शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

ख्वाबों के टुकड़े

रोज देखती हूँ उसे
बटोरते हुए
ख्वाबों के टूटे टुकड़े
फिर उन्हें
सहेज कर रखते हुए
उम्मीद के पिटारे में
इंतज़ार है मुझे
उस पल का
जब ख्वाब
पिटारे में बंद नहीं होंगे
हकीकत बनकर
उसकी आँखों से
बहेंगे …
खुशियों के
आंसू बनकर …..

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