रविवार, 15 नवंबर 2015

मन मधुमक्खी

मन मधुमक्खी मन मधुमक्खी
चंचल चपल नख्ररे वाली, छैल छ्बीली मन मौजी
अती प्यारी प्रेमिका मेरे, बेचारे तन छ्त्ते की
मन मधुमक्खी मन मधुमक्खी……….
कोमल से पंखों में इसके, बिजली जैसी फुर्ती है
पल में नापे अर्श फलक सब, अल्ल्हड मस्ती में रह्ती है
अंजानी दुनियॉ दिखलाये, ये ऐसी जादूगरनी है
मन मधुमक्खी मन मधुमक्खी……….
इस मायावी दुनियॉ के, मायावी बाग बगीचों से
रस लाती शहद बनाती, मायावी तौर तरीकों से
मायाजाल बिछानें वाली खुद नहीं पडती पचडें में
धर्म अर्थ और काम मोक्ष के घुंघरू बांधे पांवों में
छम छम करती उछ्ले कूदे मेरे घर के आंगन में
तन छत्ता विचलित हो जाता, इतना शोर ये करती है
मन मधुमक्खी मन मधुमक्खी……….
रस भरी मेरी प्यारी तन छ्त्ते को जब भरती है
दीवाना कर देती है मस्ताना कर देती है
फिर नहीं पड्ते पॉव जंमी पर ,सुद बुद सब हर लेती है
मन मधुमक्खी मन मधुमक्खी……….
श्रीमती बुधि देवी भी असमंजस में रह्तीं हैं
शह्द में डुबे कर्मों की चौकीदारी करती रह्तीं हैं
विध्या मॉ और ज्ञान बाप की याद दिलाती रह्तीं हैं
एक दिखाती सब्ज बाग, एक कान ऐंठ्ती रह्ती है
इन दोनों के चक्कर में भइया हालत पतली रह्ती है
मन मधुमक्खी मन मधुमक्खी………
R.K.V.(MUSAFIR)
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