मंगलवार, 10 नवंबर 2015

आओ दीप जलाये !

आओ दीप जलाये !

शिक्षा में अग्रणी सदैव
अन्धकार से ग्रस्त अभी
धनधान्य से परिपूर्ण हम
चित्त अशांति से त्रस्त सभी
कर्महीन का तमगा पहने
रहते यंहा पर व्यस्त सभी
कभी मिलकर संग बैठे
हुए एक दूजे से रुष्ट कभी
एक डाल के थे हम पंछी
फिर क्यों हम लड़ते अभी
बहुत हुआ ये खेल पुराना
बेबात आपस में लड़ाना
जात धर्म की बात ना होगी
दिलो में अब खटास न होगी
तोड़कर अब ये सारे बंधन
हम नफरत की दीवार गिराये !
आओ दीप जलाये !!

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