रविवार, 15 नवंबर 2015

आग्रह

(आग्रह )
देश को मॉ समझता है अगर
तो मॉ की इज्ज़त कर यार
सहिष्णुता धर्मनिर्पेक्षता की आड में
मॉ के कपडे तो न फाड
चिंगारी बुझ सकती है थोडे से पानी से
आग बना कर माहौल न बिगाड
RKV(MUSAFIR)
*****

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here आग्रह

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें