बेटियां
घर के चमन को खूब सजाती हैं बेटियां
दिल मे ख़ुशी के दीप जलाती हैं बेटियां ||
बेटी का जन्म होता है माँ बाप के लिए
खुद अपनी अस्मिता क्यूँ मिटाती हैं बेटियां ||
शोभायमान उनसे हैं दायित्व के दीये
कुल की परम्परा को निभाती हैं बेटियां ||
है उनकी मेहनतों का कोई मोल ही नहीं
दिन रात फिर तो पिटती ही जाती हैं बेटियां ||
कर्मों के आइनों में वो आदर्शवान हैं
क्यूँ अपनी ये पहचान गंवाती हैं बेटियां ||
वक़्त आने पे हमने यही देखा है ऐ ”शकुंत”
अश्कों से दिलकी आग बुझाती है बेटियाँ
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)
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