मेरे मन में ,
मेरी भावनायें
ऐसे रेह्तीें हैं ,
जैसे किसी अजनबी के घर में हों ,
औरो की तो छोङो ,
मुझसे भी रहती हैं कुछ डरी डरी सी ,
और आधी रात जब सब सोतें हैं ,
मुझे भी, सोया समझ उठती हैं ,
मेरी भावनायें।
तब मैं उन्हें देखती हूँ ,
कभी हसतें हुए ,
कभी रोते हुए ,
और कभी कल्पनाओं के पंख लगा कर उड़ते हुए ,
चाहा बहुत ,
शब्दों में कैद कर लून ,
मगर डरती हूँ ,
कि लुप्त ना हो जाएं ,
मेरी भावनायें।
और में रह जाऊं ,
एक भावना विहीन सी।
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