मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

लब्ज बन कर जुबा से तु निकल आती है

क्यु तन्हाइ मे अक्सर तु याद आती है

दुर रह कर मुझमे तु समा जाती है

जख्म जितने है मेरे दिल पर

यादे बनकर उन पर तु मरहम लगा जाती है

रोता हु अक्सर जब रातो मे मै

रोते रोते क्यु तु मुझको हसा जाती है

फिरता हु यु ही जब राहो मे मै

क्यु तु मन्जील बन कर तु नजर आती है

खोया रहता हु मै जब यादो मे तो

क्यु ख्वाब बन कर तु इतना मुझे तडपाती है

अक्सर नाम लेता हु खुदा क मै

लब्ज बन कर जुबा से तु निकल आती है

जब लेती है मौत मुझको आगोश मे

जीन्दगी तेरी शक्ल बन कर मुझे नजर आती है

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