शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

मक़सद

दुनिया से लड़ने की फुर्सत कहाँ है,
जब से हूँ खुद से ही लड़ रहा हूँ मै।
भीतर मेरे गुनाह का तूफ़ान है शायद कोई,
हर रोज जिसके ज़ोर से बच रहा हूँ मै।
मक़सद नहीं है जन्नतों की शान को पाना,
इंसान को पाने के लिए जी रहा हूँ मै।
……………देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here मक़सद

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें