गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

"क्यों तुम दूर चले आये"

इस तुच्छ सी काया पर
प्रेम शब्द बरसा कर
इस प्यासे मन को आज
और अधिक उकसाकर
क्यों तुम दूर
चले आये

ये अहम था भूखा-प्यासा
क्षणिक प्रेम की बातों का
कुछ क्षण इसको
मधु बातों से बहला कर
क्यों तुम दूर
चले आये

ये उर तो है चंचल, कोमल
इसे न बांधें रिश्तों के तृण
फिर रिश्तों की
सौगन्धें ला कर
क्यों तुम दूर
चले आये

जो मन में थीं तृण लता सी
सिंचित, संकुचित आशाएं
उनको भी बस
धता बता कर
क्यों तुम दूर
चले आये

अगर मैंने ही स्वयं विवेक से
प्रेम लता पुष्पित की थी
तो समझते
यूं ठुकराकर
क्यों तुम दूर
चले आये

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