गये,
इसे ईवोलूशन कहते हैं ,
इस सारी ईवोलूशन की क्रिया में ,
एक क्रिया बाकी हैँ,
वोह है वापस बंदर बनने की प्रक्रिया।
आजकल के मानव में बंदर बनने के,
लक्छण साफ़ नजर आतें हैं ,
नकल करना तो बहुत पहले ही सीख चूका था ,
उछलने कूदने में भी बंदरो को मात देता हैं ,
और कोई मसौदा न मिले न सही ,
धर्म जाति और अलगाववाद के नाम पर ,
बहुत कुछ उछल कूद लेता हैँ।
आदमी जिस पेड़ पर बैठा है,
उसकी जड़ें हिलाता है,
बंदर तो सिर्फ शाख हिालतेें हैं,
जरा सोच कर देखिये,
हम खुद को बंदर से,
कहीं नीचे पातेें हैँ,
बन्दर तो सिर्फ शाख हिलातें हैं।
आजकल न जाने मुझे क्यों,
मुझे ऐसा लगता है,
कि इक्कीसवीं सदी के जाने तलक,
आदमी बंदर हो जायेंगे,
सभ्य होने के मुखौटे लगे हैं,
वोह सब के सब उतर जायेंगे,
आदमी बंदर हो जाएंगे,
और शायद मानव रोबोट मे परिवर्तित।
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