वृक्ष के सम पाट खोलो
अपनी मंज़िल को टटोलो।
जैसे तपती धूप में भी
वृक्ष करता छाँव, जितनी
पत्र-भुजाएँ फैल पाती
लक्ष्य-पथ को तुम न तोलो
पहले मंज़िल को टटोलो।
पूर्ण हो विश्वास खुद पर
करके भी वीरान पतझड़
नव-वसंत की आस्था में
घाव सहता वृक्ष झर-झर
जोश में अपने कभी भी
हार का तुम विष न घोलो
अपनी मंज़िल को टटोलो।
क्षण-प्रतिक्षण सोच बस हो
विजयी-सदृश्य जोश बस हो
पूर्ण-समर्पण लक्ष्य को ही
अर्जुन-सदृश्य चक्षु-खग पर
लक्ष्य-लक्ष्य होंश बस हो
जीतने की अभिलाषा में
मृत्यु के भी द्वार खोलो
अपनी मंज़िल को टटोलो।
(C)परवेज़ ‘ईश्क़ी’
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