शहीद की आत्मा
घूंघट का पट खोल बावरी ,भरी दोपहरी सिर पर धूप ,तन बदन मुझर्या सा ।
अब तो देश आजाद हो गया गौरी जलाले दीपक घर में हो जाये उजियारा सा ॥
शहीद की विधवा-
सात दिन मे रही सुहागन सतियों की मैं रानी हूं जीवित अवस्था में किसी मर्द से आख नहीं मिलाई मर्दो की मैं बङी पारखी हूं, भरी दोपहरी में छेङो नारी , आप थोङा बहूत भी नही शर्माया , आप कोन हो? भरी दोपहरी में क्यूँ मुझको बतलाया ॥
शहीद की आत्मा
आर्यव्रत का रहने वाला. अमर बेटा कहलाता हूं , सात दिन शादी के बाद शहीद हो गया ।
जूनून आजादी का छाया था, बचपन की कुछ याद आ रही गोरी , शादी का सेहरा तेरे साथ में बंधवाया था ॥
शहीद की विधवा
क्यूँ झूटमूठ के बकते हो साथ में किसको लाये हो , अपने पूर्वजों का कुछ नाम बतलाओ ।
फिर सवा कदम पास से मुझे तसल्ली दिल्लाओं , मैं भारतवंश की नारी हूं ।जिवित कम मरण पर ज्यादा मैं भी तो एक पितराणी हूं ॥
शहीद की आत्मा
घूंघट का पट खोल तेरे को मैं अपना बदन दिखाऊं , भूजा पर दिखाऊं भगतसिंह , हाथों मे आजाद , कमर पर पट्टा बंधा है सुखदेवसिंह का शिश पर सरताज सदा झंडा तिरंगा फहराता रहे , साथियों ने रखी थी मेरी लाज ॥
शहीद की विधवा
फफक फफक कर रो पङी नारी, पति को पहचान ने में लगाई इतनी देरी, कैसे मृत आत्मा का मीलन हो पाया लग गई आँसूओ की झङी बरस रहा जैसे रेन मन को नहीं था चैन। पौंछ रहे आपस में दोनों एक दूसरे के आंसू जो वीर देश के काम आवे लक्ष्मण भूली भटकी आत्मा को ईश्वर अपने आप मिलावे ॥ लेखक लक्ष्मण सिंह 7734809671

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