बुधवार, 4 नवंबर 2015

गरीब बेरोजगार

गरीब बेरोजगार

मेरे घर में तीन आंखें संचित पूंजी
तीनों निस्तेज, भावना रहित लुटा देता है
आषा बदली निराषा में फिर बेरोजगारी ओर रिष्वत
तीनों चुपचाप तोड़ देती है कमर उसकी
टकटकी लगाए इंतजार में हैं
शायद किसी के
मां की आंखें
छितरी, मिट्टी की भांति
छितर-छितर रह जाती हैं -ः0ः-
हल्की-सी हवा भी
आंधी-सी नजर आती है
शैलाब फुट पड़ता है
बहने लगती है
अरमानों की नदी
रोक कर भी
नही रोक पाती
इनमें ऐसी बाढ़ है आती
यह देख फिर
पिता की आंखें
बालू के अरबों कण बन
लगते हैं इधर-उधर भटकने
ऐसे में रास्ता भूल
होने लगती है वर्षा
हृदय भी जाता है भर
कुंभला जाता है कंठ
बोले ! तो बोला नही जाता
आंखों से बहने वाली नदी
आती है तीसरी आंख में
ये सभी तो हो रहा है
उस गरीब की आंखों में
जो अनेक अरमान संजोकर
बढ़ता है, पढ़ाता है।
गरीब ! अपनी संतान पर
फिर जीवन भर की

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मंगलवार, 3 नवंबर 2015

सभी फर्जी साहित्यकारों के लिए… विशेष कविता!!! - www.sanatansewa.blogspot.in

"दिल्ली दानव सी लगती है, जन्नत लगे कराची है,
जिनकी कलम तवायफ़ बनकर दरबारों में नाची है…!!!
.
डेढ़ साल में जिनको लगने लगा देश दंगाई है,
पहली बार देश के अंदर नफरत सी दिखलायी है…!!!
.
पहली बार दिखी हैं लाशें पहली बार बवाल हुए,
पहली बार मरा है मोमिन पहली बार सवाल हुए…!!!
.
नेहरू से नरसिम्हा तक भारत में शांति अनूठी थी,
पहली बार खुली हैं आँखे, अब तक शायद फूटी थीं…!!!
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एक नयनतारा है जिसके नैना आज उदास हुए,
जिसके मामा लाल जवाहर, जिसके रुतबे ख़ास हुए…!!!
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पच्चासी में पुरस्कार मिलते ही अम्बर में झूल गयी,
रकम दबा सरकारी, चौरासी के दंगे भूल गयी…!!!
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भुल्लर बड़े भुलक्कड़ निकले, व्यस्त रहे रंगरलियों में,
मरते पंडित नज़र न आये काश्मीर की गलियों में…!!!
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अब अशोक जी शोक करे हैं, बिसहाडा के पंगो पर,
आँखे इनकी नही खुली थी भागलपुर के दंगो पर…!!!
.
आज दादरी की घटना पर सब के सब ही रोये हैं,
जली गोधरा ट्रेन मगर तब चादर ताने सोये हैं…!!!
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छाती सारे पीट रहे हैं अखलाकों की चोटों पर,
कायर बनकर मौन रहे जो दाऊद के विस्फोटों पर…!!!
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ना तो कवि, ना कथाकार, ना कोई शायर लगते हैं,
मुझको ये आनंद भवन के नौकर चाकर लगते हैं…!!!
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दिनकर, प्रेमचंद, भूषण की जो चरणों की धूल नहीं,
इनको कह दूं कलमकार, कर सकता ऐसी भूल नहीं…!!!
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चाटुकार, मौका परस्त हैं, कलम गहे खलनायक हैं,
सरस्वती के पुत्र नही हैं, साहित्यिक नालायक हैं…!!!"

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बेटी के जन्मदिन पर .................(कविता)

साथियो !
आज ३ नवम्बर को मेरी प्यारी बेटी हैप्पी (ख़ुशी ) का जन्मदिन है, उसके लिए छलकते प्यार को शब्दों में पिरोना चाहता हूँ !
और उसे आप सब के प्यार आशीर्वाद और दुआओ की भी जरुरत है, आखिर इतना तो हक़ उसका भी बनता है आप सभी पर !!

जब से तू आई है बिटिया
मेरे जीवन में बहार छाई है
सिर्फ बिटिया नही है तू
मेरे जीवन की परछाई है !!

आज के दिन जो मुझे मिला
वो खूबसूरत नजराना हो तुम
मुझे जिंदगी जीने का मिला
एक अर्थपूर्ण बहाना हो तुम !!

मेरे चेहरे पर जो खिले
वो प्यारी मुस्काना हो तुम
तेरे चेहरे को देख खिले
मेरे जीवन की वो बगिया हो तुम !!

तुझ से मिली मुझे प्रेरणा
जब हर पल तुम मुस्काती हो
मिलती मुझको नई ऊर्जा
जब खिल-खिलाकर मुझसे मिलती हो !!

फलो -फूलो तुम अमरबेल सी बढ़ती जाओ
धन-धान्य से परिपूर्ण हो ये जीवन तुम्हारा !!
चलो सदैव नेक राह पर लक्ष्य में बढ़ती जाओ
दिल से निकले यही दुआ बस, तुम हर जन्म मेरी बिटिया बन आओ !!
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डी. के निवातियाँ_______@@@

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दिवाली की नई रस्म ............(दिवाली पर कविता)

आओ दिवाली की नई रस्म अदा फरमाये
जलाकर एक चिराग मोहब्बत का हम
किसी गरीब घर में भी खुशिया फैलाये
कुछ इस तरह दीप पर्व की शोभा बढाए !!

बहुत छुड़ाए हमने बम पटाखे
बहुत रूपये हमने यूँ ही जलाये
करके दीप-दान इस बार ख़ुशी से,
किसी के अँधेरे घर रौशनी फैलाये !!

बहुत बाँटे महंगे तोहफे, मिठाई
इस बार मिटटी के दीपक बाँटे जाये
हर घर हो लक्ष्मी का आवागमन
गरीब मजदूरो को भी लाभ पहुंचाये !!

इस दिन करे बिजली का त्याग
घरो में घी, तेल के दीपक जलाये
चारो और बिखरेगी छटा निराली
और वातावरण संग ऊर्जा भी बचाये !!

छोड़ो कल परसो की बाते पुरानी
आज कुछ नया कर के दिखलाये
बंद करे ये महँगी आतिश बाजियां
क्यों न पर्यावरण को हम बचाये !!

घर-घर महकेगा भीनी सुगनध से
अगर हम घी-तेल के दीपक जलाये
लौट आयंगे दिन फिर राम राज्य के
अगर पूर्वजो के पदचिन्हो पर हम चल जाये !!

तोड़कर सब नफ़रत की दीवारे
आपस में प्रेम का अलख जगाये
दिलो में रहे न कोई द्वेष भाव
ख़ुशी ख़ुशी सबको गले लगाये !!

हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई
क्यों न सब एक संग मिल जाये
रोज मनेगी ईद, दिवाली, किसमिस
धर्म के ठेकेदारो को सबक मिल जाये !!

किसी घर में ना अब रहे अँधेरा
सूने घर में भी एक दीपक जलाये
नहीं करेंगे हम अब ध्वनि प्रदुषण
सब मिलकर आज ये प्रण उठाये !!

आओ दिवाली की नई रस्म अदा फरमाये
जलाकर एक चिराग मोहब्बत का हम
किसी गरीब घर में भी खुशिया फैलाये
कुछ इस तरह दीप पर्व की शोभा बढाए !!

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[———डी. के. निवातियाँ ———]

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यहा खुद की नही चलती .ग़ज़ल ।

ग़ज़ल.यहा खुद की नही चलती ।

करोगे क्या शिकायत कर तुम्हारी है नही गलती ।।
ग़मो का नाम दुनिया है यहा खुद की नही चलती ।

जो तेरे दोस्त सारे थे जिन्हें तुम छोड़ आये हो ।
मिलें उनको मनाना तुम उमर फिर से नही मिलती ।

किसी की आँख का आँशू कभी बनकर न बहना तुम ।
जरा सा प्यार देने से ख़ुशी तेरी नही मरती ।।

न जाने कौन सी फिसरत मची है आज़माने की ।
इल्म दिल पर नही होता आह उनकी नही भरती ।।

करो तुम फक्र सुन लेकिन बचे दो चार दिन ही है ।
वक्त फिर से न आयेगा उम्र भी तो नही बढ़ती ।।

कही मुरझा न जाये दिल तुम्हारे खौफ़ से साथी ।
बहारें रोज न आती कली दिल की नही खिलती ।।

यकीनन तुम भी पाये हो धोख़ा प्यार में रकमिश”
मग़र दिलफेक दुनिया में ख़ुशी सबको नही मिलती ।।

—R.K.MISHRA

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वो कहती हैं

वो कहती हैं कितनी बार याद करते हो हमें एक दिन मैं
पगली को कैसे बताएं दिल धड़कता है कितनी बार पूरे दिन मैं

वो कहती हैं कितना प्यार करते हो तुम मुझसे
मैंने कहा जितना प्यार करती है हर धड़कन दिल से

वो कहती हैं कब तक प्यार करोगे यूहीं तुम मुझसे
मैंने कहा जब तक रहेगी धड़कन इस दिल मैं

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खता...

खता…

"हद से ज्यादा कभी किसी से प्यार नहीं करना,
कर भी लिए तो देर से इज़हार नहीं करना,
सही-गलत के फेर में हाथ से अच्छी चीज निकल जाती,
इसीलिए कभी वक़्त का इंतज़ार नहीं करना।"
– सुहानता 'शिकन'

खता मेरी मुझे ठीक से करना प्यार नहीं आता,
और तेरी कि करना तुझे इज़हार नहीं आता,
नदी के हम दो ओर खड़े हैं दो अधूरे किनारों सा,
सजा है ये कि करना ये कई बार नहीं आता।

क्या खूब है कि बाँहों में हम एक दूजे की खेल रहे,
उफ ! ये आँख का सपना कभी साकार नहीं आता।1।

गुलशन हैं ये फ़िजा, नज़ारे रँगीनियों की तह तलक,
कमी है कि इस वादी में कभी बहार नहीं आता।2।

गुज़र गए हैं महीनों रक्खे फूल तेरी किताबों में,
कैसे तेरी नज़र को वो दीदार नहीं आता।3।

कल ही की तो बात है मैंने दिल से आवाज़ लगाया था,
शायद तुझे सुनाई मेरी पुकार नहीं आता।4।

जज़्बा है, मुझमें जिद़ है, इरादे चाँद चुराने की,
जाने क्यूँ पर लब़ों में ये आकार नहीं आता।5।

सोचता हूँ कि तुझे मिटा दूँ याद के हर एक पन्ने से,
मगर ये तनहा दिल को कहीं करार नहीं आता।6।

गुँज रही है माथे में तू 'शिकन ' के जैसे सवार हो,
शुकर है कि अभी सर पे मेरे खुमार नहीं आता।7।

– सुहानता 'शिकन'

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सोमवार, 2 नवंबर 2015

मौसम सर्दी का.........

घर बन जाते बच्चो की जेल
मुँह से चलती भाप की रेल
सर्दी से बदन जब लगे ठिठुरने
मानो आया मौसम सर्दी का !!

बाजारों में हो त्योहारो की रौनक
हाठ और मेलो की होती भरमार
बच्चे बनते है जब सेंटा-क्लाज़
मानो आया मौसम सर्दी का !!

पालक, मेथी, सरसो का साग
हरी सब्जियों की लगती कतार
आलू जब नया नया आता हो
मानो आया मौसम सर्दी का !!

गोभी, मूली के परांठे बनते
चाय संग जब पकौड़े चलते
खाने पीने में आता हो स्वाद
मानो आया मौसम सर्दी का !!

आँगन में जब अलाव जलती हो
रजाई में बैठ गपशप चलती हो
जब शाम जल्दी से ढलती हो
मानो आया मौसम सर्दी का !!

सन्डे की छुट्टी का जलवा हो
घर बनता गाजर का हलवा हो
जब सिकुड़ते सबके हाथ हो
मानो आया मौसम सर्दी का !!

गज्जक रेवड़ी से प्यार हो
मूंगफली पे आई बहार हो
चाय काफी की सरकार हो
मानो आया मौसम सर्दी का !!
!
!
!
——:: डी. के. निवातियाँ ::——

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हम भी गम के मारे हैं

कही तो हैं मंजिल,
कही तो हैं काँरवा,
चलना हैं अहिस्ते,
हम भी गम के मारे हैं…..
दुख तो है साथी,
सुख हैं मेरी मंजिल,
डगर हैं टेड़ी-मेड़ी,
खुद मौत के किनारे हैं,
हम भी गम के मारे हैं…..
झुठी हैं मुस्कूराहटे,
झुटी हैं शान,
गम की दरिया में,
आँसुओं के धारे हैं,
हम भी गम के मारे हैं …..
छोटी सी नैन हमारी,
सपने हज़ारे हैं,
गम के आँसुओं में,
सितारे हज़ारे हैं,
सपनों के आसमा में,
आँसुओं के सहारे हैं,
हम भी गम के मारे हैं…!

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नाकाम कोशिश …… स्वाति नैथानी

सुबह से ये वादा किया
शाम को अपनी ज़ुबान दी
उनसे हर नज़दीकी मिटा देंगे
फासलों को आगोश में ले लेंगे
यादों में भी याद न करेंगे
एहसास लफ्ज़ से नफरत करेंगे
भूले से भी कभी आवाज़ न देंगे

लेकिन ……

तेरी गूंजती हसीं ने सुबह को बहका दिया
लफ़्ज़ों की शरारत ने शाम को बहला लिया
ज़ेहन में दफन बेताबी ने मंज़र पिघला दिया
तेरे इश्क़ की कशिश ने फासलों को रुला दिया
बेकरार निग़ाहों ने यादों को गले लगा लिया
तेरी दीवानगी ने हर एहसास जगा दिया
जादू भरी बातों ने हर बोल खिला दिया

भूले से भी कभी भूल नहीं पाऊँगी तुझे
मेरी किस्मत को तूने ये सीखा दिया

—- स्वाति नैथानी

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उससे पह्चान कर ली मैंने…… स्वाति नैथानी

उसकी हसीं में लिपटा दर्द छू लिया मैंने
दिल में सुलगती चिंगारी से जल गई

रूह की सिसकती दास्ताँ सुन ली मैंने
उसकी ख्वाहिशों के समंदर में घुल गई

लफ़्ज़ों में सिमटी चुभन पढ़ ली मैंने
उसकी सूने आँखों में मेरी नींदें पिघल गई

हाँ …. उससे पहचान कर ली मैंने ।

—- स्वाति नैथानी

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सूक्ष्म गीता (विषाद योग) गिरिजा

हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखेति ! जहां तुम दिशा दो वहीं है विजयश्री !
रणभूमि में खडे़ सगे सब, एक ओर सेना ले कौरव, एक ओर सेना ले पाण्डव।
मध्य रथ को हाँक चले तब, अर्जुन को लेकर श्री केशव।
अर्जुन का हुआ अंग शिथिल, मुख सूखा, गाँडीव द्दूटा, हृदय हुआ व्यथित।
क्या राज्य ? क्या विजय ? क्या धन का सुख ? इनकी मृत्यु से उपजेगा पाप दुख।
यही असमंजस अर्जुन को घेरे, यही व्यथा अर्जुन की भेदी!
हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखेति ! जहां तुम दिशा दो वहीं है विजयश्री !

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==* सुन ऐ नारी *==

तकलीफे तो आती जाती
लढती रहे दिन राती
करे लाख जुलम ये दुनिया
फिरती लाज बचाती

इंसानी जंगलके भेड़िये
तुझको नोच खायेंगे
हर कदम रोक राहोमें
तुझको युही सतायेंगे

गर रुक गई तो फस जायेगी
लिखी तक़दीर ये मानले
क्या करना है या डरना है
डरसे अच्छा मरके देखले

आयेगा ना कोई मदतको
ना होगा कोई साथमें
करले निश्चय सोच समझके
जितनी ताकत तेरे हातमें

नारी बन तू पापही कर गई
तुझको ना कोई आधार
पढे लिखे शरीफभी आयेंगे
गर भर जाये तेरा बाजार

बन झांसी तू चल अकड़के
चाहे आधी रात हो
भूल न जाना अपनी ताकत
चाहे सामने शैतान हो
——–××××———-
शशीकांत शांडीले(SD), नागपूर
Mo.9975995450
दि.01/11/2015
Sun Ai Nari

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हम बदले नहीं...

हम बदले नहीं…
"क्या हुआ मुझे, समझ नहीं आता,
कुछ रंग ज़िन्दगी में घुलने लगा है,
सपनों में भी जो एहसास नहीं हो सका,
ऐसी ही राहों में दिल मुड़ने लगा है,
ये कौन अजनबी है जो आज मेरी आँखों से,
बेवक़्त आकर लूका छिपी करता है,
शायद़ ये वही है जिसकी चाह थी मुझे,
इसलिए उस ओर पाँव चलने लगा है।"
– सुहानता 'शिकन '

आज भी लोगों से मिलता हूँ वो कहते हम बदले नहीं,
आईने में खुद को देखा तो हम पहचान सके नहीं।

अभी-भी गुजरता उन्हीं राहों से,
पहले मैं जिनसे गुजरता था,
थमे हुए थे रस्ते सारे,
परछाई साथ में चलता था,
लेकिन रस्ते चलते लगे अब, परछाई लगे चले नहीं,
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।1।

आज भी मैं पूरी जिन्दादिली में,
बात सभी से करता हूँ,
अल्फ़ाजों के फूलझड़ियों से,
खूब लतीफें कसता हूँ,
पर क्यूँ ये अब महसूस करूँ कुछ लफ़्ज लब़ों से निकले नहीं.
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।2।

कल तो ये पलकें परिन्दों जैसी,
उड़-उड़ जाया करती थीं,
पल में यहाँ तो पल में वहाँ है,
एक जगह नहीं रूकती थी,
लेकिन आज क्यूँ इसी नज़र को उनके सिवा कोई जचे नहीं,
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।3।
– सुहानता 'शिकन '

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हम बदले नहीं...

हम बदले नहीं…

"क्या हुआ मुझे, समझ नहीं आता,
कुछ रंग ज़िन्दगी में घुलने लगा है,
सपनों में भी जो एहसास नहीं हो सका,
ऐसी ही राहों में दिल मुड़ने लगा है,
ये कौन अजनबी है जो आज मेरी आँखों से,
बेवक़्त आकर लूका छिपी करता है,
शायद़ ये वही है जिसकी चाह थी मुझे,
इसलिए उस ओर पाँव चलने लगा है।"
– सुहानता 'शिकन '

आज भी लोगों से मिलता हूँ वो कहते हम बदले नहीं,
आईने में खुद को देखा तो हम पहचान सके नहीं।

अभी-भी गुजरता उन्हीं राहों से,
पहले मैं जिनसे गुजरता था,
थमे हुए थे रस्ते सारे,
परछाई साथ में चलता था,
लेकिन रस्ते चलते लगे अब, परछाई लगे चले नहीं,
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।1।

आज भी मैं पूरी जिन्दादिली में,
बात सभी से करता हूँ,
अल्फ़ाजों के फूलझड़ियों से,
खूब लतीफें कसता हूँ,
पर क्यूँ ये अब महसूस करूँ कुछ लफ़्ज लब़ों से निकले नहीं.
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।2।

कल तो ये पलकें परिन्दों जैसी,
उड़-उड़ जाया करती थीं,
पल में यहाँ तो पल में वहाँ है,
एक जगह नहीं रूकती थी,
लेकिन आज क्यूँ इसी नज़र को उनके सिवा कोई जचे नहीं,
आईने में….. आज भी लोगों….. आईने में…..।3।
– सुहानता 'शिकन'

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रविवार, 1 नवंबर 2015

मनचले की ज़िँदगी

जि

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रावण मरता क्यों नहीं?

बार-बार जलाने के बाद भी
रावण साल दर साल
विशालकाय और विकराल रूप धारण
करता रहा

ना रावण को जलानेवाला हारे
ना ही रावण हारा
सिलसिला सदियों तक चलता रहा

रावण को जलानेवाले खुश है की
अपने से सौ गुना विशालकाय
रावण को हर बार जला ही देते है
रावण उनसे ज्यदा खुश है
जाने कब से जला रहे है फिर भी मुझे मार नहीं पाते?

कुछ बुधजिवी को गहरे रहस्य के बारे में पता था
रावण हर साल जालकर भी क्यों मरता नहीं
वो जानते है, रावण का हर साल जलना
जरुरी क्यों है?
कई परिवारों का चूल्हा जलता है
एक रावण के जलने से

रावण भी जनता इस सत्य को
उसे जलानेवाला वाले उसे क्यूँ नहीं मार सकते?
लालच,क्रोध,इर्षा,चाहत दुःख और वासना
जैसे रावण को कभी मारा ही नहीं सके
इसलिए उन्हें आभासी रावण को जलाना पड़ता है
और यही सत्य रावण की अमरता का रहस्य है

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दीवारेँ

निरंतर उठती
बनती, बढती दीवारेँ
देती हैँ सुरक्षा
प्राकृतिक-अप्राकृतिक विपत्ति से
तब अच्छी लगती हैँ दीवारेँ।

धीरे-धीरे ह्रदय मेँ पनपती
ईर्ष्या, द्वेष की दीवारेँ
बाँटती मानवता को
धर्म, जाति और राजनीति की दीवारेँ
यूँ पलती-बढती
अच्छी नहीँ लगती दीवारेँ।

टूटती, फूटती, गिरती
कच्ची-पक्की दीवारेँ।
पर मुश्किल हो जाती है
गिरानी दिलोँ की दीवारेँ।।
-अभिनव प्रयास(अक्टु.-दिस.-2012)अलीगढ, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित।

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तेज़ाब उभर आता है । ग़ज़ल।।

तेजाब उभर आता है ।ग़ज़ल

मैं तो खामोश हूँ पर जबाब उभर आता है ।।
बीते लम्हों का इक ख्वाब उभर आता है ।।

अब जा, चली जा तू मेरी नजर से दूर कही ।।
तुझे देखूं तो दर्द का शैलाब उभर आता है ।।

बात तो बिल्कुल मत कर तू अपनी बेगुनाही की ।।
गुनेहगार मैं भी नही बेताब उभर आता है ।।

अब दहकते है शोले खुद व् खुद तन्हाइयो में ।
तू मिले तो आँखों में आफ़ताब उभर आता है ।।

माना कि तेरी यादो में जन्नत की झलक मिलती है ।
ख़ुशनुमा चेहरा वो गुलाब उभर आता है ।।

जो भी मिला सुकून बनकर तोड़ ही गया दिल ।
अब हर कोई बेवफा ज़नाब उभत आता है ।।

जा चली जा रकमिश” हर हाल भुला देगा तुझे ।।
पर भूलने की चाह से तेज़ाब उभर आता है ।

—R.K.MISHRA

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जिंदगी की किताब

मंजिल से प्यार मत कर राही ।
रास्तो को चूमना सीख़ ।
क्षण भर की होती है मंजिल मिलने की ख़ुशी।
मैंने लोगों को पूरी जिंदगी रास्ते कोसते देखा है

जिंदगी मिली है तो सोच मत।
प्यार को सही गलत मैं तोल मत।
क्षण भर की होती है समझदारी ।
मैंने समझदार लोगों की आँखों मैं पानी देखा है

चार दिन की होती है ये जिन्दगी
हटा दे तू समाज की ये गन्दगी
क्षण भर की होती है बाहर समाज की वाहवाही
मैंने लोगों को चार दीवारी मैं घुटते देखा है

लेखन=गौरव परिहर

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