शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

शाम ढल रही है ....

नीलगगन की छाओं में शाम ढल रही है
तारो का आँचल ओढ़े रात सज रही है !!

हुआ जाता आसमा का धरती से मिलन
शरमा के संध्या सागर में मिल रही है !!

रात के अँधेरे अब किनारे ढूंढने लगे है
मध्यम मध्यम दीपो को लौ जल रही है !!

आलम जाने कैसा होगा आज की रात का
हर तरफ उजाले की चहल कदमी बढ़ रही है !!

जैसे शर्म से नजरे चुराकर सूरज चला
अब चाँद की चांदनी जमी पे ढल रही है !!

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@___डी. के. निवातियाँ __@

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