सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

अनजान शहर

अनजान शहर में एक चेहरा,
जाना पहचाना तो मिले,
बेगानो में कोई अपना तो मिले …….

रौशनी ही रौशनी है चारो तरफ,
अँधेरे हैं दिलों की गहराईयों तक,
दफ़न चाहते, टूटे रिश्ते, अधूरी ज़िंदगी,
लिए फिरते है सब,
इन सबमे कोई इंसा,
मुक्कमल तो मिले …….

अनजान शहर में एक चेहरा,
जाना पहचाना तो मिले,
बेगानो में कोई अपना तो मिले …….

हसरते लिए आते है,
जहाँ भर से लोग,
बदलेगी ज़िंदगी,
खत्म होगा ग़ुरबत का दौर,
उम्र निकल जाती है,
उलझे ख्वाब सुलझाने में,
एक लम्हा अपनी,
मर्ज़ी का जी पाने में,
मुझे भी ज़िंदगी का सही,
मायना तो मिले…….

अनजान शहर में एक चेहरा,
जाना पहचाना तो मिले,
बेगानो में कोई अपना तो मिले …….

हाथों से रेत सी फिसलती ज़िंदगी ,
सुबह सी श्याम, गुज़रता वक्त,
तने देते हुए खुद से किये वादे,
ज़िंदगी से की जदोजहद का,
कुछ तो सिला मिले …….

अनजान शहर में एक चेहरा,
जाना पहचाना तो मिले,
बेगानो में कोई अपना तो मिले …….

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