शनिवार, 2 जनवरी 2016

दो लफ्ज ....(ग़ज़ल)

दो लफ्ज क्या अपनी जुबां से निकलने लगे
दुनिया वाले गुनेहगार हमको समझने लगे !!

सुना था हमने तो प्यार इबादत है खुदा की
की जो हिमाकत जरा हमने लोग जलने लगे !!

दिल के जज्बातों ने जो शक्ल ली लफ्जो की
तब से मोहब्बत का शायर लोग हमे कहने लगे !!

लोग इस दुनिया के भी बड़े अजीब होते है
चाह जो दर्द छुपाना कायर हमे कहने लगे !!

चढ़ने लगा इस कदर नशा हमे प्यार का
गम ऐ दुनिया भी गम ऐ यार दिखने लगे !!

फर्क मालूम न रहा सोडा पानी और मधुशाला में
हम तो मिलाके शराब में शराब अब पीने लगे !!

हमने की कोशिश चलने की जमाने के साथ
छोड़कर बीच राह में लोग राहे बदलने लगे !!

जब से कलम चलने लगी कागज़ पे धर्म की
नफरत की आग में लोग हमसे जलने लगे !!
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डी. के. निवातियाँ
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