बुधवार, 8 अप्रैल 2015

बचपन काम पर

टूटता है बदन मेरा
दिन भर के काम से
लुटती है रूह मेरी उस
मालकिन हैवान से

रूखा सुखा खाती हूँ
बच्चों का मल उठाती हूँ
मैं बंद कमरों में घुटती
अंदर ही अंदर चिल्लाती हूँ

बाहर की रौशनी मुझे
कभी नशीब होती नहीं
बदहवाश सी रहती हूँ
ऐसा नहीं कि रोती नहीं

उड़ती हुई तितलियाँ
मुझे भी बहुत भाती हैं
वो मुझसे मिलने आती है
जब मालकिन बाहर जाती है

खेलते हैं खिलौनों से बच्चे
मैं उठा उठाकर पकड़ाती हूँ
झाड़ू कटका करती हूँ और
बर्तन भी चमकाती हूँ

जालिम पेट ने मेरे
हाथ पौचा थमा दिया
कायर तंग माँ बाप ने
बचपन काम पर लगा दिया

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