मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

आईना

      कोई दर्पण कहता है, कोई आईना कहता है
      मै वो कांच का टुकड़ा जिसमे चेहरा दिखता है

      पहने कोई नकाब, या बदले रूप कोई अनेक
      मेरे सामने आते, जो जैसा हो वैसा दिखता है

      लाख करे कोई खुद से बेईमानी कहाँ बच पाता है
      कैसे मिलाये नजर मुझसे फिर ये सोच कतराता है

      तुम छुपा लो चेहरे को पर मन का काला दिखता है
      मै तो मन की मूरत हूँ मुझसे कहाँ कुछ छिपता है

      जितना चाहो टुकड़े कर दो “धर्म” सच तो दिखता है
      मै तो ठहरा तेरी हकीकत,सब में एक सा दिखता है
      !
      !
      !
      डी. के. निवातियाँ ___________@@@

      Share Button
      Read Complete Poem/Kavya Here आईना

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें