शनिवार, 14 नवंबर 2015

कैसी मुहब्बत थी हमें तुमसे
कत्ल हुए एक’उफ’ना की
तुम्हारे हर बे-नेयाज़ी पर
सज़्द-ए-शुकर् बजा लाये
एक तस्कीन था दिल में
तुम पास हो क्या कम है
हाथ बढ़ा कर छू लूंगा
सांसों में तुम्हारी खुशबू बसा लूंगा
मचलते मौजों की तरह
जज़्बात थे उमड़ने को
खामोश कर दिया जिन्हें
बेरुखी के तुम्हारी तीरो ने
इतने क़रीब हो कर भी
क़ुरबत ना पा सके तुम्हारी
बरसते बादलों के नीचे
इक बूंद को तरस गये हम
बदलते मौसमों को देखा
पत्थरों को भी पिघलते देखा
मुहब्बत का एक हल्का रंग भी
रुखसारों पर तुम्हारी देखने की
ख्वाहिश ही रह गयी हमारी

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