रफ़्ता रफ़्ता तुझसे वाबस्ता हो रहें हैं
जाने क्या मिल रहा है जाने क्या खो रहे हैं
तुझसे मिले हैं जब से दो आलम का है ये दिल
हम डूब भी रहे हैं और पार हो रहे हैं
अब शाम ढल गयी है जुगनू चमक रहे हैं
हम जाग भी रहे हैं और ख्वाब आ रहे हैं
तुझको खबर नहीं है हम भी खोये हुये हैं
एक दूसरे के प्यार में दीवाने हो रहे हैं
मुख़्तसर से लफ्ज़ मेरे टूटे फूटे हुये थे
तेरी खुस्बू मे भीग कर वो मुकम्मल से लग रहे हैं
ग़ज़लें नहीं लिखेंगे हम इसपे मुतमईन थे
तेरे तस्सउुरात मे शायर भी हो रहे हैं

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