शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

इतिहास युगों का

सुनाता है इतिहास युगों का
सम्राटों की विजय गाथाएँ ,
क्या सुनती है कभी यह,
युद्ध मैं सर्वस्य खोया,
इन कृषकों की विरह-व्यथाएँ ?

सुनो ! इन महलो की चमक के पीछे,
गूंज रही स्वर हाहाकार की
सही जिन्होनें यातनाएँ ,
क्या सुनती है इतिहास यूगो की
इन मज़दूरो की व्याकुल-ब्यथाएँ ?

राज्य बना, सम्राज्य टूटा,
पर दुर्भाग्य का साथ देखो इनका,
कल भी था, आज भी ना छूटा,
हाए! तख़्त बदला, पर न बदले,
इनकी करुण दशाएँ,
इतिहास नही, साक्षी शोषण की देखो!
है ये धरती, है ये चारो दिशाएँ I

-पार्थ

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