मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

काम न आई तदबीरें कुछ...॥

काम न आई तदबीरें कुछ आखिर तुमको थाम लिया
सुब्ह को भागे, दिन में रोए, शाम को तेरा नाम लिया।

हम से तो कुछ बैर न था फिर ऐ साकी मयख़्वारों में
रुस्वा किया यूं तुमने अचानक हाथ से मेरे जाम लिया।

ईश्क़-व-वफ़ा के शहर में देखा हस्ती मिटी है कितनों की
ईश्क़ में जागे, ईश्क़ में सोए, ईश्क़ का जिसने गाम लिया।

मजबूरी भी कैसी है ये राहे-वफ़ा के दामन में
चाहे जिसे हम, हो नहीं अपना, दर्द ने दिल को थाम लिया।

बहके अरमां, बेखुद दिल हो, मदहोशी का आलम भी
होंठों ने जो जाम के बदले जब भी तेरा नाम लिया।

तोहमातों का दौर भी देखा उसने ईश्क़ के सहरा में
‘ईश्क़ी’ जिसने रस्म-ए-वफ़ा का शौक़ से पूरा काम किया।

परवेज़ ‘ईश्क़ी’

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