रविवार, 5 अप्रैल 2015

भूखा अन्नदाता।

उम्मीदों पर ओले गिर गए।
मुआवजे का मरहम है।
किसान किस्मत कोस रहा
जिसपे गर्व था,अब गम है।

राहत का रास्ता रोकती
राजनीति रोटी सेंक रही।
बीमा के सब्जबाग सजे हैं
कांटे राहों में फेंक रही।

बेमौसम बर्षा बनी विनाश
कोई तो आस जगा दो मन में।
महलों में सुकूँ से सोने वालों
गरीब को जगह दो जीवन में।

अन्नदाता नाम दे दिया
दाता का मतलब भूल गए।
तुम कुर्सी की लड़ाई में मशगूल
वो फंदा डाल गले में झूल गए।

जो अन्न की करता रखवाली
आज बच्चे भूख से बिलख रहे।
माथे का सिन्दूर भी बह गया
बूढ़े माँ-बाप गली में भटक रहे।

अपने फायदे के तुम्हें सब
नियम कानून याद रहे।
कोई तो ऐसा हक दे दो
जिससे किसान आबाद रहे।

वैभव”विशेष”

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