शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

गीत-माटी का यह दीप सनातन -शकुंतला तरार

”माटी का यह दीप सनातन”
माटी का यह दीप सनातन, आलोकित आँगन-आँगन
दीपों की पातों से सज्जित, घर-घर प्रकाश का हो अभिनन्दन||

1- ऊँच-नीच की दीवारें और, भेदभाव के तिमिर हटायें
कलुषित ना हो मानव जीवन, जन-गन-मन संकल्प सजाएँ
आडम्बर का हटा आवरण, सत्य की ज्योत जलाएँ हम
ऋषियों की इस पुण्य धरा में, नेह का चाक चलाएँ हम
माटी के नन्हे दीपक को, माटी की इस देह का वंदन ||
दीपों की पातों से सज्जित, घर-घर प्रकाश का हो अभिनन्दन||

2-अक्षय है वह दीप जो लड़ता, कुंठा और संत्रासों से
मन का अँधेरा दूर भगाता, आशाओं विश्वासों से
ले प्रकाश नूतन-नूतन यह, पर्व ज्योति का आया है
या फिर गगन से चाँद तारों, ने संदेशा भिजवाया है
झरनों सी झरझर लड़ियाँ, और फुलझड़ियों का हो गुंजन ||
दीपों की पातों से सज्जित, घर-घर प्रकाश का हो अभिनन्दन||

3-दीप जलाएं खुशियों के हम, विश्वासों की बाती हो
स्नेह प्रेम का तेल भरें, और अल्पना की थाती हो
जहां रामचंद्र की पगधूलि से, आलोकित हो गई अयोध्या
कान्हा की बंसी की धुन में, झूम उठीं ब्रज की सब गईय्या
तिलक लगाएं उस भूमि का, जहाँ चले थे रघुनंदन ||
तिलक लगाएं उस माटी का, जहाँ चले थे यदुनंदन ||
दीपों की पातों से सज्जित, घर-घर प्रकाश का हो अभिनन्दन||

शकुंतला तरार

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