गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

आज़माईश ( गज़ल )

( गज़ल )

क्या बुरा है, किसी को आजमाने में….
भला ही कौन है, इस ज़माने में !!
कौन भला कौन बुरा, कुछ समझ न आये….
वक़्त ही कितना लगता है, लोगो को मुखौटा लगाने में !!

मुश्किल बड़ी है, राहें जिंदगी की………
धोका ही धोका है, इस ज़माने में !!
संभल कर रखना, हर इक कदम राह पर अपना…
वरना वक़्त ही कितना लगता है, राहें बदल जाने में !!

किसी की गलती पर, हमे छोड़ देना पड़े उसे……..
तो क्या गलत है, पहले उसे आजमाने में !!
लगते सभी अपने है, और सभी बेगाने भी………
हम खुद भी अपने नहीं, होते इस ज़माने में !!

जब अपनी ही सांसे, दे देती है धोका…….
तो क्या यक़ीन की, हमे छलेगा नहीं कोई !!
यूँ तो रूकती नहीं जिंदगी, किसी के जाने से…….
तो फिर क्या बुरा है, किसी को आजमाने में !!

जब बुराई नहीं किसी की, खातिर मिट जाने में….
तो फिर क्या बुरा है, किसी को आजमाने में !!
ये समझना जरुरी है, ” मोहब्बत – ऐ- जिंदगी ” में…
सांसे भी कम पड़ जाती है, प्यार को निभाने में !!

किसी के खातिर ( नैना ) भी, मर मिटी है दोस्तों….
जिंदगी कम लगने लगी मुझे, चाहत को निभाने में.!!

रचनाकार : निर्मला ( नैना )

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