चली जा रही थी बंकिम कंटीले पथ पर,
एक सौम्य निरीह युवती|
एक वहशी निगाह फेंकती आती-जाती भीड़,
नजरें चुराती,मुंह मोड़ती|
सोच रही थी कुछ सच है कुछ मिथ्या,
बड़बड़ाती,गुनगुनाती|
स्वप्न बुन रही थी आगत भविष्य के,
मेहरबान थी निगाहें चूमती|
मग्न थी सुखद विचारों में आएगा कोई,
बनाएगा जो हृदयेश्वरी|
सामने दिखा एक दैत्यनुमा इन्सान,
देखा और सहम गई|
स्वप्न होते हैं मिथ्या नहीं हकीकत,
इसको न बदल पाया कोई|
-सन्ध्या गोलछा
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