बुधवार, 18 नवंबर 2015

ग़ज़ल-क्या-क्या बदल गया-शकुंतला तरार

ग़ज़ल
इस इंकलाबी दौर में क्या क्या बदल गया
मंज़र बदल गया कहीं जलवा बदल गया||

दिखलाता है वो दोष तो उसको न दोष दो
दर्पण वही है आपका चेहरा बदल गया ||

मशहूर था जो अपनी शराफत के वास्ते
जब पद मिला तो उसका रवैया बदल गया ||

पहली सी अब वफ़ा न मुरव्वत न प्रेम है
‘हम तुम बदल गये के ज़माना बदल गया ||

अब भी वही है लूट खसोट और मारकाट
ज़ालिम वही है सिर्फ इलाक़ा बदल गया ||

बदलाव हो ज़रूर ”शकुंत” ऐसा भी न हो
दुल्हन बदल गयी कहीं दूल्हा बदल गया ||
शकुंतला तरार रायपुर (छत्तीसगढ़)

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