मंगलवार, 5 जनवरी 2016

*कवि की दुनिया*

कवि अपनी दुनिया में बहुत खुश रहता है,
वह हर चीज मे सार ढूँढ लेता है,
व्यर्थ मे भी एक भाव ढूँढ लेता है,
न ही किसी से द्वेष,
न ही जलन कि भावना
सिर्फ कवि अपनी कविताओ में मग्न रहता है,
कवि कविताओ को विचारो से सजा देता है,

और कुछ कर गुजरने की राह दिखा देता है,
अपनी कलम की ताकत से दुनिया को हिला देता है,
कम शब्दो मे गहराई की बात बता देता है,
वह गरीब,अमीर, भेदभाव को छोड कर इन्सानियत पर ध्यान देता है,
वह सभी की फिक्र व चिंता मे लगा रहता है,
वह अपनी छोटी से छोटी चीज कविताओ मे बया कर देता है!!…

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हमको लड़ना होगा ........

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

कब तक बहेगा रक्त वीरो का
खेल खून का अब थमना होगा
जागो यारो इस देश के प्यारो
सच्चाई को अब समझना होगा !

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

हिन्दू , मुस्लिम सिख, ईसाई
धर्म से आगे हमको बढ़ना होगा
भुलाकर जात-धर्म की नीति
इंसानियत के लिए लड़ना होगा !

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

आतंकवाद का कोई धर्म नही
इस बात को जहन में बिठाना होगा
दरिंदगी ये अभिशाप समाज की
इस बुराई को जड़ से मिटाना होगा !

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

राजनीतिको से अब जनता त्रस्त है
व्यवस्था भी सारी अस्त- व्यस्त है
भ्र्ष्टाचार का हुआ हर और बोल बाला
इस कूतंत्र से मिलकर अब लड़ना होगा !

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

बदल रहा है अब वक़्त धीरे – धीरे
नारी भी चलने लगी अब कन्धा देने
खेल, शिक्षा से लेकर हो सैनिक सेवाएं
हर क्षेत्र में उनका होसला बढ़ाना होगा !

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

बहुत हुआ अपमान वीरो का,
शेरो ने जान बहुत गवाई है
हर किसान, और हर जवान को
अब देश का भार उठाना होगा

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!

अब तो न हो कोई नारी अपमानित
अब न कोई गरीब का मजाक उड़ाये
चलो,उठो अब शिक्षा का अलख जगाओ
हर एक बुराई को समाज से मिटाना होगा !

बिगड़े हुए हालातो से डटकर हमको लड़ना होगा
समझ के वक़्त की चाल अब हमको चलना होगा !!
!
!
!
@@@___डी. के. निवातियाँ ____@@@

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बातें

बातें कुछ अनसुनी ,अनकही ,
रह गई मन की मन में ही।

बातें जो तुमसे करनी थी ,
बातें जो तुमको कहनी थी ,
तुम संग हँस कर सहनी थी।

तुम बिन भार बन गई है ,
बातों का अम्बार बन गई है,
मन का गुबार बन गई हैं।

बातें, आधी रात में उठ कर ,
मन में करती हैं गड़बड़ ,
मुझ को बड़ा सताती हैं।

बातें सारी रात जगाती हैं ,
कभी कभी वोह तो हसाती हैं,
कभी कभी युः ही रुलाती हैं।

इन बातों का क्या तो करूँ मैं ,
तुम बिन कैसे धीर धरु मैं,
क्यूँ सबको परेशान करूँ मैं।

बातें जो तुमसे करनी थी ,
बातें जो तुमको कहनी थी ,
किसी और से कैसे कह दूँ।

वैसे भी किसी ने कहा है ,
कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी,
लोग बेवजह ,उदासी का सबब पूंछेंगे,
किस किस को हल्कान करूँ मैं .

बातें कुछ अनसुनी ,अनकही ,
रह गई मन की मन में ही।

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क्यूँ  कहते हो कोई कमतर होता है - GAZAL SALIM RAZA REWA

Gazal
क्यूँ  कहते हो कोई कमतर होता है 
दुनिया  में  इन्सान बराबर होता है 

पाकीज़ा  जज़्बात  है  जिसके सीने में 
उसका  दिल  भरपूर मुनौअर होता है 

ज़ाहिद का क्या काम भला मैख़ाने में 
मैख़ाना तो  रिंदों  का घर  होता है 

जो  तारीकी  में  भी  रस्ता दिखलाए 
वो ही हमदम  वो ही रहबर  होता है

टूटा -फूटा  गिरा-पड़ा कुछ  तंग सही 
अपना घर  तो अपना ही घर होता है

ताल  में  पंछी पनघट गागर चौपालें 
कितना सुन्दर गाँव का मंज़र होता है

कैद  करो  न  इनको पिंजरों में कोई 
अम्न  का पंछी “रज़ा” कबूतर होता है

kiyun kahte ho koi kamtar hota hai

by shayar salimraza rewa 9981728122

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सोमवार, 4 जनवरी 2016

माँ (कविता)

माँ संसार का करिश्मा है तू
अँधेरे में रौशनी जगाये तू

शिक्षा की स्थापना करे तू
कष्ट आने पर मदद करे तू

संसार के सारे काम करे तू
चोट आने पर मोंम लगाये तू

लाखों में एक है तू
तुझ जैसा कोई नहीं

हर पाठ पढ़ाये तू
माँ तुझे सलाम

माँ तुझे कोटि कोटि प्रणाम

– नमन मेनन

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पहचान

पहचान अब तो मुश्किल ईमानदारी की
पंडित, मोलवी भी जब गुनाह करने लगे !
!
करते रहे जो क़त्ल इंसानियत का सरेआम
खुदा के फ़रिश्ते दुनिया में वो कहलाने लगे !!

डी. के. निवतियाँ _______@@@

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गीत--गीत गाती प्रणय के -शकुंतला तरार

गीत गाती प्रणय के हवा जो चली
रूप बगियन की कलियाँ चटकने लगीं

सुप्त पीड़ायें उर (हृदय) की हरी हो गईं
मन की कुंठाएं तन से बरी हो गईं
प्रेम का कोष मैंने लुटाया न था
कि भावनाओं की गुड़िया परी हो गई
कामनाओं उमंगों के तीव्र ज्वार से
सोन की वो मछरिया तड़पने लगी ||

नेह से नेह का था जो बंधन हुआ
सोने से तपकर ये मन था कुंदन हुआ
घास-फूस की सी ज़िंदगी उलझी घड़ी
स्नेह का निर्झर पाकर था चन्दन हुआ
मन का मरुथल अभी तक तो सींचा न था
गीत पावन बनी लहलहाने लगी ||
शकुंतला तरार

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थोड़ा कमतर थोड़ा बेहतर होता है - GAZAL SALIM RAZA REWA

थोड़ा कमतर थोड़ा बेहतर होता है 
लेकिन हर इन्सान बराबर होता है !

अपना बनकर जो भी  धोखा देता है 
बुज़दिल होता है वो कायर होता है !

शेर ग़ज़ल के सब मक़बूल नहीं होते 
जो होता है वो तो मुक़र्रर होता है !

जिसके दिल में दर्द नहीं अहसास नहीं 
फूल नहीं वो इंसा पत्थर होता है !

ज़र्रा अपनी मेह्नत और मशक्कत से 
एक दिन वो चमकीला गौहर होता है !

जिसके आगे सागर सहरा कुछ भी नहीं 
वो ही इक दिन मील का पत्थर होता है !

काम नहीं है तीरों का तलवारों का
प्यार तो एटम बम से बेहतर होता है !

GAZAL,BY SHAYAR SALIMRAZA REWA

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मेरी माँ

तूने ही सिखाया ,ज़िन्दग़ी का हर पाठ,
तेरे ही आँचल के नीचे ज़न्नत हे मेरी माँ|

अपने अंशु छुपाकर ,मुझे खुशिया देकर ,
हर पल मुस्कराना ,आदत हे तेरी माँ|

मैं रहू या न रहू,
तेरे सपनो को पूरा करने मे अपनी ज़िन्दग़ी न्योछावार कर देना ,
खुशकिस्मती हे मेरी माँ ..

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रविवार, 3 जनवरी 2016

"नयी उमँग"

नई उमँग है, नया सवेरा
नयी तंरग है, नया उजेला……….!!

नया साल है आया, खुशियाँ संग है लाया
करो कुछ ऐसे संकल्प की अच्छा हो हमारा कल……….!

गलतियाँ न दोहराओ पुरानी,
लिखो कुछ नयी कहानी……….!

जब जागे तभी सवेरा
नयी उमंग है ,नया सवेरा……!

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usaki wo eyesights

आज मौसम ने कुछ अजब सा रंग बदला हे
कभी था गर्मी कभी था सर्दी ये न जाने कैसा ढंग बदला हे
जो कभी मरते थे हमसे मिलने के लिए
आज वो ही बेवफा किसी और से मिलने के लिए तरसा हे
आज रौ की गौ की हसु हर अदा में मेरे डिल का आशु बरसा हे
कभी थी हमसे जो मोहब्बत उनकी वो बड़ी अच्छी सी लगती थी
जो हमे देख-कर गाव के हर गली-मोहल्लो में भगति थी
कभी हा जी ओ जी ,कभी प्यार से गले लगाया करती थी
कभी काजल कभी लिप-ग्लॉस केवल हमारे लिए लगाया करती थी
सह्लिया पूछती थी-की तेरे सैइय्या तो श्याम रंग हे ,तुजे कैसे वो भईगे
वो बोलती थी-श्याम रंग मेरे पर घन-घोर रूप से छाएंगे
उस रत के मेरे सईया जी मुझे घाना प्यार धिखलायेगे
प्यार की हर एक रह पर मुझे नया पथ सिक्ल्ह्लायेगे
जब दो काया मिल जाती हे तो अगन अगन सी लगती हे
फिर क्या हुआ वो श्याम रंग हे टेक्नोलॉजी सर्जरी सी बदल सकती हे
में सर्जरी फिर उनके चहरे की करवा दूंगी
में उनके इस श्याम रंग को घोड़े से भरवा दूंगी
जब पहली बार उसने हमको कमरे में अकेल;इ बुलाया था
आखो की उस मदहोशी को हमने आखो से लगाया था
फिर प्यार से उनके ओष्ठों की वो चूमने की अदा थी
पापा ने हमको देख लिया ज़िन्दगी भर की सजा थी

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सबका हैं! by ALOK UPADHYAY

न तेरा है न मेरा है हिन्दुस्तान सबका हैं ।
नही समझी गई यह बात तो नुकसान सबका है।।
जो इसमें मिल गई नदियाँ वो दिखाई नही देती।
महासागर बनाने मे मगर एहसान सबका है।।
हजारों रंग-खुशबू -नस्ल के फल-फूल पौधे है।
मगर गुलशन की इज्जत -आबरू -ईमान सबका है।। 1914088_1658326221115283_1484452592524357367_n

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a heart touching sad poem by ALOK UPADHYAY

वो कल भी भूखा सोया था फुटपाथ में,
अचानक खूब पटाखे चले रात में.
झूमते चिल्लाते नाचते लोगों को देखा तो हर्षाया,
पास बैठी ठिठुरती मां के पास आया.
बता न माई क्या हुआ है क्या बात है,
मां बोली बेटा आज साल की आखरी रात है .
कल नया साल आएगा,
बेटा बोला मां क्या होता है नया साल,
अरे सो जा मेरे लाल…
मैं भीख मांगती हूँ तू हर रोज़ रोता है,
साल क्या हम जैसों की ज़िन्दगी में कुछ भी नया नहीं होता है…!!!
by
ALOK UPADHYAY12190078_1644324829182089_1986409086571402577_n

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शनिवार, 2 जनवरी 2016

और कितनी निर्भया

निर्भया जिन्दा है
भारत की आवाज़ बनके !
वो चिखती कह रही है ,
इन्साप चाहिए इन्साप चाहिए !
पर न्याय कब मिलेगी
यहाँ तो कानून अंधा है
और बहरा भी है !
फिर क्यो हमसब चुप हैं ?
युवा भारत के उबलते खून को क्या हुआ ?
और कितनी निर्भया
इस जुल्म को सहती रहेगी,
न्याय के लिये तरसती रहेगी !
ऐसे असामाजिक तत्व के
आखिर कब खातमा होंगी ,
या फ़िर लोग हर रोज
बस तमाशा दिखते रहेंगे !
क्यो हमसब अनदेखा कर रहे हैं !
कैसी जुल्म थमेगी ?
बस पहेली बनी हुई है ,
जो हमारी संस्कृति को कलंकित करती, समस्या बन चुकी है !
आवाज़ उठाने भर से कुछ नहीं होता,
हमें सख्त और ससक्त कदम उठाना होगा !
तभी हर रोज हो रही भारत माँ की अनेक निर्भया जैसी साहसी बेटियों की, जुल्म की शिकार नहीं होगी !!
Dushyant kumar patel

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दो लफ्ज ....(ग़ज़ल)

दो लफ्ज क्या अपनी जुबां से निकलने लगे
दुनिया वाले गुनेहगार हमको समझने लगे !!

सुना था हमने तो प्यार इबादत है खुदा की
की जो हिमाकत जरा हमने लोग जलने लगे !!

दिल के जज्बातों ने जो शक्ल ली लफ्जो की
तब से मोहब्बत का शायर लोग हमे कहने लगे !!

लोग इस दुनिया के भी बड़े अजीब होते है
चाह जो दर्द छुपाना कायर हमे कहने लगे !!

चढ़ने लगा इस कदर नशा हमे प्यार का
गम ऐ दुनिया भी गम ऐ यार दिखने लगे !!

फर्क मालूम न रहा सोडा पानी और मधुशाला में
हम तो मिलाके शराब में शराब अब पीने लगे !!

हमने की कोशिश चलने की जमाने के साथ
छोड़कर बीच राह में लोग राहे बदलने लगे !!

जब से कलम चलने लगी कागज़ पे धर्म की
नफरत की आग में लोग हमसे जलने लगे !!
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डी. के. निवातियाँ
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याद जो तेरी आई है -Alok upadhyay

ये फूल गिरे हैं आंगन में
याद जो तेरी आई है
बरसे बादल बरसे रैना
इस चित में नहीं है चैना
गौरा बदन, काली जुल्फें
काली ये घटा छाई है
ये फूल गिरे हैं आंगन में
याद जो तेरी आई है

एक रस्ते मैं तेरे संग चला
तेरी बातों ने इक रंग भरा
वो कोयल वाणी तेरी
हर पंछी ने गाई है
ये फूल गिरे हैं आंगन में
याद जो तेरी आई है

वो हिरनी सा चलना तेरा
इस सूरज सा ढलना तेरा
क्या बात करूँ तेरे घूँघट की
पर्दे में चांदनी छुपाई है
ये फूल गिरे हैं आंगन में
याद जो तेरी आई है

आखों से देखो दिल ना लगा
फिर कहना मत कर गई ये दगा
ठोकर खा कर
खुद को पा कर
जानी इसकी गहराई है
ये फूल गिरे हैं आंगन में
याद जो तेरी आई है
by
Alok upadhyay12360182_1657647901183115_7206784373044290257_n

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प्यार

इतना प्यार क्यूँ करते हो हमसे,जो मौन की भाषा भी समझ जाते हो
आँखों में पढ़ लेते हो मेरे दर्द को,कुछ कहने से पहले ही सुन लेते हो
दिल की कोई हसरत हो अधूरी,बिन कहे ही पूरी करने की ठान लेते हो
ये प्यार भी क्या अजीब दास्तां है,दूर कर देता है जिन्दगी का अधूरापन
दिल से दिल का रिश्ता क्या कहें,बहार ले आता है अगर कभी हो पतझड़
जिन्दगी जब भी आई ग़मों के पहाड़ तले,ख़ुशी की एक सुरंग बना दी तुमने
निकल आई उस सुरंग से मै,जगमगाता जहाँ हमेशा दिखाया तुमने
जीवन के रास्ते जब भी बोझिल हुए,अपनी बाँहों का सहारा दिया तुमने
हाथ पकड़कर चले हम साथ-साथ,कभी जिन्दगी को न थकने दिया हमने
बस एक ही गुजारिश है तुमसे,कभी मैं न रहूँ तो तन्हां न होना
न होकर भी रहूँगी तुम्हारे आस-पास,खुशबू को मेरी महसूस करते रहना |

_सन्ध्या गोलछा

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क्या कहें - ८

इस बार न हाथो में पेंसिल, न ही चांदनी रात थी
तुम कहीं भीड़ में खोयी सी , बस होठों पर एक सच्ची मुस्कान थी
मेरी ख्वाहिशो के अवराक (पन्ने) अभी भी तलाशते हैं तुम्हे
मेरी कलम के हर्फ़ हर सजदे में मांगते है तुम्हे
नादान हैं शायद उन बारिश की बूंदो की तरह,
जो अक्सर गले लग जाती हैं उछलती हुई लहरों से
काश उन्हें बताये कोई कि समुन्दर का कहीं किनारा नहीं होता
फिर उस वे वक्त अलार्म ने मेरे खवाबो का बांध तोड़ दिया
जो मेरे तकिये के नीचे आराम से नींद में सोता है
सामने टेबल पर देखा, तो तुम अब भी मुस्कुरा रही थी पर लोग न थे
शायद तुम्हारे अक्स ने उन डेस्कटॉप के फ़ोल्डर्स को जो ढक दिया था

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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

लो आ गया......नया साल

लो आ गया मै
फिर से….!!!
आपका नया साल
लेकर नई आशाये
और नई उम्मीदे
कुछ नए सपने
राहें भी साथ है
मंजिल की आस है
मिलेगी उसे ही
नियति जिसकी साफ़ है
कर्म तो सभी करते है
मनुष्य से लेकर
पशु, पक्षी, कीट पतंगे
प्रत्येक प्राणी !
मगर कर्म के रूप भिन्न है
कारक भिन्न है,
तद्स्वरूप फल भी भिन्न ही होंगे !
मात्र कर्म ही साधक नही
सत्यमार्ग पर चलने के लिए
संग में सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता
के साथ साध्य होना भी जरुरी
और अति महत्वपूर्ण उसके प्रति
सटीक दिशा में द्रवणशीलता
तो जो मैंने कहना था
कह दिया अपने परिचय
के साथ आगाह करना
अपना कर्तव्य समझता हूँ
वैसे आप जग के
सबसे सृजनशील प्राणी हो
जाने वाला साल भी
बहुत कुछ सीख देकर गया होगा !
अपनाना आपकी इच्छा पर निर्भर करता है
चलो चलते है फिर एक नए सफर पर
मिलकर साथ साथ , देखते है
अंत तक आते आते क्या करोगे !
आशा करता हूँ भविष्य को भूत से बेहतर ही करोगे !!
धन्यवाद !! आपका नया साल !!
!
!
!
[——डी. के निवातियाँ——-]

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नव वर्ष की शुभकामना

नई उम्मीद,नया सवेरा लाया l
देखो नया साल 2016 आया ll
खुशियो की सौगात ये लाया l
देखो नया साल 2016 आया ll

कैलेंडर बदले, तारीख बदली
बदल गया फिर ये साल l
ईश्वर से है हमारी यही प्रार्थना
ना रहे कोई भूखा ,ना रहे फटेहाल ll

पाप,द्वेष ,घृणा को मन से मिटाओ l
भेदभाव की दीवार गिराकर
प्रेम से सबको गले लगाओ ll

आओ सब मिलकर आज प्रतिज्ञा उठाए l
भ्रष्टाचार को हम सब जड़ से मिटाये ll

हमारी ये कोशिश ही नया सवेरा लाएगी l
तभी रोते चेहरों पर मुस्कराहट आएगी ll

बीते हुए साल को देते है हम विदाई l
नए साल की सब को हार्दिक बधाई ll

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