गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

हुस्न-ए-यार

ठहरी हुई सांसें मेरी आवारा कर गयी
खुश्बू तेरे एहसास की जब मुझको छू गयी

रंग-ए-सफ़ेद पैरहन में लिपटी हुई मूरत
काली सियाह रातों में एक नूर भर गयी

संगमरमर सरीखे उँगलियों की वो इक छुअन
पत्थर सिफ़त जेहन को मेरे मोम कर गयी

आराइश-ए-जमाल में मशरूफ हुस्न-ए-यार
तरतीब-ए-क़तल का सामान कर गयी

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