सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

कविता रोज़ मैं करता हूँ

जाग प्रतिदिन रात्रि को,
विचार जीवन के अनुभवों से,
बाँटने मित्रों, परिजनों से,
दे मात निद्रा व स्वप्नों को,
कविता रोज़ मैं करता हूँ ,
कविता रोज़ मैं करता हूँ ………

कभी संघर्षों पर विचार,
कभी विचारों से संघर्ष करता हूँ,
उतारने अनुभव जीवन के कागज़ पर,
उठा कापी, पेंसिल, कागज़ काले करता हूँ,
कविता रोज़ मैं करता हूँ ,
कविता रोज़ मैं करता हूँ …………

बन जाती कभी रहती अधूरी
कभी विचारों को न मिलती धूरी,
रिपु बन,कभी निद्रा सताती,
कभी जीवन की चिंता बाधा बन जाती,
कर एकत्रित सभी विचार,
फिर से साहस करता हूँ,
कविता रोज़ मैं करता हूँ,
कविता रोज़ मैं करता हूँ ……..

प्रातः उठ बैडमिंटन खेल लौट कर,
मित्रों को चाय पर आमिन्त्रित करता हूँ,
बैठ पत्नी, मित्रों संग, चाय की चुस्की भरता हूँ,
फिर निकल धीरे से कापी,
उनके सन्मुख नई कविता प्रस्तुत करता हूँ,
कविता रोज़ मैं करता हूँ
कविता रोज़ मैं करता हूँ ……….

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