हम यूं दिवाना वार फिरते हैं
कि सबा जैसे ख़्वार फिरते हैं।
कोई शम्आ नज़र जो आ जाए
फिर तो परवाना-वार फिरते हैं।
हूँ गदा बस तेरी गली का मैं
सो यहीं बेक़रार फिरते हैं।
जब से देखा तुझे है जाने जां
हम यूं ही मुश्क़बार फिरते हैं।
कि जवानी भी काम आ गई अपनी
जबसे तुझपे निसार फिरते हैं।
है बड़ा ही क़रार अब दिल को
जबसे हम बेक़रार फिरते हैं।
है ग़ज़ल गोई मशग़ला ‘ईश्क़ी’
क्योंकि तुझपे निसार फिरते हैं।
परवेज़ ‘ईश्क़ी’
Read Complete Poem/Kavya Here तुझपे निसार फिरते हैं...॥
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