मेरी कलम मेरी बेखुदी का सबब जानती है शायद तभी तो मेरी ऊंगलियों से लिपट कर चलती है कभी थकती ही नहीं है कभी कभी मैं भी इसका दिल बहला दिया करता हूं उठा के कागज से कुछ देर के लिये अपनी ऊंगलियों पे नचा लिया करता हूं R.K.V.(MUSAFIR) *****
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