देखकर जिसको ,
मन अन्नत में कहीं डोल जाता
गुदगुदाते से ख्यालो में कहीं डूबा
मन अटपटा सा बोल जाता
और पूछता कि जैसे
उस अनछुई छुअन की सिरहन को
क्या नाम दूं मैं |
वो सुकोमल चांदनी सी
जो मेरा आपा भुलाये
और याद एेसे कि जैसे
कहीं खोया मलय समीर आये
और मन में तडपती अनजानी कसक को
क्या नाम दूं मैं |
वो कौन है?
जिसको कि मैं हर एक में हूं खोजता
न रूप उसका जानता मैं
न जानता उसका पता
फिर भी मिलने की उससे
उस बेतरतीबि को ,
क्या नाम दूं मैं |
_ अजीत िसंह चारण , रतनगढ ( राज.)
9462682915
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