बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

जीयो जिन्दगी खुल के

बहुत खुशनसीब हैं वह,
जिन्हें मनुष्य का जन्म मिलता है।
यह जन्म हर कोई पाना चाहता है,
क्योंकि इस जन्म में हम कर्मों को सुधार सकते हैं ।

एक ही बार,
मिलता है ऐसा जन्म।
किस्मत उनकी लम्बी हो सकती है, और छोटी भी,
इसमें कर्मों का फल मिलता है हमको ही ।

एक ही तो जन्म है,
एक ज़िंदगी ।
क्यों न इसे,
जीये खुल कर ही?

मौज करो,
ऐश करो।
कल का तुम,
फ़िक्र मत करो।

क्योंकि वह हमारे हाथ में नहीं,
जो है, वह आज का दिन है।
हम इस पल में खुशी ला सकते हैं और घम भी,
इस दिन को संभालने की ली है हमने जवाबदारी ।

ज़िंदगी लोकल की तरह है,
जहाँ लगता है कि मौके हैं हज़ार ।
मगर एक ऐसा मोड़ आएगा,
जहाँ हम पछताएँगे बार-बार।

कहेंगे कि काश,
मैंने वह लोकल पकड़ी होती,
तो आज यूँ इंतेज़ार न करना होता,
कितनी रात हो गयी है, सो जाता जब होता उजाला।

ज़िंदगी छोटी है, यारों,
जीयो इसे खुल कर।
क्या पता यह मौक़ा फिर मिले या नहीं,
हम बिछड़ने के बाद मिलें नहीं ।

आराम अब करना है,
मुश्किलों का सामना करके।
न रहना है किसी से,
छुपकर, डरके।

डरना हमने सीखा नहीं ,
छुपाना अपनी फितरत में नहीं ।
मस्ती भरी है अपनी दुनिया ,
जीने की ख्वाहिश रखो, और लिखो हज़ारों कहानियाँ।

कहानियाँ निरंतर होंगी,
होंगे दरार बड़े।
मगर हम इस मैदान पर रहेंगे,
डट कर खड़े ।

कोई चुनौती दें ,
तो फुटबॉल की तरह उसे जवाब दें ।
गोल जब तक न मिले,
तब तक परिश्रम करते रहना है हमें ।

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here जीयो जिन्दगी खुल के

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें