ग़ज़ल
चाँद बादल में जब समाता है
वो मुझे और याद आता है ||
निर्दयी हो गया मेरा प्रीतम
मुझको तन्हाई में रुलाता है ||
प्रेम है उसको मेरी ग़ज़लों से
मीठी धुन में वो गुनगुनाता है ||
मान सम्मान मेरा रखने को
शीश श्रद्धा से वो झुकाता है ||
शहर की ज़िन्दगी से तंग आकर
अपने वालों में लौट जाता है ||
इल्तिज़ा बस ‘शकुंत’ इतनी सी
आ भी जा क्यों मुझे सताता है ||
शकुंतला तरार
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