कंकरीली, पथरीली, रेतीली बंजर से
उबड़ खाबड़ सी डगर पर चलते हुए
जब कभी किसी समतल धरातल पर
जिंदगी की राहो का ये मन पथिक
रुककर सुकून के कुछ पल बिताता है
तभी एक आंतरिक द्वन्द छिड़ जाता है !!
मन और मस्तिष्क के मध्य
कोलाहल में खोजने लगता हूँ स्वंय को
आत्मा और शरीर के इस खेल में
आत्मा को समर्थन प्राप्त होता हृदय का
मस्तिष्क शरीर का साथी बन जाता है !!
ठगा सा महसूस करने लगता हूँ
दोनों के विचारो में खुद को असहाय
मन आत्मा को आधार बनाकर चले तो
समाज दुनिया से खुद को अलग पाता हूँ
मस्तिष्क शरीर के पक्ष के चलकर
स्वंय की नजरो में गिर जाता है !!
समस्त जगत के लिए अपने को खोना
अंतत: घृणा का ही पात्र बन रह जाना
सुकून के सीमित पलो में भी अंतर्द्व्न्द
मन मस्तिष्क की प्रतिस्प्रधा में भटका
हलचल में फिर खड़ा हो चल जाता है !!
गिरता, पड़ता, वक़्त की ठोकरे खाता
कभी सम्भलता, फिर चल पड़ता हूँ
जीवन पथ पर यूहीं निरंतर चले जाना
हाँ …यही सत्य है . इंसानी जीवन का
एक सरल व्यक्तित्व की पहचान का
शायद ये झलक मेरी और तुम्हारी हो
जीते हुए ..ऐसे ही जीवन कट जाता है !!
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डी. के. निवातिया…………….@@@
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